गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 309, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टमः सर्गः-विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २७७ कज्जल-मलिन-विलोचन-चुम्बन-विरचित-नीलिम-रूपम्। दशन-वसनमरुणं तव कृष्ण! तनोति तनोरनुरूपम्॥ हरि हरि याहि माधव.....॥२॥ अन्वय-[त्वच्चिन्तयैव जागरानेत्रे मे रागः, नतू अन्यस्या रतिरागादितिचेत् तत्राह]-हे कृष्ण, कज्जल-मलिन-विलोचन- चुम्बन-विरचित-नीलिमरूपम् (कज्जलेन मलिनयोः विलोचनयोः नेत्रयोः तस्या इति शेषः, चुम्बनेन विरचितं नीलिमरूपं यत्र तादृशं) तव अरुणं (सहजलोहितं) दशनवसनं (अधरः) [अधुना] तनोः (तव शरीरस्य) अनुरूपं (सदृशरूपं श्यामतामित्यर्थः) तनोति (व्यनक्ति) [हरि हरि याहि माधव याहीत्यादि सर्वत्र योजनीयम्]॥२॥ अनुवाद-आपकी दशन-पंक्तिके-वसन स्वरूप अरुण वर्णके सुन्दर अधर व्रजयुवतियोंके काजलसे अञ्जित नयनोंके चुम्बन करनेसे कृष्णवर्ण होकर आपके शरीरके अनुरूप ही कृष्णताको प्राप्त हो रहे हैं। पद्यानुवाद- उसकी कजरारी आँखोंके चुम्बनसे हैं काले। अरुण अधर ये छली! तुम्हारे, दीख रहे मतवाले॥ बालबोधिनी-श्रीराधा अपने अन्तरमें खण्डिताका आरोप करके बड़े मर्मभेदी व्यङ्गवाणोंसे माधवको भेदने लगती हैं-कृष्ण! कपटताकी आवश्यकता नहीं है। यदि तुम यह कहते हो कि दूसरी किसी भी रमणीके साथ मैंने रात नहीं बितायी है तो ये आँखें इतनी लाल-लाल क्यों हो रही हैं? उसी अनुरागिणीके प्रति अभी भी तुम्हारा प्रेम तुम्हारी आँखोंमें झलक रहा है। श्रीकृष्ण कहने लगे-प्रिये! मैं सच कहता हूँ कि मैंने किसी भी रमणीके साथ रात्रि जागरण नहीं किया, अलसताके कारण मेरी आँखें बन्द हो रही हैं। श्रीराधा कहने लगीं-पुनः यह तुम्हारे लाल अधर काले क्यों हो रहे हैं? तुम्हारे शरीरके अनुरूप रातभर उसकी काजल-अँजी