गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 311, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टमः सर्गः—विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २७९ आपके वक्षःस्थल पर तीक्ष्ण नखक्षत किया है—ऐसा लग रहा है कि तुम्हारा हृदय रणभूमि है, यहाँ विकट युद्ध हुआ है। नीलवर्ण आपके वपुपर उस रमणीके द्वारा किये गये नख-क्षतोंकी लालिमामयी तीक्ष्ण रेखाएँ ऐसी प्रतीत हो रही हैं, मानो मरकतमणिकी नीली शिलापर स्वर्ण-मसिसे लिखी हुई लिपि हो, रतिजयपत्री हो। यह जय-लेख अपना विजय-सन्देश कह रहा है। कामीके प्रति कामिनीका भेजा गया यह केलिलेख—'मैंने रतिक्रीड़ामें इसे सम्पूर्णरूपेण जीत लिया है। कामिनीके द्वारा दूतरूपमें भेजे जानेके कारण 'अधमत्व' ही व्यंग्यार्थसे सूचित हो रहा है। 'खर' शब्दसे श्रीराधाका विशेष अभिप्राय है—एक तो इससे विलासभङ्गता सूचित होती है, दूसरे नख-आघात-क्षत ऐसे होने चाहिए, जिसमें तीक्ष्णता न हो, अपितु मृदुता हो। तीक्ष्णता तो कष्टदायिनी होती है। लगता है उस रमणीको रतिविलासका ज्ञान है ही नहीं। तुम जाओ! श्रीकृष्णने उत्तर दिया—राधे! मैं तुम्हें कंटकाकीर्ण वनोंमें खोज रहा था, वहीं काँटोंसे मेरा शरीर क्षतविक्षत हो गया है, ये किसी रमणीके नख-क्षत नहीं हैं। चरणकमल-गलदलक्तक-सिक्तमिदं तव हृदयमुदारम्। दर्शयतीव बहिर्मदन-द्रुम-नव-किसलय-परिवारम् ॥ हरि हरि याहि माधव..... ॥४॥ अन्वय—[त्वान्वेषणे भ्रमणात् वने ममेदं वपुः कण्टकैः क्षतं नतु नखक्षतानीमानीति चेत् तन्न]—इदं तव उदारं (मनोहरं) हृदयं [तस्याः] [प्रेमोल्लासतः] चरण-कमल-गलदलक्तक -सिक्तं (चरण-कमलाभ्यां गलता स्रवता अलक्तकेन सिक्तम्); [अतएव] मदनद्रुम-नव-किशलय-परिवारं (मदनद्रुमस्य हृदयस्थस्य कामवृक्षस्य नवकिशलय-परिवारं बालपल्लवसमूहं) [हृदयात्] बहिः दर्शयतीव (प्रकटयतीव) ॥४॥ अनुवाद—आपके प्रशस्त हृदयपर वराङ्गनाके चरण-कमलोंके