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गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

२८० श्रीगीतगोविन्दम् अलक्तक रससे रञ्जित लोहित वर्ण चिह्न ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, मानो आपके अन्तःकरणमें अवस्थित बद्धमूल मदन-वृक्षके अरुण-वर्ण नूतन पल्लव बाहर अभिव्यक्त हो रहे हैं। पद्यानुवाद— कमल चरणके स्रवित अलकासे उर भीगा (क्या सीखे) ? अन्तरका स्मर-तरु-किसलय सा छाया बाहर दीखे ॥ बालबोधिनी—श्रीराधा व्यंग्यपूर्वक श्रीकृष्णसे कहती हैं—अहो, आपका हृदय अति उदार है—कैसा मनोहर स्वरूप धारण किया है ! आपने तो अति प्रेमोल्लाससे औदार्यको अभिव्यक्त करते हुए उस कामिनीके चरणकमलोंको ही हृदयमें धारण कर लिया है। उसके चरणोंसे स्रवित आलता-रसका लाल रंग आपके वक्षःस्थलको रञ्जित कर रहा है। श्याम-वर्ण पर जावक-रसका लाल-वर्ण तुम्हारी शोभाको और भी अभिवृद्धि कर रहा है। ऐसा लगता है, तुम्हारा हृदयस्थित अनुराग ही कामतरुके नव-नव किसलयोंकी भाँति लाल वर्णके रूपमें बाहर प्रकाशित हो रहा है। तुम्हारे हृदयमें विद्यमान कामवृक्षके नवीन पल्लव बाहर निकल रहे हैं। यह तुम्हारे अन्तःकरणका निषिद्ध प्रेमव्यापार मदन-वृक्षके रूपमें तुम्हारी हृदयस्थली पर उग आया है। इन चरण-चिह्नोंके रूपमें इस वृक्षके नये-नये लाल-लाल पल्लव दिखायी दे रहे हैं। तुम उस अनुरागको छिपा नहीं पा रहे हो। तुम्हारे लिए यहाँ कुछ नहीं है, जाओ ! कुछ टीकाकारोंके मतानुसार इस कथनके द्वारा श्रीराधाका अभिप्राय यह है कि श्रीकृष्ण द्वारा उस नायिकाके साथ क्रोध नामक बन्धविशेषसे रमण किया गया है। श्रीकृष्णने अपनी निर्मलता प्रस्तुत करते हुए कहा—यह तो गैरिकादि धातुओंका चित्रचिह्न है, मैंने किसी भी अङ्गनाके चरणकमलोंको धारण नहीं किया, न ही किसीके महावरको हृदयमें लगाया है।

अष्टमः सर्गः—विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २८१ दशन-पदं भवदधर-गतं मम जनयति चेतसि खेदम्। कथयति कथमधुनापि मया सह तव वपुरेतदभेदम्॥ हरि हरि याहि माधव..... ॥५॥ अन्वय—[गैरिकचित्रितमेतत् नान्याङ्गना-चरणालक्तक- सिक्तमितिचेत् तत्राह]—एतत् (प्रत्यक्षदृष्टं) तव वपुः (शरीरं) अधुनापि (एवं भावान्तरमापतितेऽपि) मया सह अभेदं (ऐक्यं; नावयोर्भेद इति) कथं कथयति (सूचयति); (तस्याः तत्कथनप्रकारमाह; यतः] भवदधरगतं दशनपदं (दन्तक्षतं) मम चेतसि खेदं जनयति [व्यङ्गोक्तिरियम्; त्वदधरस्थितस्य मच्चित्तव्यथाजनकत्वात् अभेदो ज्ञायते; नयनरागादिकं छद्मना आच्छादितम् इदन्तु उदितचन्द्र कलावत् प्रकाशमानमिति भावः] ॥५॥ अनुवाद—उस विलासिनीके दन्त आघातसे आपके अधर क्षत-विक्षत हो रहे हैं, जिन्हें देख मेरे अन्तःकरणमें खेद उत्पन्न होता है और अब भी, आप कहते हैं कि तुम्हारा शरीर मुझसे पृथक् नहीं है, अभिन्न है। पद्यानुवाद— लख अधरों पर दन्तक्षतोंको छिद जाता जी मेरा। फिर भी क्यों कोई कहता है, ‘राधे! है हरि तेरा॥’ हे माधव! हे कमल-विलोचन! वनमाली! रसभीने! अपनी व्यथाहारिणीके ढिग जाओ हे परलीने!! बालबोधिनी—हे कृष्ण! नयन राग इत्यादिको तुम छल-छद्म वाक्योंसे आच्छादित कर सकते हो, परन्तु उस विलासिनीके दाँतोंसे क्षत-विक्षत अधर-पल्लवको कैसे छुपा पाओगे जो चन्द्रकलाकी भाँति प्रकाशित हो रहा है? तुम्हारी यह निर्लज्ज हँसी मेरे चित्तमें दाह पैदा करती है, सुरतकालमें तुम्हारे होठों पर उस रमणीके ‘दशन’ की छाप मुझमें खेद उत्पन्न कर रही है, विरहके कारण मेरी दशा दशमी स्थिति तक पहुँच गयी है। बार-बार यही कहते हो—हम-तुम एक

