गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
४. सर्ग ८-९: खण्डिता व कलहान्तरिता
सप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २६९ कर लेना—इसीलिए तुम्हें पञ्चबाणोंसे उपहित किया जाता है। प्राणोंका हरण करना ही तुम्हारा प्रयोजन है। ठीक ही तो है—कामदेव सन्तप्त जनोंको उत्तप्त करके गृहकी ओर उन्मुख करा देता है। पर तुम मुझे कितना भी विवश कर लो, मेरे प्राण भले ही चले जायें, पर मैं घर कभी नहीं जाऊँगी, श्रीकृष्णके चरणोंका आश्रय लूँगी। दोनोंका उपालम्भ देकर कामसे विदीर्ण होकर यमुनासे कहती हैं—हे यमुने ! तुम यमराजकी बहन हो ! मलयानल एवं पञ्चबाण मुझे पीड़ित कर ही रहे हैं, कामदेव सम्भोगकारक हैं, पर वह तो विपरीत आचरणमय हो गया है, मल्यानिल सुखकारक होकर मुझे विकल बना रहा है, उन दोनोंके द्वारा प्राणोंके ग्रहण कर लिये जानेपर तुम भाई यमको क्या उत्तर दोगी ? इसलिए तुम मुझे क्षमा मत करो, तुम अपनी तरङ्गोंसे मेरे अङ्गोंका सिंचन कर दो, मृत देहको अपने सलिलमें समा लो, जिससे गतप्राण मेरे देहका दाह शान्त हो जाय। इस प्रकार श्रीराधा श्रीकृष्ण विरहमें दसवीं दशाको प्राप्त होने लगीं। प्रस्तुत श्लोकमें वसन्ततिलका छन्द तथा अप्रस्तुत प्रशंसा अलङ्कार है। प्रातर्नील-निचोलमच्युतमुर संवीत पीतांशुकं राधायाश्चकितं विलोक्य हसति स्वैरं सखीमण्डले। व्रीडाचञ्चलमञ्चलं नयनयोराधाय राधानने स्मेरस्मेरमुखोऽयमस्तु जगदानन्दाय नन्दात्मजः॥४॥ इति षोडश सन्दर्भः। इति श्रीगीतगोविन्द महाकाव्ये विप्रलब्धा वर्णने नागर-नारायणो नाम सप्तमः सर्गः। अन्वय—[अथैतद्दुःखवर्णनमंसहिष्णुः कविः सिंहावलोकन्यायेन साधारण-केलिरात्रैः प्रातश्चरितवर्णनेन श्रीराधायाः खण्डितावस्थां
२७० श्रीगीतगोविन्दम् वर्णयिष्यन् श्रीराधामाधवयोः प्राक्तन-केल्यनन्तरावरस्थितिवर्णनेन मङ्गलमातनोति]—[कदाचित्] प्रातः (प्रभाते) नीलनीचोलं (नीलं निचोलं वस्त्रं यस्य तादृशं परिहित-राधावसनमित्यर्थः) अच्युतं (हरिं) [तथा] संवीतपीतांशुकं (संवीतम् उत्तरीकृतं श्रीकृष्णस्य पीतम् अंशुकं वस्त्रं यत्र तादृशं) राधाया उरः (वक्षःस्थलं) विलोक्य सखीमण्डले स्वैरं (स्वच्छन्दम् उच्चैरित्यर्थः) [तथा] चकितं (चमत्कृतं यथा तथा) हसति [सति] राधानने (श्रीराधावदने) व्रीड़ाचञ्चलं (व्रीड़या लज्जया चञ्चलं यथा तथा) नयनयोः अञ्चलं (नेत्रप्रान्तं कटाक्षमित्यर्थः) आधाय (विन्यस्य) स्मेर-स्मेर-मुखः (मृदुमन्दसहास्यवदनः) अयं नन्दात्मजः (नन्दनन्दनः) जगदानन्दाय अस्तु (जगतामानन्दं विदधातु) [अतः सर्गोऽयं नागरा एव नरा नरसमूहास्तेषामयनं मूलभूतः श्रीकृष्णो यत्र स इति सप्तमः सर्गः] ॥४॥ अनुवाद—प्रातःकाल विभ्रमवश श्रीकृष्णने श्रीराधाजीका नील उत्तरीय वस्त्र (कञ्चुक) तथा श्रीराधाने अपने वक्षःस्थल पर श्रीकृष्णका पीत उत्तरीय वस्त्र धारण कर लिया, जिसे देख सखीमण्डल स्वच्छन्दतापूर्वक हँसने लगा। उन्हें हँसता हुआ देखकर श्रीकृष्णने मन्दमुस्कानके साथ सलज्ज होकर अपाङ्ग- भङ्गिमासे श्रीराधाके मुखारविन्दके प्रति कटाक्षपात किया। ऐसे नन्दनन्दन श्रीकृष्ण जगतके लिए आनन्दका विधान करें। बालबोधिनी—प्रस्तुत सर्गके अन्तिम श्लोकोंमें वैष्णवोंको कवि जयदेवके द्वारा आशीर्वाद दिया गया है—यह नन्दनन्दन श्रीकृष्ण जगतको आनन्ददायी हों। निकुञ्ज-वनके निकट जयदेवजीके द्वारा श्रीराधा-माधवकी पूर्व-केलिका स्मरण कर प्रातःकालकी स्थितिका निरूपण किया है। कवि जयदेव श्रीराधाका विरह वर्णन करनेमें असमर्थ हो गये, तब सिंहावलोकन न्यायसे रात्रिकालीन साधारण केलिका चित्राङ्कन कर प्रातःकालीन श्रीराधाकी खण्डितावस्थाका दिग्दर्शन कराया
सप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २७१ है। श्रीश्रीराधा-माधव दोनोंने एक साथ रति-केलिके द्वारा पिछली रात बितायी है एवं विभ्रमसे एक-दूसरेके वस्त्र पहन लिये हैं। इस वैचित्र्य परिवर्त्तनसे सखियाँ हँस पड़ीं, उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। अच्युत श्रीकृष्णने अपने तनपर नील-वसन कञ्चुकको धारण किया है और श्रीराधाका उर पीताम्बरसे ढका हुआ है। यह वस्त्र-विनिमय ही सखियोंके स्वच्छन्द हास्यका कारण है। लज्जासे चञ्चल नेत्रोंको श्रीराधाके मुख पर रखते हुए कटाक्षपात कर श्रीकृष्ण मन्द-मन्द मुस्कराने लगे। प्रस्तुत श्लोकमें कवि जयदेवकी लोकमङ्गलकी कामना प्रकट हुई है। हास्य रस, शार्दूल विक्रीड़ित छन्द, स्वभावोक्ति अलङ्कार, नायक शठ एवं नायिका अभिसारिका है। श्रीगीतगोविन्दके सोलहवें सन्दर्भकी बालबोधिनी वृत्ति समाप्त। इति सप्तमः सर्गः।
