गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमः सर्गः—विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २७३ हे माधव ! हे कमल-विलोचन ! वनमाली ! रसभीने ! अपनी व्यथा-हारिणीके ढिग जाओ हे परलीने ! बालबोधिनी—पिछली रात श्रीराधा सब कल्पनाजाल रचती रहीं, विरहमें श्रीकृष्णकी बाट जोहती रहीं, श्रीकृष्ण नहीं आये, श्रीराधा विरहसे जर्जरित हो गई, विदीर्ण हो गई, रात भर मदमाते वसन्तकी बयारकी व्यथाका सन्देश-प्रतिसन्देश पहुँचाती रहीं। उस वसन्ती रातमें दसों दिशाओंसे भाँति-भाँतिके फूलोंकी गन्ध और कामके शरोंसे आहत हो गयीं, संकेतस्थल पर विलाप करती रहीं, मिलनेके सपने देखती रहीं, मिलनकी स्मृतियोंमें खोयी रहीं। कैसा अजस्र विरह, इतनेमें ही प्रातःकाल हो गया। कैसी बिडम्बना है कि मानिनी नायिकाओंका मान अपने प्रियतमके समक्ष और भी अभिवर्द्धित हो जाता है। श्रीकृष्ण उनके सामने उपस्थित होकर प्रणाम करते हुए अत्यधिक अनुनय करनेवाले, प्रणतमान होकर सान्त्वना देने लगे, उनके कोपको दूर करनेका प्रयास करने लगे, परन्तु काम-पीड़ासे जर्जरिता श्रीकृष्णके शरीरमें सम्भोगका चिह्न देखकर वे और भी अधिक अधीर हो गयीं। श्रीराधाके चरणोंमें श्रीकृष्णका झुकना प्रेमकी पराकाष्ठा है, श्रीराधाके प्राण कण्ठगत हैं, प्रियके दर्शनसे ही श्रीराधामें असूया भाव प्रवाहित होने लगा और वे कहने लगीं— सप्तदशः सन्दर्भः गीतम् ॥१७॥ भैरवीरागयतितालाभ्यां गीयते। गीतगोविन्द काव्यका यह सत्रहवाँ प्रबन्ध भैरव-राग तथा यति-तालसे गाया जाता है। रजनि-जनित-गुरु-जागर-राग-कषायितमलस-निमेषम्। वहति नयनमनुरागमिव स्फुटमुदित-रसाभिनिवेशम्॥