२८२ श्रीगीतगोविन्दम् हैं—पर इस स्थितिमें तुम अभेद कैसे अभिव्यक्त कर सकते हो—तुम चले जाओ। श्रीकृष्णने सफाई दी—प्रिये ! यह तो सौरभलुब्ध भ्रमरोंके द्वारा दंशन कर लिये जानेसे ही मेरे अधर क्षत हो रहे हैं, इन अधरों पर किसी रमणीका दंशन नहीं है। बहिरिव मलिनतरं तव कृष्ण मनोऽपि भविष्यति नूनम्। कथमथ वञ्चयसे जनमनुगतमसमशरज्वरदूनम् ॥ हरि हरि याहि माधव..... ॥६ ॥ अन्वय—[सौरभलुब्धभ्रमरेण दृष्टोऽयमधरो नतु अन्यनायिका- चुम्बनादितिचेत्, तदपि न]—हे कृष्ण तव [मलिनात्मकं] मनः अपि बहिरिव बाह्यं शरीरमिव) नूनं (निश्चितं) मलिनतरं (कृष्णं) भविष्यति। अथ (अन्यथा) अनुगतं (त्वदेकायत्तं) असम-शर-ज्वरदूनं (असमशरस्य कामस्य ज्वरेण दूनं सन्तप्तं) [मां] कथं वञ्चयसे (प्रतारयसि) (शुद्धान्तःकरणस्य नेयं रीतिरित्यर्थः] ॥६ ॥ अनुवाद—हे कृष्ण! जैसे तुम्हारा शरीर मलिन है, वैसे ही तुम्हारा मन भी अवश्य ही मलिन हो गया होगा। यदि ऐसा न होता तो मदन-शरसे जर्जरित अपने अनुगत (आश्रित) जनकी इस प्रकार वञ्चना न करते। पद्यानुवाद— मन भी तन सा कृष्ण! तुम्हारा बना हुआ है काला। अपनी जान जलाते रहते (पड़ा निठुरसे पाला) ॥ बालबोधिनी—श्रीराधा खेदको प्राप्त होकर श्रीकृष्णसे कहती हैं—हे कृष्ण ! बाहरसे तुम जितने काले हो, अन्दरसे तुम उससे भी अधिक काले हो। स्वभावतः उदार एवं उज्ज्वल मन मेरे प्रति इतनी उदासीनता कैसे बरत सकता है ? अपने ही अनुकूल, अपने ही आश्रितजनके साथ इतना छल, मेरी उपेक्षा कर परायी रमणीके साथ विलास, जो