अष्टमः सर्गः विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः अथ कथमपि यामिनीं विनीय स्मरशरजर्जरितापि सा प्रभाते। अनुनयवचनं वदन्तमग्रे प्रणतमपि प्रियमाह साभ्यसूयम् ॥१॥ अन्वय—[इदानीं श्रीराधायाः खण्डितावस्थां वर्णयति; यदुक्तं— साहित्यदर्पणे—पार्श्वमेति प्रियो यस्या अन्यसम्भोगचिह्नितः। सा खण्डितेति कथिता धीरैरीर्षाकषातिता इति]—अथ (बहुविध- प्रलापानन्तरं) सा स्मरशर-जर्ज्जरितापि (स्मरस्य कामस्य शरेण जर्जरितापि; क्षणमात्रमतिबाहयितुमशक्तापीति भावः) कथमपि (अतिकृच्छ्रेण) यामिनीं विनीय (अतिबाह्य) प्रभाते (प्रातः) अग्रे (पुरतः) अनुनयवचनं (स्वापराधजनित-कोपोप- शमन-वाक्यं) वदन्तमपि, [ततोऽपि प्रसादमनालोक्य] प्रणतमपि [अनेन प्रेम्णः पराकाष्ठा दर्शिता] प्रियं (श्रीकृष्णं) साभ्यसूयं (कण्ठागतप्राणाया अपि प्रियदर्शनमात्रेण असूयोदयात् स यथातथा) आह ॥१॥ अनुवाद—अतःपर श्रीराधाने जैसे-तैसे वह रात बिताई। प्रातःकाल होनेपर श्रीकृष्ण उनको प्रणिपातपूर्वक सानुनय वचनसे उनके रोषभरे मानको प्रशमित करनेका प्रयास करने लगे, परन्तु श्रीराधा मदनबाणोंसे जर्जरित होनेपर भी विरहवचनोंसे युक्त प्रियकान्त श्रीकृष्णको अपने निकट प्रणतभावसे समुपस्थित देखकर अतिशय असूया (ईर्ष्या) भावसे उनको इस प्रकार कहने लगीं। पद्यानुवाद— किसी तरह दुःख-रात बिताई, हो आया जब भोर। चरणों पर झुकते, अधरों पर हँसते दीखा 'चोर'॥ किन्तु नहीं राधाका इससे नाचा रे मन मोर। हुई क्षुब्ध, सागरमें जैसे लहरोंका हो रहा शोर॥
अष्टमः सर्गः—विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २७३ हे माधव ! हे कमल-विलोचन ! वनमाली ! रसभीने ! अपनी व्यथा-हारिणीके ढिग जाओ हे परलीने ! बालबोधिनी—पिछली रात श्रीराधा सब कल्पनाजाल रचती रहीं, विरहमें श्रीकृष्णकी बाट जोहती रहीं, श्रीकृष्ण नहीं आये, श्रीराधा विरहसे जर्जरित हो गई, विदीर्ण हो गई, रात भर मदमाते वसन्तकी बयारकी व्यथाका सन्देश-प्रतिसन्देश पहुँचाती रहीं। उस वसन्ती रातमें दसों दिशाओंसे भाँति-भाँतिके फूलोंकी गन्ध और कामके शरोंसे आहत हो गयीं, संकेतस्थल पर विलाप करती रहीं, मिलनेके सपने देखती रहीं, मिलनकी स्मृतियोंमें खोयी रहीं। कैसा अजस्र विरह, इतनेमें ही प्रातःकाल हो गया। कैसी बिडम्बना है कि मानिनी नायिकाओंका मान अपने प्रियतमके समक्ष और भी अभिवर्द्धित हो जाता है। श्रीकृष्ण उनके सामने उपस्थित होकर प्रणाम करते हुए अत्यधिक अनुनय करनेवाले, प्रणतमान होकर सान्त्वना देने लगे, उनके कोपको दूर करनेका प्रयास करने लगे, परन्तु काम-पीड़ासे जर्जरिता श्रीकृष्णके शरीरमें सम्भोगका चिह्न देखकर वे और भी अधिक अधीर हो गयीं। श्रीराधाके चरणोंमें श्रीकृष्णका झुकना प्रेमकी पराकाष्ठा है, श्रीराधाके प्राण कण्ठगत हैं, प्रियके दर्शनसे ही श्रीराधामें असूया भाव प्रवाहित होने लगा और वे कहने लगीं— सप्तदशः सन्दर्भः गीतम् ॥१७॥ भैरवीरागयतितालाभ्यां गीयते। गीतगोविन्द काव्यका यह सत्रहवाँ प्रबन्ध भैरव-राग तथा यति-तालसे गाया जाता है। रजनि-जनित-गुरु-जागर-राग-कषायितमलस-निमेषम्। वहति नयनमनुरागमिव स्फुटमुदित-रसाभिनिवेशम्॥
