गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८० श्रीगीतगोविन्दम् अलक्तक रससे रञ्जित लोहित वर्ण चिह्न ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, मानो आपके अन्तःकरणमें अवस्थित बद्धमूल मदन-वृक्षके अरुण-वर्ण नूतन पल्लव बाहर अभिव्यक्त हो रहे हैं। पद्यानुवाद— कमल चरणके स्रवित अलकासे उर भीगा (क्या सीखे) ? अन्तरका स्मर-तरु-किसलय सा छाया बाहर दीखे ॥ बालबोधिनी—श्रीराधा व्यंग्यपूर्वक श्रीकृष्णसे कहती हैं—अहो, आपका हृदय अति उदार है—कैसा मनोहर स्वरूप धारण किया है ! आपने तो अति प्रेमोल्लाससे औदार्यको अभिव्यक्त करते हुए उस कामिनीके चरणकमलोंको ही हृदयमें धारण कर लिया है। उसके चरणोंसे स्रवित आलता-रसका लाल रंग आपके वक्षःस्थलको रञ्जित कर रहा है। श्याम-वर्ण पर जावक-रसका लाल-वर्ण तुम्हारी शोभाको और भी अभिवृद्धि कर रहा है। ऐसा लगता है, तुम्हारा हृदयस्थित अनुराग ही कामतरुके नव-नव किसलयोंकी भाँति लाल वर्णके रूपमें बाहर प्रकाशित हो रहा है। तुम्हारे हृदयमें विद्यमान कामवृक्षके नवीन पल्लव बाहर निकल रहे हैं। यह तुम्हारे अन्तःकरणका निषिद्ध प्रेमव्यापार मदन-वृक्षके रूपमें तुम्हारी हृदयस्थली पर उग आया है। इन चरण-चिह्नोंके रूपमें इस वृक्षके नये-नये लाल-लाल पल्लव दिखायी दे रहे हैं। तुम उस अनुरागको छिपा नहीं पा रहे हो। तुम्हारे लिए यहाँ कुछ नहीं है, जाओ ! कुछ टीकाकारोंके मतानुसार इस कथनके द्वारा श्रीराधाका अभिप्राय यह है कि श्रीकृष्ण द्वारा उस नायिकाके साथ क्रोध नामक बन्धविशेषसे रमण किया गया है। श्रीकृष्णने अपनी निर्मलता प्रस्तुत करते हुए कहा—यह तो गैरिकादि धातुओंका चित्रचिह्न है, मैंने किसी भी अङ्गनाके चरणकमलोंको धारण नहीं किया, न ही किसीके महावरको हृदयमें लगाया है।