अष्टमः सर्गः-विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २८३ मलिन-मन होता है, वही अपने आश्रित व्यक्तिके साथ छल कर सकता है। मैं तो पहलेसे ही काम-शरोंसे पीड़िता हूँ, कमसे कम इस स्थितिमें तो धोखा नहीं देना चाहिए। जाओ छलिया! तुम यहाँसे चले जाओ। कोई शुद्ध अन्तःकरण वाला व्यक्ति ऐसा कभी नहीं कर सकता। श्रीकृष्णने कहा-राधे ! मुझपर व्यर्थ ही शंका मत करो, मैं कभी भी तुम्हारी वञ्चना नहीं कर सकता हूँ। भ्रमति भवानबला-कवलाय वनेषु किमत्र विचित्रम्। प्रथयति पूतनिकैव वधू-वध-निर्दय-बाल-चरित्रम् ॥ हरि हरि याहि माधव..... ॥७॥ अन्वय-[न वञ्चयाम्यहं त्वमेव मुधा शङ्कसे इत्यत आह]-भवान् अबला-कवलाय (अबलानां कवलाय ग्रासाय कान्तावाधायेति यावत्) वनेषु भ्रमति अत्र [विषये] किं विचित्रं [न किमपीत्यर्थः]; [अत्र उदाहरणमाह]-पूतनिका (पूतना) एव वधु-वध-निर्दय-बालचरित्रं (वधुवधे नारीहत्यायां निर्दयं बालचरित्रं) [कियत्] प्रथयति (विस्तारयति) [नतु सर्वमित्यर्थः]; [बाल्ये चेदेवं कैशोरे किमत्र विचित्रमिति भावः] ॥७॥ अनुवाद-आप अबलाओंका बध करनेके लिए ही वन-वनमें भ्रमण कर रहे हो, इसमें आश्चर्य ही क्या है! बाल्य-चरित्रमें ही आपने पूतनाका वध करके अपने निर्दय निष्ठुर स्वभावका परिचय दिया है, नारीबधपरायणता तो आपके चरित्रमें है ही। पद्यानुवाद- अबला-वधकी साध लिये, तुम वन वन डोल रहे हो। बालचरितका प्रथम पृष्ठ क्या फिरसे खोल रहे हो? ॥ हे माधव! हे कमल-विलोचन! वनमाली! रसभीने! अपनी व्यथाहारिणीके ढिग जाओ हे परलीने!।। बालबोधिनी-पुनः श्रीराधाने कहा-यह तो आपकी स्वभावसिद्धता ही है कि वनोंमें आप अबलाओंको 'ग्रसने'

२८४ श्रीगीतगोविन्दम् के लिए, उनका बध करनके लिए ही घूमते हैं, मेरा भी बध कर रहे हो तो इसमें वैचित्र्य ही क्या है? आपने तो अपने बाल्यकालमें ही कंस-भगिनी, युद्धप्रिया पूतनाका बधकर ख्याति पायी है, तो मेरी जैसी अबलाका बध करना तो कितना आसान है। जब ऐसी प्रबला आपके द्वारा कालकवलित हो गयी, तो मेरी जैसी अबलाका बध करनेमें आश्चर्य ही क्या है? शास्त्रोंमें स्त्री-बध निषिद्ध कहा गया है, निन्दनीय माना गया है, पर आपकी यह नृशंसता तो जन्मसिद्ध ही है। कृपाकर चले जाओ। अब तो आप युवक हैं, ऐसी स्थितिमें मुझ जैसी स्त्रीका बध करनेमें आपको कोई प्रयास भी नहीं करना पड़ेगा। हे निष्ठुर ! अब रहने भी दो। श्रीजयदेव-भणित-रति-वञ्चित-खण्डित-युवति-विलापम्। शृणुत सुधा-मधुरं विबुधा ! विबुधा लयतोऽपि दुरापम् ॥ हरि हरि याहि माधव..... ॥८॥ अन्वय—हे विबुधाः (श्रीकृष्णमधुरलीलास्वादचतुराः; देवा वा) सुधामधुरं (सुधायाः अपि मधुरं) [अतएव] विबुधालयतोऽपि (स्वर्गादपि; अत्र सप्तम्यास्तसिः) दुरापं (दुर्लभं) [श्रीराधाकृष्णो- पासनालभ्यत्वात्; तत्रेदं नास्तीति भावः] श्रीजयदेव-भणित- रतिवञ्चितखण्डित-युवति-विलापं (श्रीजयदेवेन भणितम् उक्तं रतिवञ्चितायाः खण्डितायाः युवत्याः श्रीराधायाः विलापं) शृणुत। (आकर्णयत) ॥८॥ अनुवाद—हे विद्वानों ! श्रीजयदेव कवि द्वारा विरचित खण्डिता, रतिवञ्चिता युवती श्रीराधाका अमृतसे भी अधिक सुमधुर एवं सुरलोकमें भी सुदुर्लभ विलापका श्रवण करें। पद्यानुवाद— जयदेव कथित रति-वंचित खंडित युवती जनका— विलाप है, छू लेता जो अन्तर भावुक मनका ॥