२७४ श्रीगीतगोविन्दम् हरि हरि याहि माधव याहि केशव मा वद कैतववादं तामनुसर सरसीरुहलोचन या तव हरति विषादम् ॥ध्रुवम् ॥१ ॥ अन्वय—रजनि-जनित-गुरु-जागर-राग-कषायितम् (रजन्यां जनितेन गुरुणा दीर्घेण जागरेण जागरणेन यो रागस्तेन, तस्यामनुरागेण च कषायितं लोहितीकृतं) [तथा] अलसनिमेषं (अलसेन निमेषः निमीलनं यत्र तं) [तथाच] उदितरसाभिनिवेशं (उदितः प्रकटितः रसाभिनिवेशः तस्याः सुरते अभिनिवेशः येन तथाभूतं) तव नयनं स्फुटम् (अभिव्यक्तम्) अनुरागं बहतीव (धारयतीव); [तां प्रति तव हृदि स्थितोऽनुरागः प्राचुर्यात् अरविन्दचक्षुषा निर्गत इव प्रतीयते इति भावः]; हे माधव [त्वं] याहि, हे केशव [त्वं] याहि [द्विरुक्त्या कोपाधिक्यं सूचितम्]; कैतववादं (त्वदेकपरायणोऽहमिति कपटवचनं) मा वद; हे सरसीरुहलोचन (कमललोचन; दृष्टिपातमात्रेणैव मुग्धस्त्रीजनवञ्चनपरायण इत्यभिप्रेत्यर्थः) हरि हरि (खेदे) [त्वत्तोऽपि वञ्चनचतुरा] या [सहजप्रेमानभिज्ञस्य] तव विषादं (कापट्यापादितवैमनस्यं) हरति, ताम् (तव चित्तानुरूपचतुरव्यापारां कान्ताम्) अनुसर (अनुगच्छ) ॥१ ॥ अनुवाद—हे हरि ! (अपनी सुललित नयन-भङ्गिमासे अबलाओंके मनको हरण करनेवाले) मुझे खेद है। हे माधव ! जाओ ! हे केशव ! चले जाओ ! तुम झूठ मत बोलो ! जो तुम्हारे दुःखका हरण कर सकती है, तुम उसीके पास चले जाओ ! रात्रिमें बहुत अधिक जागरणके कारण अलसतामय मन्द-मन्द निमीलित, रति रसावेश संयुक्त आरक्त नयन उस ब्रजसुन्दरीके प्रति प्रबलानुरागको अभी भी प्रकाशित कर रहे हैं। पद्यानुवाद— नैश जागरणसे रतनारी बनी सखे ! हैं आँखें। रह-रहकर झप-झप उठती है मृदु पलकोंकी पाँखें ॥
अष्टमः सर्गः-विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २७५ छलक रही अनुराग माधुरी अलसाई 'कोरों' से। वह कौन बँधी सी झलक रही है रेशमके डोरोंसे ॥ हे माधव ! हे कमल विलोचन ! वनमाली ! रसभीने !। अपनी व्यथाहारिणीके ढिंग, जाओ हे परलीने ! ॥ बालबोधिनी-श्रीकृष्णकी आँखें रातभर जागनेके कारण और विरहानुभूतिसे लाल हो गयी हैं और अलसता हेतु बार-बार मुँदी जा रही हैं, ऐसी अनुरञ्जित आँखोंको देखकर श्रीराधा श्रीकृष्णको भावोंकी सार्थकता हेतु कई नामोंसे सम्बोधित करती हैं-सपत्नी विषयक ईर्ष्या प्रकट करती हैं। हरि ! हरि !-ये दोनों अव्यय पद 'खेद' प्रकट करनेके लिए प्रयुक्त हुए हैं। गान छन्दको पूर्ण करनेके लिए भी स्तोभ रूपमें इनका प्रयोग हो सकता है। खण्डिता श्रीराधा अपने सम्मुख प्रणतवान अपने प्रियसे कहती हैं-हे माधव ! हे लक्ष्मीपति ! जाओ ! चले जाओ ! आप अन्यासक्त हैं, किस प्रकार दूसरोंकी प्रताड़ना करोगे-यह 'मा' शब्दसे द्योतित होता है। अथवा मा अर्थात् लक्ष्मी स्वभावसे चञ्चला हैं, उनके पतिका भी चञ्चल होना युक्तिसंगत ही है। मैं एक पतिपरायणा हूँ, आप मुझसे किस प्रकार स्नेह कर सकते हैं? अतः चले जाओ। इस प्रकार दोषारोप और तिरस्कार कर पुनः असन्तुष्ट होकर कहने लगीं-हे केशव ! चले जाओ ! प्रशस्त हैं केश जिसके, उसमें अनुरक्त रहने वाले-यह 'केशव' शब्दकी व्युत्पत्ति होती है। आप किसी केशसंस्कारवती स्वैरिणीमें रत रहें-यहाँ 'केशव' शब्दमें व्यङ्ग है। अतः हे केशव अर्थात् हे बहुबल्लभ ! मुझ एक-परायणासे इस कैतववादसे क्या प्रयोजन-छल-वाक्य मत बोलो। मुझ दुःखीमें रोष क्यों है, यदि यह आशङ्का करते हो, तो सुनो-ऐसा नहीं है। हे सरसीसहलोचन ! अर्थात् कुमुदलोचन जो तुम्हारा विषाद हर लेती है, उसी (प्रिया, बहुबल्लभ) का अनुसरण करो। अनुरूपका अनुरूपामें ही
२७६ श्रीगीतगोविन्दम् अनुरूप प्रेम होता है। श्लोकमें 'सरसीरुहलोचन' शब्द कहा गया है। सरसीरुह शब्द 'कमल' एवं 'कुमुद' दोनोंका समान रूपसे वाचक है। श्रीकृष्णका कमललोचनत्व प्रख्यात है, किन्तु श्रीराधाको तो यहाँ सरसीरुह शब्दसे कुमुद रूपी अर्थ ही अभिप्रेत है। कुमुद रात्रिभर विकसित रहता है और दिवसको देखकर मुकुलित हो जाता है। श्रीकृष्ण भी चन्द्रवंशी हैं, अतः रात किसी नायिकाके साथ चन्द्रमाके समान ही जागकर बितायी है। पुनः श्रीराधा श्रीकृष्णसे कहती हैं-तुम्हारी आँखोंमें अनुराग अभी भी दिखायी दे रहा है, रागकी लालिमारूपी दोष अभी भी विद्यमान है, तत्कालीन उदित शृङ्गार रसका अनुरागमय अभिनिवेश अभी भी आँखोंमें लक्षित हो रहा है। जैसा चित्त वैसी चतुराई। उन तीन सम्बोधनोंकी व्याख्या इस प्रकार भी होती है- माधव-आप हमारे 'धव' अर्थात् पति नहीं हैं, पति होते तो क्या वञ्चना करते। यथार्थमें 'मा' अर्थात् श्रीराधा और 'धव' उनके प्राणप्रियतम हैं। केशव-जो प्रकृष्ट वेश-भूषाको धारण करते हैं, सदा ही जिनके केश मुक्त हैं। सरसीरुहलोचन-सदा आनन्दमें डूबे हुए होनेके कारण अर्द्धनिमीलित नेत्रवाले हैं। हाय ! रातभर जिसने करुणा बरसाई है, उसीके पास जाओ। यह सुनकर श्रीकृष्ण बोले-मैं तुमसे एक प्राण और एक शरीर हूँ। राधे ! मैं सच कहता हूँ कि मैंने किसी दूसरी स्त्रीका सङ्ग नहीं किया, मेरी आँखें हैं ही लाल रङ्गकी, किसी अङ्गनाके साथ जागरणके कारण नहीं, अलसतासे आँखें मुँद रही हैं॥१॥
