भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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२७८ श्रीगीतगोविन्दम् आँखोंका तुमने चुम्बन किया है। जाओ, उसीके पास जाओ, जिसने तुम्हारी आँखोंको रङ्गा है, इन होठोंको रंगा है, रातभर अपनी करुणा बरसायी है, मुझसे झूठी बातें मत करो, जाओ! रति रसावेशमें संयुक्त हुए आपके आरक्त नयन उस ब्रजसुन्दरीके प्रति प्रबल अनुराग रूप रंगसे रंजित होकर प्रकाशित हो रहे हैं। वपुरनुहरति तव स्मर-सङ्गर-खरनखरक्षत-रेखम्। रकत-शकल-कलित-कलधौत-लिपेरिव रति-जयलेखम्॥ हरि हरि याहि माधव.....॥३॥ अन्वय—[त्वच्चिन्ताशोकेन मलिनोऽयमधरो नतु अन्यनारीनेत्र- चुम्बनादित्याह]—स्मर-सङ्गर-खर-नखर-क्षतरेखं (स्मरसङ्गरे मन्मथयुद्धे खरैः तीक्ष्णैः बाणैरिव नखरैः क्षतान्येव रेखाः यस्मिन् तत्) तव वपुः (शरीरं) मरकत-शकल-कलित-कलधौत- लिपेरिव (मरकतशकले नीलमणिखण्डे कलिता अर्पिता या कलधौतस्य सुवर्णस्य लिपिः अक्षरविन्यासः तस्या इव) रतिजयलेखं (रतेः जयलेखम् विजयपत्रम्) अनुहरति (सदृशीकरोति) [वपुषः कृष्णत्वात् नखक्षतस्य रक्तत्वाच्च मरकतार्पितलिपेः साम्यम्] ॥३॥ अनुवाद—आपका यह श्यामल शरीर कामकेलिके समय रतिरणनिपुणा कामिनीके प्रखर नखोंसे रेखाङ्कित हुआ है, ऐसा प्रतीत होता है, मानो मरकतमणिरूपी दीवार पर स्वर्णलिपिसे रति-जय-लेख अंकित कर दिया हो। पद्यानुवाद— स्मर-संगर-खर नख-क्षत-रेखा अंकित वपु पर ऐसे। नील पटल पर रति-जय लेखा, स्वर्ण-लिखित हो जैसे॥ हे माधव! हे कमल-विलोचन! वनमाली! रसभीने! अपनी व्यथा-हारिणीके ठिग जाओ हे परलीने! बालबोधिनी—श्रीराधा कहती हैं—हे कृष्ण! तुम्हारा अंग-अंग तुम्हारी काम-केलिकी कहानी कह रहा है। उस रमणीने