गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 303, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २७१ है। श्रीश्रीराधा-माधव दोनोंने एक साथ रति-केलिके द्वारा पिछली रात बितायी है एवं विभ्रमसे एक-दूसरेके वस्त्र पहन लिये हैं। इस वैचित्र्य परिवर्त्तनसे सखियाँ हँस पड़ीं, उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। अच्युत श्रीकृष्णने अपने तनपर नील-वसन कञ्चुकको धारण किया है और श्रीराधाका उर पीताम्बरसे ढका हुआ है। यह वस्त्र-विनिमय ही सखियोंके स्वच्छन्द हास्यका कारण है। लज्जासे चञ्चल नेत्रोंको श्रीराधाके मुख पर रखते हुए कटाक्षपात कर श्रीकृष्ण मन्द-मन्द मुस्कराने लगे। प्रस्तुत श्लोकमें कवि जयदेवकी लोकमङ्गलकी कामना प्रकट हुई है। हास्य रस, शार्दूल विक्रीड़ित छन्द, स्वभावोक्ति अलङ्कार, नायक शठ एवं नायिका अभिसारिका है। श्रीगीतगोविन्दके सोलहवें सन्दर्भकी बालबोधिनी वृत्ति समाप्त। इति सप्तमः सर्गः।