अष्टमः सर्गः-विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २७७ कज्जल-मलिन-विलोचन-चुम्बन-विरचित-नीलिम-रूपम्। दशन-वसनमरुणं तव कृष्ण! तनोति तनोरनुरूपम्॥ हरि हरि याहि माधव.....॥२॥ अन्वय-[त्वच्चिन्तयैव जागरानेत्रे मे रागः, नतू अन्यस्या रतिरागादितिचेत् तत्राह]-हे कृष्ण, कज्जल-मलिन-विलोचन- चुम्बन-विरचित-नीलिमरूपम् (कज्जलेन मलिनयोः विलोचनयोः नेत्रयोः तस्या इति शेषः, चुम्बनेन विरचितं नीलिमरूपं यत्र तादृशं) तव अरुणं (सहजलोहितं) दशनवसनं (अधरः) [अधुना] तनोः (तव शरीरस्य) अनुरूपं (सदृशरूपं श्यामतामित्यर्थः) तनोति (व्यनक्ति) [हरि हरि याहि माधव याहीत्यादि सर्वत्र योजनीयम्]॥२॥ अनुवाद-आपकी दशन-पंक्तिके-वसन स्वरूप अरुण वर्णके सुन्दर अधर व्रजयुवतियोंके काजलसे अञ्जित नयनोंके चुम्बन करनेसे कृष्णवर्ण होकर आपके शरीरके अनुरूप ही कृष्णताको प्राप्त हो रहे हैं। पद्यानुवाद- उसकी कजरारी आँखोंके चुम्बनसे हैं काले। अरुण अधर ये छली! तुम्हारे, दीख रहे मतवाले॥ बालबोधिनी-श्रीराधा अपने अन्तरमें खण्डिताका आरोप करके बड़े मर्मभेदी व्यङ्गवाणोंसे माधवको भेदने लगती हैं-कृष्ण! कपटताकी आवश्यकता नहीं है। यदि तुम यह कहते हो कि दूसरी किसी भी रमणीके साथ मैंने रात नहीं बितायी है तो ये आँखें इतनी लाल-लाल क्यों हो रही हैं? उसी अनुरागिणीके प्रति अभी भी तुम्हारा प्रेम तुम्हारी आँखोंमें झलक रहा है। श्रीकृष्ण कहने लगे-प्रिये! मैं सच कहता हूँ कि मैंने किसी भी रमणीके साथ रात्रि जागरण नहीं किया, अलसताके कारण मेरी आँखें बन्द हो रही हैं। श्रीराधा कहने लगीं-पुनः यह तुम्हारे लाल अधर काले क्यों हो रहे हैं? तुम्हारे शरीरके अनुरूप रातभर उसकी काजल-अँजी
२७८ श्रीगीतगोविन्दम् आँखोंका तुमने चुम्बन किया है। जाओ, उसीके पास जाओ, जिसने तुम्हारी आँखोंको रङ्गा है, इन होठोंको रंगा है, रातभर अपनी करुणा बरसायी है, मुझसे झूठी बातें मत करो, जाओ! रति रसावेशमें संयुक्त हुए आपके आरक्त नयन उस ब्रजसुन्दरीके प्रति प्रबल अनुराग रूप रंगसे रंजित होकर प्रकाशित हो रहे हैं। वपुरनुहरति तव स्मर-सङ्गर-खरनखरक्षत-रेखम्। रकत-शकल-कलित-कलधौत-लिपेरिव रति-जयलेखम्॥ हरि हरि याहि माधव.....॥३॥ अन्वय—[त्वच्चिन्ताशोकेन मलिनोऽयमधरो नतु अन्यनारीनेत्र- चुम्बनादित्याह]—स्मर-सङ्गर-खर-नखर-क्षतरेखं (स्मरसङ्गरे मन्मथयुद्धे खरैः तीक्ष्णैः बाणैरिव नखरैः क्षतान्येव रेखाः यस्मिन् तत्) तव वपुः (शरीरं) मरकत-शकल-कलित-कलधौत- लिपेरिव (मरकतशकले नीलमणिखण्डे कलिता अर्पिता या कलधौतस्य सुवर्णस्य लिपिः अक्षरविन्यासः तस्या इव) रतिजयलेखं (रतेः जयलेखम् विजयपत्रम्) अनुहरति (सदृशीकरोति) [वपुषः कृष्णत्वात् नखक्षतस्य रक्तत्वाच्च मरकतार्पितलिपेः साम्यम्] ॥३॥ अनुवाद—आपका यह श्यामल शरीर कामकेलिके समय रतिरणनिपुणा कामिनीके प्रखर नखोंसे रेखाङ्कित हुआ है, ऐसा प्रतीत होता है, मानो मरकतमणिरूपी दीवार पर स्वर्णलिपिसे रति-जय-लेख अंकित कर दिया हो। पद्यानुवाद— स्मर-संगर-खर नख-क्षत-रेखा अंकित वपु पर ऐसे। नील पटल पर रति-जय लेखा, स्वर्ण-लिखित हो जैसे॥ हे माधव! हे कमल-विलोचन! वनमाली! रसभीने! अपनी व्यथा-हारिणीके ठिग जाओ हे परलीने! बालबोधिनी—श्रीराधा कहती हैं—हे कृष्ण! तुम्हारा अंग-अंग तुम्हारी काम-केलिकी कहानी कह रहा है। उस रमणीने