अष्टमः सर्गः—विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २८५ बालबोधिनी—यहाँ कवि श्रीजयदेवने विद्वानों अथवा देवताओंको सम्बोधित करते हुए कहा है—हे विद्वानों ! अभिलषणीय रतिसे वञ्चित खण्डिता युवतीके विलापको सुनो, यह विलाप अमृतसे भी अधिक मधुर है। श्रीकृष्णके द्वारा उपेक्षिता श्रीराधा रति-क्रीड़ासे वञ्चित हुई हैं, अतः अपने प्रियतमकी विरह-वेदनामें जो वह विलाप कर रही हैं, उस सुधाका रसास्वादन देवलोकमें कदापि संभव नहीं है। देवलोकमें सर्वाधिक सुमधुर वस्तु अमृत है, पर श्रीराधाके विलापकी तुलनामें वह अमृत नगण्य है, इसे तो मनुष्य-तनसे इस भौम जगतमें ही प्राप्त किया जा सकता है। अतः जो विद्वान अमृत-प्राप्तिके लिए, सुरतकी उपलब्धिके लिए लालायित रहते हैं, उन्हें इस अतुलनीय भौम-सुधाका पान अवश्य ही करना चाहिए। प्रस्तुत प्रबन्धकी नायिका श्रीराधा खण्डिता है, जिसका लक्षण है— निद्रा-कषाय-मुकुलीकृत-ताम्रनेत्रो नारी-नखव्रणविशेष-विचित्रताङ्गः । यस्याः कुतोऽपि पतिरेति गृहं प्रभाते सा खण्डेति कथिताकविभिः पुराणैः ॥ अर्थात् निशा जागरणके कारण रातमें जिसकी निद्रा पूरी न हो सकी, वह लाल नेत्रोंवाला, अन्य रमणीके नख-क्षतोंके चिह्नोंसे विशेष विचित्र अङ्गोंवाला, किसी नायिकाका पति (प्रियतम) कहींसे प्रातःकाल जब गृहमें प्रवेश करता है, उस नायिकाको कवियोंने खण्डिता कहा है। इस गीतगोविन्द काव्यके सत्रहवें प्रबन्धका नाम 'लक्ष्मीपति- रत्नावली' है। इसमें मेघराग है, विप्रलम्भ नामका शृङ्गार और करुण रस है। तवेदं पश्यन्त्याः प्रसरदनुरागं बहिरिव। प्रिया-पाद-लक्त-च्छुरितमरुणद्योति-हृदयम् ॥

२८६ श्रीगीतगोविन्दम् ममाद्य प्रख्यातप्रणयभरभङ्गेन कितव। त्वदालोकः शोकादपि किमपि लज्जां जनयति ॥१॥ अन्वय—हे कितव (धूर्त्त) प्रियापादालक्तकच्छुरितं (प्रियायाः तस्याः नायिकायाः पादालक्तेन चरणालक्तक-रसेन च्छुरितं व्याप्तं) [सुतरां] अरुणद्योति (अरुणं द्योतयतीति अरुणकान्ति) (अतएव) बहिः प्रसरदनुरागमिव (प्रसरन् प्रवृद्धिं गच्छन् अनुरागः यस्मात् तथाभूतम्इव) [तव अनुरागो हृदयं भित्त्वा बहिर्निर्गत इव इति भावार्थः] तव हृदयं पश्यन्त्याः [तवागमन प्रतीक्षमाणायाः] मम अद्य त्वदालोकः (तव दर्शनं) प्रख्यात- प्रणयभरभङ्गेन (प्रख्यातस्य प्रसिद्धस्य प्रणयस्य यः भरः आतिशय्यं तस्य भङ्गेस्तेन हेतुना) शोकादपि (त्वद्वियोगदुःखादपि) किमपि (अनिर्वचनीयां जीवन-मरणयोः सन्देहापादिकां) लज्जां जनयति ॥१॥ अनुवाद—हे शठ ! आज प्रिय व्रजाङ्गनाके चरणोंके अलक्तक रसमें रञ्जित आपका अरुण द्युतिसे युक्त हृदय आपके हृदयस्थित प्रबल अनुरागको बाहर प्रकट कर रहा है, जिसे देखकर आपका मेरा चिर-प्रसिद्ध प्रणय विच्छेदित हो रहा है। इससे मेरे चित्तमें शोककी अपेक्षा लज्जा ही अधिक उद्भूत हो रही है। पद्यानुवाद— देख तुम्हारे उर पर ‘उसके’ चरण-कमलकी छाया। भीतरका ही प्रेम-भाव ज्यों बाहर होकर आया। हुआ न मुझको शोक, हुई मैं लज्जासे अति नीचे मेरे रहते कौन सुहागिनि मेरे पियको खींचे॥ बालबोधिनी—अब खण्डिता होने पर भी राधिका प्रौढ़त्वका आलम्बन करके श्रीकृष्णपर आक्षेप करती हुई कहती है—हे कितव! हे कपटी! तुम्हारा अवलोकन न करने पर तुम्हारे आगमनकी प्रतीक्षा करते-करते मेरे सुविख्यात प्रणयका अब विच्छेद होने जा रहा है। तुम्हारा विच्छेदजनित दुःख भी मुझे अनिर्वचनीय जैसा ही हो रहा है, कैसे कहूँ, जीवन-मरणका

