गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 301, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २६९ कर लेना—इसीलिए तुम्हें पञ्चबाणोंसे उपहित किया जाता है। प्राणोंका हरण करना ही तुम्हारा प्रयोजन है। ठीक ही तो है—कामदेव सन्तप्त जनोंको उत्तप्त करके गृहकी ओर उन्मुख करा देता है। पर तुम मुझे कितना भी विवश कर लो, मेरे प्राण भले ही चले जायें, पर मैं घर कभी नहीं जाऊँगी, श्रीकृष्णके चरणोंका आश्रय लूँगी। दोनोंका उपालम्भ देकर कामसे विदीर्ण होकर यमुनासे कहती हैं—हे यमुने ! तुम यमराजकी बहन हो ! मलयानल एवं पञ्चबाण मुझे पीड़ित कर ही रहे हैं, कामदेव सम्भोगकारक हैं, पर वह तो विपरीत आचरणमय हो गया है, मल्यानिल सुखकारक होकर मुझे विकल बना रहा है, उन दोनोंके द्वारा प्राणोंके ग्रहण कर लिये जानेपर तुम भाई यमको क्या उत्तर दोगी ? इसलिए तुम मुझे क्षमा मत करो, तुम अपनी तरङ्गोंसे मेरे अङ्गोंका सिंचन कर दो, मृत देहको अपने सलिलमें समा लो, जिससे गतप्राण मेरे देहका दाह शान्त हो जाय। इस प्रकार श्रीराधा श्रीकृष्ण विरहमें दसवीं दशाको प्राप्त होने लगीं। प्रस्तुत श्लोकमें वसन्ततिलका छन्द तथा अप्रस्तुत प्रशंसा अलङ्कार है। प्रातर्नील-निचोलमच्युतमुर संवीत पीतांशुकं राधायाश्चकितं विलोक्य हसति स्वैरं सखीमण्डले। व्रीडाचञ्चलमञ्चलं नयनयोराधाय राधानने स्मेरस्मेरमुखोऽयमस्तु जगदानन्दाय नन्दात्मजः॥४॥ इति षोडश सन्दर्भः। इति श्रीगीतगोविन्द महाकाव्ये विप्रलब्धा वर्णने नागर-नारायणो नाम सप्तमः सर्गः। अन्वय—[अथैतद्दुःखवर्णनमंसहिष्णुः कविः सिंहावलोकन्यायेन साधारण-केलिरात्रैः प्रातश्चरितवर्णनेन श्रीराधायाः खण्डितावस्थां