अष्टमः सर्गः—विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २७९ आपके वक्षःस्थल पर तीक्ष्ण नखक्षत किया है—ऐसा लग रहा है कि तुम्हारा हृदय रणभूमि है, यहाँ विकट युद्ध हुआ है। नीलवर्ण आपके वपुपर उस रमणीके द्वारा किये गये नख-क्षतोंकी लालिमामयी तीक्ष्ण रेखाएँ ऐसी प्रतीत हो रही हैं, मानो मरकतमणिकी नीली शिलापर स्वर्ण-मसिसे लिखी हुई लिपि हो, रतिजयपत्री हो। यह जय-लेख अपना विजय-सन्देश कह रहा है। कामीके प्रति कामिनीका भेजा गया यह केलिलेख—'मैंने रतिक्रीड़ामें इसे सम्पूर्णरूपेण जीत लिया है। कामिनीके द्वारा दूतरूपमें भेजे जानेके कारण 'अधमत्व' ही व्यंग्यार्थसे सूचित हो रहा है। 'खर' शब्दसे श्रीराधाका विशेष अभिप्राय है—एक तो इससे विलासभङ्गता सूचित होती है, दूसरे नख-आघात-क्षत ऐसे होने चाहिए, जिसमें तीक्ष्णता न हो, अपितु मृदुता हो। तीक्ष्णता तो कष्टदायिनी होती है। लगता है उस रमणीको रतिविलासका ज्ञान है ही नहीं। तुम जाओ! श्रीकृष्णने उत्तर दिया—राधे! मैं तुम्हें कंटकाकीर्ण वनोंमें खोज रहा था, वहीं काँटोंसे मेरा शरीर क्षतविक्षत हो गया है, ये किसी रमणीके नख-क्षत नहीं हैं। चरणकमल-गलदलक्तक-सिक्तमिदं तव हृदयमुदारम्। दर्शयतीव बहिर्मदन-द्रुम-नव-किसलय-परिवारम् ॥ हरि हरि याहि माधव..... ॥४॥ अन्वय—[त्वान्वेषणे भ्रमणात् वने ममेदं वपुः कण्टकैः क्षतं नतु नखक्षतानीमानीति चेत् तन्न]—इदं तव उदारं (मनोहरं) हृदयं [तस्याः] [प्रेमोल्लासतः] चरण-कमल-गलदलक्तक -सिक्तं (चरण-कमलाभ्यां गलता स्रवता अलक्तकेन सिक्तम्); [अतएव] मदनद्रुम-नव-किशलय-परिवारं (मदनद्रुमस्य हृदयस्थस्य कामवृक्षस्य नवकिशलय-परिवारं बालपल्लवसमूहं) [हृदयात्] बहिः दर्शयतीव (प्रकटयतीव) ॥४॥ अनुवाद—आपके प्रशस्त हृदयपर वराङ्गनाके चरण-कमलोंके
२८० श्रीगीतगोविन्दम् अलक्तक रससे रञ्जित लोहित वर्ण चिह्न ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, मानो आपके अन्तःकरणमें अवस्थित बद्धमूल मदन-वृक्षके अरुण-वर्ण नूतन पल्लव बाहर अभिव्यक्त हो रहे हैं। पद्यानुवाद— कमल चरणके स्रवित अलकासे उर भीगा (क्या सीखे) ? अन्तरका स्मर-तरु-किसलय सा छाया बाहर दीखे ॥ बालबोधिनी—श्रीराधा व्यंग्यपूर्वक श्रीकृष्णसे कहती हैं—अहो, आपका हृदय अति उदार है—कैसा मनोहर स्वरूप धारण किया है ! आपने तो अति प्रेमोल्लाससे औदार्यको अभिव्यक्त करते हुए उस कामिनीके चरणकमलोंको ही हृदयमें धारण कर लिया है। उसके चरणोंसे स्रवित आलता-रसका लाल रंग आपके वक्षःस्थलको रञ्जित कर रहा है। श्याम-वर्ण पर जावक-रसका लाल-वर्ण तुम्हारी शोभाको और भी अभिवृद्धि कर रहा है। ऐसा लगता है, तुम्हारा हृदयस्थित अनुराग ही कामतरुके नव-नव किसलयोंकी भाँति लाल वर्णके रूपमें बाहर प्रकाशित हो रहा है। तुम्हारे हृदयमें विद्यमान कामवृक्षके नवीन पल्लव बाहर निकल रहे हैं। यह तुम्हारे अन्तःकरणका निषिद्ध प्रेमव्यापार मदन-वृक्षके रूपमें तुम्हारी हृदयस्थली पर उग आया है। इन चरण-चिह्नोंके रूपमें इस वृक्षके नये-नये लाल-लाल पल्लव दिखायी दे रहे हैं। तुम उस अनुरागको छिपा नहीं पा रहे हो। तुम्हारे लिए यहाँ कुछ नहीं है, जाओ ! कुछ टीकाकारोंके मतानुसार इस कथनके द्वारा श्रीराधाका अभिप्राय यह है कि श्रीकृष्ण द्वारा उस नायिकाके साथ क्रोध नामक बन्धविशेषसे रमण किया गया है। श्रीकृष्णने अपनी निर्मलता प्रस्तुत करते हुए कहा—यह तो गैरिकादि धातुओंका चित्रचिह्न है, मैंने किसी भी अङ्गनाके चरणकमलोंको धारण नहीं किया, न ही किसीके महावरको हृदयमें लगाया है।
अष्टमः सर्गः—विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २८१ दशन-पदं भवदधर-गतं मम जनयति चेतसि खेदम्। कथयति कथमधुनापि मया सह तव वपुरेतदभेदम्॥ हरि हरि याहि माधव..... ॥५॥ अन्वय—[गैरिकचित्रितमेतत् नान्याङ्गना-चरणालक्तक- सिक्तमितिचेत् तत्राह]—एतत् (प्रत्यक्षदृष्टं) तव वपुः (शरीरं) अधुनापि (एवं भावान्तरमापतितेऽपि) मया सह अभेदं (ऐक्यं; नावयोर्भेद इति) कथं कथयति (सूचयति); (तस्याः तत्कथनप्रकारमाह; यतः] भवदधरगतं दशनपदं (दन्तक्षतं) मम चेतसि खेदं जनयति [व्यङ्गोक्तिरियम्; त्वदधरस्थितस्य मच्चित्तव्यथाजनकत्वात् अभेदो ज्ञायते; नयनरागादिकं छद्मना आच्छादितम् इदन्तु उदितचन्द्र कलावत् प्रकाशमानमिति भावः] ॥५॥ अनुवाद—उस विलासिनीके दन्त आघातसे आपके अधर क्षत-विक्षत हो रहे हैं, जिन्हें देख मेरे अन्तःकरणमें खेद उत्पन्न होता है और अब भी, आप कहते हैं कि तुम्हारा शरीर मुझसे पृथक् नहीं है, अभिन्न है। पद्यानुवाद— लख अधरों पर दन्तक्षतोंको छिद जाता जी मेरा। फिर भी क्यों कोई कहता है, ‘राधे! है हरि तेरा॥’ हे माधव! हे कमल-विलोचन! वनमाली! रसभीने! अपनी व्यथाहारिणीके ढिग जाओ हे परलीने!! बालबोधिनी—हे कृष्ण! नयन राग इत्यादिको तुम छल-छद्म वाक्योंसे आच्छादित कर सकते हो, परन्तु उस विलासिनीके दाँतोंसे क्षत-विक्षत अधर-पल्लवको कैसे छुपा पाओगे जो चन्द्रकलाकी भाँति प्रकाशित हो रहा है? तुम्हारी यह निर्लज्ज हँसी मेरे चित्तमें दाह पैदा करती है, सुरतकालमें तुम्हारे होठों पर उस रमणीके ‘दशन’ की छाप मुझमें खेद उत्पन्न कर रही है, विरहके कारण मेरी दशा दशमी स्थिति तक पहुँच गयी है। बार-बार यही कहते हो—हम-तुम एक
