गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमः सर्गः—विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २८१ दशन-पदं भवदधर-गतं मम जनयति चेतसि खेदम्। कथयति कथमधुनापि मया सह तव वपुरेतदभेदम्॥ हरि हरि याहि माधव..... ॥५॥ अन्वय—[गैरिकचित्रितमेतत् नान्याङ्गना-चरणालक्तक- सिक्तमितिचेत् तत्राह]—एतत् (प्रत्यक्षदृष्टं) तव वपुः (शरीरं) अधुनापि (एवं भावान्तरमापतितेऽपि) मया सह अभेदं (ऐक्यं; नावयोर्भेद इति) कथं कथयति (सूचयति); (तस्याः तत्कथनप्रकारमाह; यतः] भवदधरगतं दशनपदं (दन्तक्षतं) मम चेतसि खेदं जनयति [व्यङ्गोक्तिरियम्; त्वदधरस्थितस्य मच्चित्तव्यथाजनकत्वात् अभेदो ज्ञायते; नयनरागादिकं छद्मना आच्छादितम् इदन्तु उदितचन्द्र कलावत् प्रकाशमानमिति भावः] ॥५॥ अनुवाद—उस विलासिनीके दन्त आघातसे आपके अधर क्षत-विक्षत हो रहे हैं, जिन्हें देख मेरे अन्तःकरणमें खेद उत्पन्न होता है और अब भी, आप कहते हैं कि तुम्हारा शरीर मुझसे पृथक् नहीं है, अभिन्न है। पद्यानुवाद— लख अधरों पर दन्तक्षतोंको छिद जाता जी मेरा। फिर भी क्यों कोई कहता है, ‘राधे! है हरि तेरा॥’ हे माधव! हे कमल-विलोचन! वनमाली! रसभीने! अपनी व्यथाहारिणीके ढिग जाओ हे परलीने!! बालबोधिनी—हे कृष्ण! नयन राग इत्यादिको तुम छल-छद्म वाक्योंसे आच्छादित कर सकते हो, परन्तु उस विलासिनीके दाँतोंसे क्षत-विक्षत अधर-पल्लवको कैसे छुपा पाओगे जो चन्द्रकलाकी भाँति प्रकाशित हो रहा है? तुम्हारी यह निर्लज्ज हँसी मेरे चित्तमें दाह पैदा करती है, सुरतकालमें तुम्हारे होठों पर उस रमणीके ‘दशन’ की छाप मुझमें खेद उत्पन्न कर रही है, विरहके कारण मेरी दशा दशमी स्थिति तक पहुँच गयी है। बार-बार यही कहते हो—हम-तुम एक