गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 307, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टमः सर्गः-विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २७५ छलक रही अनुराग माधुरी अलसाई 'कोरों' से। वह कौन बँधी सी झलक रही है रेशमके डोरोंसे ॥ हे माधव ! हे कमल विलोचन ! वनमाली ! रसभीने !। अपनी व्यथाहारिणीके ढिंग, जाओ हे परलीने ! ॥ बालबोधिनी-श्रीकृष्णकी आँखें रातभर जागनेके कारण और विरहानुभूतिसे लाल हो गयी हैं और अलसता हेतु बार-बार मुँदी जा रही हैं, ऐसी अनुरञ्जित आँखोंको देखकर श्रीराधा श्रीकृष्णको भावोंकी सार्थकता हेतु कई नामोंसे सम्बोधित करती हैं-सपत्नी विषयक ईर्ष्या प्रकट करती हैं। हरि ! हरि !-ये दोनों अव्यय पद 'खेद' प्रकट करनेके लिए प्रयुक्त हुए हैं। गान छन्दको पूर्ण करनेके लिए भी स्तोभ रूपमें इनका प्रयोग हो सकता है। खण्डिता श्रीराधा अपने सम्मुख प्रणतवान अपने प्रियसे कहती हैं-हे माधव ! हे लक्ष्मीपति ! जाओ ! चले जाओ ! आप अन्यासक्त हैं, किस प्रकार दूसरोंकी प्रताड़ना करोगे-यह 'मा' शब्दसे द्योतित होता है। अथवा मा अर्थात् लक्ष्मी स्वभावसे चञ्चला हैं, उनके पतिका भी चञ्चल होना युक्तिसंगत ही है। मैं एक पतिपरायणा हूँ, आप मुझसे किस प्रकार स्नेह कर सकते हैं? अतः चले जाओ। इस प्रकार दोषारोप और तिरस्कार कर पुनः असन्तुष्ट होकर कहने लगीं-हे केशव ! चले जाओ ! प्रशस्त हैं केश जिसके, उसमें अनुरक्त रहने वाले-यह 'केशव' शब्दकी व्युत्पत्ति होती है। आप किसी केशसंस्कारवती स्वैरिणीमें रत रहें-यहाँ 'केशव' शब्दमें व्यङ्ग है। अतः हे केशव अर्थात् हे बहुबल्लभ ! मुझ एक-परायणासे इस कैतववादसे क्या प्रयोजन-छल-वाक्य मत बोलो। मुझ दुःखीमें रोष क्यों है, यदि यह आशङ्का करते हो, तो सुनो-ऐसा नहीं है। हे सरसीसहलोचन ! अर्थात् कुमुदलोचन जो तुम्हारा विषाद हर लेती है, उसी (प्रिया, बहुबल्लभ) का अनुसरण करो। अनुरूपका अनुरूपामें ही