गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 302, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ें२७० श्रीगीतगोविन्दम् वर्णयिष्यन् श्रीराधामाधवयोः प्राक्तन-केल्यनन्तरावरस्थितिवर्णनेन मङ्गलमातनोति]—[कदाचित्] प्रातः (प्रभाते) नीलनीचोलं (नीलं निचोलं वस्त्रं यस्य तादृशं परिहित-राधावसनमित्यर्थः) अच्युतं (हरिं) [तथा] संवीतपीतांशुकं (संवीतम् उत्तरीकृतं श्रीकृष्णस्य पीतम् अंशुकं वस्त्रं यत्र तादृशं) राधाया उरः (वक्षःस्थलं) विलोक्य सखीमण्डले स्वैरं (स्वच्छन्दम् उच्चैरित्यर्थः) [तथा] चकितं (चमत्कृतं यथा तथा) हसति [सति] राधानने (श्रीराधावदने) व्रीड़ाचञ्चलं (व्रीड़या लज्जया चञ्चलं यथा तथा) नयनयोः अञ्चलं (नेत्रप्रान्तं कटाक्षमित्यर्थः) आधाय (विन्यस्य) स्मेर-स्मेर-मुखः (मृदुमन्दसहास्यवदनः) अयं नन्दात्मजः (नन्दनन्दनः) जगदानन्दाय अस्तु (जगतामानन्दं विदधातु) [अतः सर्गोऽयं नागरा एव नरा नरसमूहास्तेषामयनं मूलभूतः श्रीकृष्णो यत्र स इति सप्तमः सर्गः] ॥४॥ अनुवाद—प्रातःकाल विभ्रमवश श्रीकृष्णने श्रीराधाजीका नील उत्तरीय वस्त्र (कञ्चुक) तथा श्रीराधाने अपने वक्षःस्थल पर श्रीकृष्णका पीत उत्तरीय वस्त्र धारण कर लिया, जिसे देख सखीमण्डल स्वच्छन्दतापूर्वक हँसने लगा। उन्हें हँसता हुआ देखकर श्रीकृष्णने मन्दमुस्कानके साथ सलज्ज होकर अपाङ्ग- भङ्गिमासे श्रीराधाके मुखारविन्दके प्रति कटाक्षपात किया। ऐसे नन्दनन्दन श्रीकृष्ण जगतके लिए आनन्दका विधान करें। बालबोधिनी—प्रस्तुत सर्गके अन्तिम श्लोकोंमें वैष्णवोंको कवि जयदेवके द्वारा आशीर्वाद दिया गया है—यह नन्दनन्दन श्रीकृष्ण जगतको आनन्ददायी हों। निकुञ्ज-वनके निकट जयदेवजीके द्वारा श्रीराधा-माधवकी पूर्व-केलिका स्मरण कर प्रातःकालकी स्थितिका निरूपण किया है। कवि जयदेव श्रीराधाका विरह वर्णन करनेमें असमर्थ हो गये, तब सिंहावलोकन न्यायसे रात्रिकालीन साधारण केलिका चित्राङ्कन कर प्रातःकालीन श्रीराधाकी खण्डितावस्थाका दिग्दर्शन कराया