गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमः सर्गः विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः अथ कथमपि यामिनीं विनीय स्मरशरजर्जरितापि सा प्रभाते। अनुनयवचनं वदन्तमग्रे प्रणतमपि प्रियमाह साभ्यसूयम् ॥१॥ अन्वय—[इदानीं श्रीराधायाः खण्डितावस्थां वर्णयति; यदुक्तं— साहित्यदर्पणे—पार्श्वमेति प्रियो यस्या अन्यसम्भोगचिह्नितः। सा खण्डितेति कथिता धीरैरीर्षाकषातिता इति]—अथ (बहुविध- प्रलापानन्तरं) सा स्मरशर-जर्ज्जरितापि (स्मरस्य कामस्य शरेण जर्जरितापि; क्षणमात्रमतिबाहयितुमशक्तापीति भावः) कथमपि (अतिकृच्छ्रेण) यामिनीं विनीय (अतिबाह्य) प्रभाते (प्रातः) अग्रे (पुरतः) अनुनयवचनं (स्वापराधजनित-कोपोप- शमन-वाक्यं) वदन्तमपि, [ततोऽपि प्रसादमनालोक्य] प्रणतमपि [अनेन प्रेम्णः पराकाष्ठा दर्शिता] प्रियं (श्रीकृष्णं) साभ्यसूयं (कण्ठागतप्राणाया अपि प्रियदर्शनमात्रेण असूयोदयात् स यथातथा) आह ॥१॥ अनुवाद—अतःपर श्रीराधाने जैसे-तैसे वह रात बिताई। प्रातःकाल होनेपर श्रीकृष्ण उनको प्रणिपातपूर्वक सानुनय वचनसे उनके रोषभरे मानको प्रशमित करनेका प्रयास करने लगे, परन्तु श्रीराधा मदनबाणोंसे जर्जरित होनेपर भी विरहवचनोंसे युक्त प्रियकान्त श्रीकृष्णको अपने निकट प्रणतभावसे समुपस्थित देखकर अतिशय असूया (ईर्ष्या) भावसे उनको इस प्रकार कहने लगीं। पद्यानुवाद— किसी तरह दुःख-रात बिताई, हो आया जब भोर। चरणों पर झुकते, अधरों पर हँसते दीखा 'चोर'॥ किन्तु नहीं राधाका इससे नाचा रे मन मोर। हुई क्षुब्ध, सागरमें जैसे लहरोंका हो रहा शोर॥