अष्टमः सर्गः—विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २८७ प्रश्न-सा लग गया है, कैसा संकट उपस्थित हुआ है, न जी पा रही हूँ, न मर पा रही हूँ। हे धूर्त ! तुम्हें इस दशामें देखकर मुझे शोक भी उतना नहीं होता, जितनी कि लज्जा अनुभूत होती है। आपने जिस कामिनीके साथ रमण किया, उसके चरणोंको अपने वक्षःस्थल पर धारण किया, उसके पैरोंकी महावरसे आपका वक्षःस्थल राग-रञ्जित हो गया है। इस अरुणोदय कालमें सन्ध्याकालीन अरुण-द्युतिको देखकर ऐसा लग रहा है कि जो अनुराग आपने अपने हृदयमें वहन किया था, वह आज बाहर प्रकट हो गया है। जहाँ आप कौस्तुभमणि धारण किया करते थे, वहाँ उस प्रेयसी उपभोग चिह्नोंको देखकर मैं लज्जासे गढ़ी जा रही हूँ। जिस अनन्य प्रणयके अपार गर्वसे मैं अमर्यादित रूपसे आह्लादित हुआ करती थी, आपने अपने इस गर्हित आचरणसे उस प्रेमका सूत्र ही तोड़ दिया, उसका उपभोग करके आपको लज्जा भी नहीं आती। धन्य हो कृष्ण ! चले जाओ ! हे छलिया ! मैंने तुमसे ही क्यों प्रीति की ? प्रस्तुत श्लोकमें शिखरिणी छन्द है। अग्रिम श्लोकमें श्रीकृष्णने विचार किया—इतना प्रयत्न करके भी श्रीराधाके अत्यन्त प्रगाढ़ मानका निर्बन्ध दूर नहीं हो रहा है। अतः अब बंशी दूतीकी सहायता लेनी पड़ेगी। दूसरा कोई उपाय नहीं सूझ रहा है, बंशी-ध्वनिसे राधिकाका मान अवश्य ही दूर होगा—ऐसा विचारकर कवि जयदेव बंशीध्वनिके द्वारा आशीर्वादका विस्तार कर रहे हैं। अन्तर्मोहन-मौलि-घूर्णन-चलन्मन्दार-विस्रंशन स्तब्धाकर्षण-दृष्टिहर्षण-महामन्त्रः कुरङ्गीदृशाम्। दृप्यद्दानव-दूयमान-दिविषद्-दुर्वार-दुःखापदां भ्रंशः कंसरिपोह्व्यापोयतु वः श्रेयांसि वंशीरवः ॥२॥ इति सप्तदश सन्दर्भः। इति श्रीगीतगोविन्दे महाकाव्ये खण्डितावर्णने विलक्ष- लक्ष्मीपतिर्नामाष्टमः सर्गः।