२८२ श्रीगीतगोविन्दम् हैं—पर इस स्थितिमें तुम अभेद कैसे अभिव्यक्त कर सकते हो—तुम चले जाओ। श्रीकृष्णने सफाई दी—प्रिये ! यह तो सौरभलुब्ध भ्रमरोंके द्वारा दंशन कर लिये जानेसे ही मेरे अधर क्षत हो रहे हैं, इन अधरों पर किसी रमणीका दंशन नहीं है। बहिरिव मलिनतरं तव कृष्ण मनोऽपि भविष्यति नूनम्। कथमथ वञ्चयसे जनमनुगतमसमशरज्वरदूनम् ॥ हरि हरि याहि माधव..... ॥६ ॥ अन्वय—[सौरभलुब्धभ्रमरेण दृष्टोऽयमधरो नतु अन्यनायिका- चुम्बनादितिचेत्, तदपि न]—हे कृष्ण तव [मलिनात्मकं] मनः अपि बहिरिव बाह्यं शरीरमिव) नूनं (निश्चितं) मलिनतरं (कृष्णं) भविष्यति। अथ (अन्यथा) अनुगतं (त्वदेकायत्तं) असम-शर-ज्वरदूनं (असमशरस्य कामस्य ज्वरेण दूनं सन्तप्तं) [मां] कथं वञ्चयसे (प्रतारयसि) (शुद्धान्तःकरणस्य नेयं रीतिरित्यर्थः] ॥६ ॥ अनुवाद—हे कृष्ण! जैसे तुम्हारा शरीर मलिन है, वैसे ही तुम्हारा मन भी अवश्य ही मलिन हो गया होगा। यदि ऐसा न होता तो मदन-शरसे जर्जरित अपने अनुगत (आश्रित) जनकी इस प्रकार वञ्चना न करते। पद्यानुवाद— मन भी तन सा कृष्ण! तुम्हारा बना हुआ है काला। अपनी जान जलाते रहते (पड़ा निठुरसे पाला) ॥ बालबोधिनी—श्रीराधा खेदको प्राप्त होकर श्रीकृष्णसे कहती हैं—हे कृष्ण ! बाहरसे तुम जितने काले हो, अन्दरसे तुम उससे भी अधिक काले हो। स्वभावतः उदार एवं उज्ज्वल मन मेरे प्रति इतनी उदासीनता कैसे बरत सकता है ? अपने ही अनुकूल, अपने ही आश्रितजनके साथ इतना छल, मेरी उपेक्षा कर परायी रमणीके साथ विलास, जो
अष्टमः सर्गः-विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २८३ मलिन-मन होता है, वही अपने आश्रित व्यक्तिके साथ छल कर सकता है। मैं तो पहलेसे ही काम-शरोंसे पीड़िता हूँ, कमसे कम इस स्थितिमें तो धोखा नहीं देना चाहिए। जाओ छलिया! तुम यहाँसे चले जाओ। कोई शुद्ध अन्तःकरण वाला व्यक्ति ऐसा कभी नहीं कर सकता। श्रीकृष्णने कहा-राधे ! मुझपर व्यर्थ ही शंका मत करो, मैं कभी भी तुम्हारी वञ्चना नहीं कर सकता हूँ। भ्रमति भवानबला-कवलाय वनेषु किमत्र विचित्रम्। प्रथयति पूतनिकैव वधू-वध-निर्दय-बाल-चरित्रम् ॥ हरि हरि याहि माधव..... ॥७॥ अन्वय-[न वञ्चयाम्यहं त्वमेव मुधा शङ्कसे इत्यत आह]-भवान् अबला-कवलाय (अबलानां कवलाय ग्रासाय कान्तावाधायेति यावत्) वनेषु भ्रमति अत्र [विषये] किं विचित्रं [न किमपीत्यर्थः]; [अत्र उदाहरणमाह]-पूतनिका (पूतना) एव वधु-वध-निर्दय-बालचरित्रं (वधुवधे नारीहत्यायां निर्दयं बालचरित्रं) [कियत्] प्रथयति (विस्तारयति) [नतु सर्वमित्यर्थः]; [बाल्ये चेदेवं कैशोरे किमत्र विचित्रमिति भावः] ॥७॥ अनुवाद-आप अबलाओंका बध करनेके लिए ही वन-वनमें भ्रमण कर रहे हो, इसमें आश्चर्य ही क्या है! बाल्य-चरित्रमें ही आपने पूतनाका वध करके अपने निर्दय निष्ठुर स्वभावका परिचय दिया है, नारीबधपरायणता तो आपके चरित्रमें है ही। पद्यानुवाद- अबला-वधकी साध लिये, तुम वन वन डोल रहे हो। बालचरितका प्रथम पृष्ठ क्या फिरसे खोल रहे हो? ॥ हे माधव! हे कमल-विलोचन! वनमाली! रसभीने! अपनी व्यथाहारिणीके ढिग जाओ हे परलीने!।। बालबोधिनी-पुनः श्रीराधाने कहा-यह तो आपकी स्वभावसिद्धता ही है कि वनोंमें आप अबलाओंको 'ग्रसने'
