गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७६ श्रीगीतगोविन्दम् अनुरूप प्रेम होता है। श्लोकमें 'सरसीरुहलोचन' शब्द कहा गया है। सरसीरुह शब्द 'कमल' एवं 'कुमुद' दोनोंका समान रूपसे वाचक है। श्रीकृष्णका कमललोचनत्व प्रख्यात है, किन्तु श्रीराधाको तो यहाँ सरसीरुह शब्दसे कुमुद रूपी अर्थ ही अभिप्रेत है। कुमुद रात्रिभर विकसित रहता है और दिवसको देखकर मुकुलित हो जाता है। श्रीकृष्ण भी चन्द्रवंशी हैं, अतः रात किसी नायिकाके साथ चन्द्रमाके समान ही जागकर बितायी है। पुनः श्रीराधा श्रीकृष्णसे कहती हैं-तुम्हारी आँखोंमें अनुराग अभी भी दिखायी दे रहा है, रागकी लालिमारूपी दोष अभी भी विद्यमान है, तत्कालीन उदित शृङ्गार रसका अनुरागमय अभिनिवेश अभी भी आँखोंमें लक्षित हो रहा है। जैसा चित्त वैसी चतुराई। उन तीन सम्बोधनोंकी व्याख्या इस प्रकार भी होती है- माधव-आप हमारे 'धव' अर्थात् पति नहीं हैं, पति होते तो क्या वञ्चना करते। यथार्थमें 'मा' अर्थात् श्रीराधा और 'धव' उनके प्राणप्रियतम हैं। केशव-जो प्रकृष्ट वेश-भूषाको धारण करते हैं, सदा ही जिनके केश मुक्त हैं। सरसीरुहलोचन-सदा आनन्दमें डूबे हुए होनेके कारण अर्द्धनिमीलित नेत्रवाले हैं। हाय ! रातभर जिसने करुणा बरसाई है, उसीके पास जाओ। यह सुनकर श्रीकृष्ण बोले-मैं तुमसे एक प्राण और एक शरीर हूँ। राधे ! मैं सच कहता हूँ कि मैंने किसी दूसरी स्त्रीका सङ्ग नहीं किया, मेरी आँखें हैं ही लाल रङ्गकी, किसी अङ्गनाके साथ जागरणके कारण नहीं, अलसतासे आँखें मुँद रही हैं॥१॥