२८८ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—[अथ वंशीरवश्रवणेन श्रीराधिकायाः अतिगाढ़ोऽपि मानः अपयास्यतीति कविः वंशीध्वनिं वर्णयन् आशिषमातनोति]— कुरङ्गी-दृशाम् (मृगलोचनानाम्) अन्तर्मोहन-मौलि-घूर्णन- चलन्मन्दार-विस्रंसन-स्तब्धाकर्षण-दृष्टि-हर्षण-महामन्त्रः (अन्तर्मोहने मनोमोहने मौलि-घूर्णने साधु साधु इति शिरःकम्पने चलतां मन्दाराणां देवतरु-कुसुमानां विस्रंसने तथा स्तब्धे स्तम्भे, आकर्षणे, तथा दृष्टिहर्षणे वशीकरणे महामन्त्रः) [तथा] दृप्यद्दानवदूयमान-दिविषद्-दुर्वार-दुःखापदां (दृप्यद्भिः दर्पपूर्णैः दानवैः दूयमानानां पीड्यमानानां दिविषदां देवानां दुर्वारणां दुःखापदाम् अनिवार्यदुःखपङ्क्तीनां) भ्रंशः (ध्वंसः नाशक इत्यर्थः) [वंशीरव-श्रवणमात्रेणैव देवाः दैत्यभयात् मुच्यन्ते इति भावः] कंसरिपोः (श्रीकृष्णस्य) वंशीरवः वः (युष्माकं) श्रेयांसि (शुभानि) व्यपोहयतु (विगतविघ्नानि करोतु) [अतएव विलक्षो गाढ़मानविलोकाद् विस्मयान्वितो लक्ष्मीपतिः श्रीराधापतिर्यत्र सः इति अष्टमः सर्गः] ॥२॥ अनुवाद—गोपियोंके अन्तःकरणको मोहनेवाली, मौलिस्थित मणिमय किरीटोंको घूर्णित करनेवाली, चञ्चल मनोहर पुष्पोंको विभ्रंशित करनेवाली, दृप्त दानवोंके द्वारा विदलित देवताओंके दुर्निवार दुःखको दूर करनेवाली, कुरङ्गीनयनाओंके लिए स्तम्भन, आकर्षण एवं नेत्रोंके हर्षकी अभिवृद्धि करनेवाली वंशीध्वनि आप सबके मङ्गलमय मार्गके विघ्नोंका नाश करे। बालबोधिनी—प्रस्तुत श्लोक द्वारा इस सर्गके अन्तमें श्रीजयदेव कवि अपने पाठकों एवं श्रोताओंके लिए मङ्गलाचरणरूप आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहते हैं—कंसारि श्रीकृष्णका वंशीरव कल्याणका विस्तार करे। वह वंशीध्वनि दर्पीले दानवोंके कारण देवताओंको होनेवाले असह्य कष्टको दूर करनेवाली है, कुरङ्गीनयनाओंके अन्तःकरणको इस प्रकार मोहित करती है कि वे आनन्दमें निमग्न हो शिरश्चालन करने लगती हैं और घूर्णित-मौलि (मस्तक) हो

अष्टमः सर्गः—विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २८९ जाती हैं, वे मुग्ध होकर अवलोकन किया करती हैं, स्वर्गलोककी अप्सराओंकी मन्दार पुष्पकी माला इस वंशीध्वनिसे भ्रंशित होने लगती है, टूटने लगती है—इस प्रकार श्रीकृष्णकी वंशीध्वनिका 'वशीकारत्व' बताया है। वशीकृत देवता साधु-साधु कहकर शिरोधूननके द्वारा प्रशंसा करते हैं। शिरोधूनन एवं मन्दारके विभ्रंशनसे वंशीका 'मारण' अभिलक्षित है। स्तम्भत्व एवं आकर्षणत्व तो सिद्ध ही है। वंशीध्वनिको सुनकर व्रज-कुरङ्गनाएँ हिरणियाँ आकर्षित हो स्तम्भित रह जाती हैं। उच्चाटन तो वंशीरवमें प्रमाणित ही है। अन्तःकरणोंका मोहित हो जाना मोहनत्व है। इस प्रकार मोहनत्व, वशीकरणत्व, स्तम्भत्व, आकर्षणत्व, उच्चाटनत्व एवं मारणत्वके गुणोंसे युक्त होनेके कारण वंशीध्वनि महामंत्र स्वरूप है। इस महामन्त्रत्वका जादू गोपियोंसे विशेष रूपसे सम्बन्धित है। श्रीकृष्ण श्रीराधाके प्रगाढ़ मानको दूर करनेके लिए षत्साधन सम्पन्न महामन्त्रस्वरूप वंशीध्वनि करने लगे। इति श्रीजयदेवकृतौ श्रीगीतगोविन्दे खण्डितावर्णने विलक्ष्यलक्ष्मीपतिर्नामाष्टमः सर्गः। इस प्रकार श्रीजयदेव कवि प्रणीत गीतगोविन्द काव्यके खण्डिता नायिका वर्णन प्रसङ्गमें विलक्ष्यलक्ष्मीपति नामक आठवें सर्गकी बालबोधिनी व्याख्या समाप्त।

