भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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२८२ श्रीगीतगोविन्दम् हैं—पर इस स्थितिमें तुम अभेद कैसे अभिव्यक्त कर सकते हो—तुम चले जाओ। श्रीकृष्णने सफाई दी—प्रिये ! यह तो सौरभलुब्ध भ्रमरोंके द्वारा दंशन कर लिये जानेसे ही मेरे अधर क्षत हो रहे हैं, इन अधरों पर किसी रमणीका दंशन नहीं है। बहिरिव मलिनतरं तव कृष्ण मनोऽपि भविष्यति नूनम्। कथमथ वञ्चयसे जनमनुगतमसमशरज्वरदूनम् ॥ हरि हरि याहि माधव..... ॥६ ॥ अन्वय—[सौरभलुब्धभ्रमरेण दृष्टोऽयमधरो नतु अन्यनायिका- चुम्बनादितिचेत्, तदपि न]—हे कृष्ण तव [मलिनात्मकं] मनः अपि बहिरिव बाह्यं शरीरमिव) नूनं (निश्चितं) मलिनतरं (कृष्णं) भविष्यति। अथ (अन्यथा) अनुगतं (त्वदेकायत्तं) असम-शर-ज्वरदूनं (असमशरस्य कामस्य ज्वरेण दूनं सन्तप्तं) [मां] कथं वञ्चयसे (प्रतारयसि) (शुद्धान्तःकरणस्य नेयं रीतिरित्यर्थः] ॥६ ॥ अनुवाद—हे कृष्ण! जैसे तुम्हारा शरीर मलिन है, वैसे ही तुम्हारा मन भी अवश्य ही मलिन हो गया होगा। यदि ऐसा न होता तो मदन-शरसे जर्जरित अपने अनुगत (आश्रित) जनकी इस प्रकार वञ्चना न करते। पद्यानुवाद— मन भी तन सा कृष्ण! तुम्हारा बना हुआ है काला। अपनी जान जलाते रहते (पड़ा निठुरसे पाला) ॥ बालबोधिनी—श्रीराधा खेदको प्राप्त होकर श्रीकृष्णसे कहती हैं—हे कृष्ण ! बाहरसे तुम जितने काले हो, अन्दरसे तुम उससे भी अधिक काले हो। स्वभावतः उदार एवं उज्ज्वल मन मेरे प्रति इतनी उदासीनता कैसे बरत सकता है ? अपने ही अनुकूल, अपने ही आश्रितजनके साथ इतना छल, मेरी उपेक्षा कर परायी रमणीके साथ विलास, जो