२८४ श्रीगीतगोविन्दम् के लिए, उनका बध करनके लिए ही घूमते हैं, मेरा भी बध कर रहे हो तो इसमें वैचित्र्य ही क्या है? आपने तो अपने बाल्यकालमें ही कंस-भगिनी, युद्धप्रिया पूतनाका बधकर ख्याति पायी है, तो मेरी जैसी अबलाका बध करना तो कितना आसान है। जब ऐसी प्रबला आपके द्वारा कालकवलित हो गयी, तो मेरी जैसी अबलाका बध करनेमें आश्चर्य ही क्या है? शास्त्रोंमें स्त्री-बध निषिद्ध कहा गया है, निन्दनीय माना गया है, पर आपकी यह नृशंसता तो जन्मसिद्ध ही है। कृपाकर चले जाओ। अब तो आप युवक हैं, ऐसी स्थितिमें मुझ जैसी स्त्रीका बध करनेमें आपको कोई प्रयास भी नहीं करना पड़ेगा। हे निष्ठुर ! अब रहने भी दो। श्रीजयदेव-भणित-रति-वञ्चित-खण्डित-युवति-विलापम्। शृणुत सुधा-मधुरं विबुधा ! विबुधा लयतोऽपि दुरापम् ॥ हरि हरि याहि माधव..... ॥८॥ अन्वय—हे विबुधाः (श्रीकृष्णमधुरलीलास्वादचतुराः; देवा वा) सुधामधुरं (सुधायाः अपि मधुरं) [अतएव] विबुधालयतोऽपि (स्वर्गादपि; अत्र सप्तम्यास्तसिः) दुरापं (दुर्लभं) [श्रीराधाकृष्णो- पासनालभ्यत्वात्; तत्रेदं नास्तीति भावः] श्रीजयदेव-भणित- रतिवञ्चितखण्डित-युवति-विलापं (श्रीजयदेवेन भणितम् उक्तं रतिवञ्चितायाः खण्डितायाः युवत्याः श्रीराधायाः विलापं) शृणुत। (आकर्णयत) ॥८॥ अनुवाद—हे विद्वानों ! श्रीजयदेव कवि द्वारा विरचित खण्डिता, रतिवञ्चिता युवती श्रीराधाका अमृतसे भी अधिक सुमधुर एवं सुरलोकमें भी सुदुर्लभ विलापका श्रवण करें। पद्यानुवाद— जयदेव कथित रति-वंचित खंडित युवती जनका— विलाप है, छू लेता जो अन्तर भावुक मनका ॥
अष्टमः सर्गः—विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २८५ बालबोधिनी—यहाँ कवि श्रीजयदेवने विद्वानों अथवा देवताओंको सम्बोधित करते हुए कहा है—हे विद्वानों ! अभिलषणीय रतिसे वञ्चित खण्डिता युवतीके विलापको सुनो, यह विलाप अमृतसे भी अधिक मधुर है। श्रीकृष्णके द्वारा उपेक्षिता श्रीराधा रति-क्रीड़ासे वञ्चित हुई हैं, अतः अपने प्रियतमकी विरह-वेदनामें जो वह विलाप कर रही हैं, उस सुधाका रसास्वादन देवलोकमें कदापि संभव नहीं है। देवलोकमें सर्वाधिक सुमधुर वस्तु अमृत है, पर श्रीराधाके विलापकी तुलनामें वह अमृत नगण्य है, इसे तो मनुष्य-तनसे इस भौम जगतमें ही प्राप्त किया जा सकता है। अतः जो विद्वान अमृत-प्राप्तिके लिए, सुरतकी उपलब्धिके लिए लालायित रहते हैं, उन्हें इस अतुलनीय भौम-सुधाका पान अवश्य ही करना चाहिए। प्रस्तुत प्रबन्धकी नायिका श्रीराधा खण्डिता है, जिसका लक्षण है— निद्रा-कषाय-मुकुलीकृत-ताम्रनेत्रो नारी-नखव्रणविशेष-विचित्रताङ्गः । यस्याः कुतोऽपि पतिरेति गृहं प्रभाते सा खण्डेति कथिताकविभिः पुराणैः ॥ अर्थात् निशा जागरणके कारण रातमें जिसकी निद्रा पूरी न हो सकी, वह लाल नेत्रोंवाला, अन्य रमणीके नख-क्षतोंके चिह्नोंसे विशेष विचित्र अङ्गोंवाला, किसी नायिकाका पति (प्रियतम) कहींसे प्रातःकाल जब गृहमें प्रवेश करता है, उस नायिकाको कवियोंने खण्डिता कहा है। इस गीतगोविन्द काव्यके सत्रहवें प्रबन्धका नाम 'लक्ष्मीपति- रत्नावली' है। इसमें मेघराग है, विप्रलम्भ नामका शृङ्गार और करुण रस है। तवेदं पश्यन्त्याः प्रसरदनुरागं बहिरिव। प्रिया-पाद-लक्त-च्छुरितमरुणद्योति-हृदयम् ॥
२८६ श्रीगीतगोविन्दम् ममाद्य प्रख्यातप्रणयभरभङ्गेन कितव। त्वदालोकः शोकादपि किमपि लज्जां जनयति ॥१॥ अन्वय—हे कितव (धूर्त्त) प्रियापादालक्तकच्छुरितं (प्रियायाः तस्याः नायिकायाः पादालक्तेन चरणालक्तक-रसेन च्छुरितं व्याप्तं) [सुतरां] अरुणद्योति (अरुणं द्योतयतीति अरुणकान्ति) (अतएव) बहिः प्रसरदनुरागमिव (प्रसरन् प्रवृद्धिं गच्छन् अनुरागः यस्मात् तथाभूतम्इव) [तव अनुरागो हृदयं भित्त्वा बहिर्निर्गत इव इति भावार्थः] तव हृदयं पश्यन्त्याः [तवागमन प्रतीक्षमाणायाः] मम अद्य त्वदालोकः (तव दर्शनं) प्रख्यात- प्रणयभरभङ्गेन (प्रख्यातस्य प्रसिद्धस्य प्रणयस्य यः भरः आतिशय्यं तस्य भङ्गेस्तेन हेतुना) शोकादपि (त्वद्वियोगदुःखादपि) किमपि (अनिर्वचनीयां जीवन-मरणयोः सन्देहापादिकां) लज्जां जनयति ॥१॥ अनुवाद—हे शठ ! आज प्रिय व्रजाङ्गनाके चरणोंके अलक्तक रसमें रञ्जित आपका अरुण द्युतिसे युक्त हृदय आपके हृदयस्थित प्रबल अनुरागको बाहर प्रकट कर रहा है, जिसे देखकर आपका मेरा चिर-प्रसिद्ध प्रणय विच्छेदित हो रहा है। इससे मेरे चित्तमें शोककी अपेक्षा लज्जा ही अधिक उद्भूत हो रही है। पद्यानुवाद— देख तुम्हारे उर पर ‘उसके’ चरण-कमलकी छाया। भीतरका ही प्रेम-भाव ज्यों बाहर होकर आया। हुआ न मुझको शोक, हुई मैं लज्जासे अति नीचे मेरे रहते कौन सुहागिनि मेरे पियको खींचे॥ बालबोधिनी—अब खण्डिता होने पर भी राधिका प्रौढ़त्वका आलम्बन करके श्रीकृष्णपर आक्षेप करती हुई कहती है—हे कितव! हे कपटी! तुम्हारा अवलोकन न करने पर तुम्हारे आगमनकी प्रतीक्षा करते-करते मेरे सुविख्यात प्रणयका अब विच्छेद होने जा रहा है। तुम्हारा विच्छेदजनित दुःख भी मुझे अनिर्वचनीय जैसा ही हो रहा है, कैसे कहूँ, जीवन-मरणका