नवमः सर्गः (मुग्ध-मुकुन्दः) तामथ मन्मथ-खिन्नां रति-रस-भिन्नां विषाद-सम्पन्नाम्। अनुचिन्तित-हरि-चरितां कलहान्तरितामुवाच रहसि सखी ॥१॥ अन्वय—अथ अनन्तरम्; (प्रणत्यापि मानानपगमात् श्रीकृष्णे अन्तर्हिते सति) सखी रहः (एकान्ते) कलहान्तरितां (कलहान्तरितावस्थां प्राप्तां) [अतएव] मन्मथखिन्नां (मन्मथेन मदनेन खिन्ना सन्तप्ता तां) रतिरसभिन्नां (रतिरसेन सुरतानन्देन भिन्ना खण्डिता ताम्) विषादसम्पन्नां (विषादेन चित्तक्लेशेन सम्पन्ना युक्ता ताम्) अनुचिन्तित-हरि-चरिताम् (अनुचिन्तितं पुनःपुनश्चिन्तितं हरेः चरितं चातूक्ति-पाद-पतनादि यया तादृशीं) [अन्तरुत्सुकामपि बहिर्मानावगुण्ठितां] तां [श्रीराधाम्] उवाच॥ [कलहान्तरितालक्षणम्—चाटुकारमपि प्राणनाथं रोषादपास्य या। पश्चात्तापमवाप्नोति कलहान्तरिता तु सा॥ इति साहित्यदर्पणे ॥१॥ अनुवाद—मदनबाणसे प्रपीड़िता, रतिवञ्चिता, विषादयुक्ता, कलहान्तरिता, शृङ्गार रससे युक्त श्रीहरिके चरित्रके विषयमें सतत चिन्तन करने वाली श्रीराधासे सखीने एकान्तमें कहा— पद्यानुवाद— मन्मथखिन्ने! रतिरसभिन्ने! शोक-विपन्ने राधे!॥ हरि चिन्तन रत! सलिल नयनगत! बैठी हो चुप साधे॥ मानिनि! मत अब मान करो। बालबोधिनी—श्रीराधा श्रीकृष्णोक्त सभी वाक्योंका तिरस्कार करती हैं, उनके युक्तियुक्त वचनों एवं प्रणत-भाव-समुदायको छल चातुरी समझकर मन-ही-मन उनके व्यवहारकी समालोचना करती हैं। प्रणयकोपसे अनेक प्रकारके आक्षेप लगाती हैं। वे जितना भी प्रणत होते जाते हैं, उनका मान उतना ही बढ़ता जाता है, पुनः स्वकृत कलहको सोच-सोच कर