अष्टमः सर्गः—विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २८७ प्रश्न-सा लग गया है, कैसा संकट उपस्थित हुआ है, न जी पा रही हूँ, न मर पा रही हूँ। हे धूर्त ! तुम्हें इस दशामें देखकर मुझे शोक भी उतना नहीं होता, जितनी कि लज्जा अनुभूत होती है। आपने जिस कामिनीके साथ रमण किया, उसके चरणोंको अपने वक्षःस्थल पर धारण किया, उसके पैरोंकी महावरसे आपका वक्षःस्थल राग-रञ्जित हो गया है। इस अरुणोदय कालमें सन्ध्याकालीन अरुण-द्युतिको देखकर ऐसा लग रहा है कि जो अनुराग आपने अपने हृदयमें वहन किया था, वह आज बाहर प्रकट हो गया है। जहाँ आप कौस्तुभमणि धारण किया करते थे, वहाँ उस प्रेयसी उपभोग चिह्नोंको देखकर मैं लज्जासे गढ़ी जा रही हूँ। जिस अनन्य प्रणयके अपार गर्वसे मैं अमर्यादित रूपसे आह्लादित हुआ करती थी, आपने अपने इस गर्हित आचरणसे उस प्रेमका सूत्र ही तोड़ दिया, उसका उपभोग करके आपको लज्जा भी नहीं आती। धन्य हो कृष्ण ! चले जाओ ! हे छलिया ! मैंने तुमसे ही क्यों प्रीति की ? प्रस्तुत श्लोकमें शिखरिणी छन्द है। अग्रिम श्लोकमें श्रीकृष्णने विचार किया—इतना प्रयत्न करके भी श्रीराधाके अत्यन्त प्रगाढ़ मानका निर्बन्ध दूर नहीं हो रहा है। अतः अब बंशी दूतीकी सहायता लेनी पड़ेगी। दूसरा कोई उपाय नहीं सूझ रहा है, बंशी-ध्वनिसे राधिकाका मान अवश्य ही दूर होगा—ऐसा विचारकर कवि जयदेव बंशीध्वनिके द्वारा आशीर्वादका विस्तार कर रहे हैं। अन्तर्मोहन-मौलि-घूर्णन-चलन्मन्दार-विस्रंशन स्तब्धाकर्षण-दृष्टिहर्षण-महामन्त्रः कुरङ्गीदृशाम्। दृप्यद्दानव-दूयमान-दिविषद्-दुर्वार-दुःखापदां भ्रंशः कंसरिपोह्व्यापोयतु वः श्रेयांसि वंशीरवः ॥२॥ इति सप्तदश सन्दर्भः। इति श्रीगीतगोविन्दे महाकाव्ये खण्डितावर्णने विलक्ष- लक्ष्मीपतिर्नामाष्टमः सर्गः।
२८८ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—[अथ वंशीरवश्रवणेन श्रीराधिकायाः अतिगाढ़ोऽपि मानः अपयास्यतीति कविः वंशीध्वनिं वर्णयन् आशिषमातनोति]— कुरङ्गी-दृशाम् (मृगलोचनानाम्) अन्तर्मोहन-मौलि-घूर्णन- चलन्मन्दार-विस्रंसन-स्तब्धाकर्षण-दृष्टि-हर्षण-महामन्त्रः (अन्तर्मोहने मनोमोहने मौलि-घूर्णने साधु साधु इति शिरःकम्पने चलतां मन्दाराणां देवतरु-कुसुमानां विस्रंसने तथा स्तब्धे स्तम्भे, आकर्षणे, तथा दृष्टिहर्षणे वशीकरणे महामन्त्रः) [तथा] दृप्यद्दानवदूयमान-दिविषद्-दुर्वार-दुःखापदां (दृप्यद्भिः दर्पपूर्णैः दानवैः दूयमानानां पीड्यमानानां दिविषदां देवानां दुर्वारणां दुःखापदाम् अनिवार्यदुःखपङ्क्तीनां) भ्रंशः (ध्वंसः नाशक इत्यर्थः) [वंशीरव-श्रवणमात्रेणैव देवाः दैत्यभयात् मुच्यन्ते इति भावः] कंसरिपोः (श्रीकृष्णस्य) वंशीरवः वः (युष्माकं) श्रेयांसि (शुभानि) व्यपोहयतु (विगतविघ्नानि करोतु) [अतएव विलक्षो गाढ़मानविलोकाद् विस्मयान्वितो लक्ष्मीपतिः श्रीराधापतिर्यत्र सः इति अष्टमः सर्गः] ॥२॥ अनुवाद—गोपियोंके अन्तःकरणको मोहनेवाली, मौलिस्थित मणिमय किरीटोंको घूर्णित करनेवाली, चञ्चल मनोहर पुष्पोंको विभ्रंशित करनेवाली, दृप्त दानवोंके द्वारा विदलित देवताओंके दुर्निवार दुःखको दूर करनेवाली, कुरङ्गीनयनाओंके लिए स्तम्भन, आकर्षण एवं नेत्रोंके हर्षकी अभिवृद्धि करनेवाली वंशीध्वनि आप सबके मङ्गलमय मार्गके विघ्नोंका नाश करे। बालबोधिनी—प्रस्तुत श्लोक द्वारा इस सर्गके अन्तमें श्रीजयदेव कवि अपने पाठकों एवं श्रोताओंके लिए मङ्गलाचरणरूप आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहते हैं—कंसारि श्रीकृष्णका वंशीरव कल्याणका विस्तार करे। वह वंशीध्वनि दर्पीले दानवोंके कारण देवताओंको होनेवाले असह्य कष्टको दूर करनेवाली है, कुरङ्गीनयनाओंके अन्तःकरणको इस प्रकार मोहित करती है कि वे आनन्दमें निमग्न हो शिरश्चालन करने लगती हैं और घूर्णित-मौलि (मस्तक) हो