नवमः सर्गः—मुग्ध-मुकुन्दः २९१ सन्तप्त होती हैं, उद्विग्न होती हैं, केवल हरिकी ही चिन्ता करती हैं—इस प्रकार श्रीराधाकी कलहान्तरितावस्थाकी पाँच विशेषताओंका वर्णन किया गया है— मन्मथखिन्ना—कामकी उद्विग्नतासे श्रीराधाको अत्यधिक कष्टकी अनुभूति हो रही है। रतिरसभिन्ना—काम-केलि रससे वञ्चित होनेके कारण विषादशालिनी हो रही हैं। विषादसम्पन्नाम्—सम्भोगके प्रति अनुरक्ति होनेके कारण वे भावशबलताकी स्थिति तक पहुँच चुकी हैं। अनुचिन्तितहरिचरितां—वे बार-बार श्रीकृष्णके चरित्रका ही चिन्तन कर रही थीं। कलहान्तरिता—सखियोंके सामने अपने पैरों पर पड़ते हुए प्राणबल्लभको देखकर भी जो नायिका उन्हें बुरा-भला कहती है तथा निषेध करती है, उसे कलहान्तरिता नायिका कहते हैं। उसमें प्रलाप, सन्ताप, ग्लानि, दीर्घनिःश्वास आदि चेष्टाएँ लक्षित होनेके कारण उसे कलहान्तरिता कहा जाता है। कलहान्तरिता नायिकाका लक्षण यह है— प्राणेश्वरं प्रणयकोपविशेष-भीतं या चाटुकारमवधीर्य विशेषवाग्भिः। सन्तप्यते मदनवह्निशिखासमूहैर्बाष्पाकुलेह कलहान्तरिता हिसा स्यात्॥ अथ अष्टादशः सन्दर्भः। गीतम् ॥१८॥ गुर्जरीराग-यतितालाभ्यां गीयते। गीतगोविन्द काव्यका प्रस्तुत अठारहवाँ प्रबन्ध गुर्जरी राग तथा यति तालके द्वारा गाया जाता है।

“मानिनि! मत अब मान करो।”

नवमः सर्गः—मुग्ध-मुकुन्दः २९३ हरिरभिसरति वहति मधुपवने किमपरमधिकसुखं सखि ! भवने ॥१ ॥ माधवे मा कुरु मानिनि ! मानमये ॥ध्रुवपदम् ॥ अन्वय—अये मानिनी (मानवति राधे) मृदुपवने (मलयमारुते) वहति [सति] हरिः (कृष्णः) अभिसरति (सङ्केतस्थानमायाति); [तस्मात्] माधवे मानं मा कुरु (मधुवंशोद्भवे श्रिया महासम्पत्तेः पत्यौ चेति मानानर्हत्वादिति भावः) [कथं वञ्चकेऽस्मिन् मानो न विधेय इत्याह]—सखि भवने (कृष्णविहीने गृहे) अपरम् (अन्यत्) अधिकसुखं किम् [अस्ति] [माधवाभि- सरणादन्यत् सुखं नास्त्येवेति भावः] ॥१॥ अनुवाद—हे मानिनि ! देखो, इस समय मन्द-मन्द वासन्ती समीर प्रवाहित हो रहा है, श्रीकृष्ण अभिसारके लिए तुम्हारे सङ्केत भवनमें आ रहे हैं। हे सखि ! इससे अधिक बढ़कर और सुख क्या हो सकता है ? पद्यानुवाद— मन्द-मन्द मधु वायु विहरती, लायी उसको यहाँ, सिहरती, बैठी जिसका ध्यान धरो। मानिनि! मत अब मान करो ॥ बालबोधिनी—हे सखी! अब तुम्हें लक्ष्मीपति माधवसे मान नहीं करना चाहिए, वे मधुवंशमें उत्पन्न हुए हैं, महासम्पत्तिके अधिकारी हैं, फिर भी तुम्हें मना रहे हैं, मनाते चले जा रहे हैं—तुम मान करना छोड़ दो। वासन्ती बयार प्रवाहित हो रही है, हरि स्वयं तुम्हारे अभिसारके लिए आ रहे हैं—तुम्हारे ही भवनमें अर्थात् घरमें। इससे बढ़कर सुख और क्या हो सकता है? उनका आगमन सुखकी परावधि है—राधे ! तुम उनका सम्मान करो।

२९४ श्रीगीतगोविन्दम् ताल-फलादपि गुरुमतिसरसम् किं विफली कुरुषे कुच-कलशम् ? माधवे..... ॥२॥ अन्वय-[सुखमस्तु तेन मम किम्? इति चेत् स्तनाभ्यां किमपराद्धमिति सोत्प्रासमाह]-तालफलात् अपि गुरुं (स्थौल्येन काठिन्येन वर्त्तुलत्वेन च तालफलादपि श्रेष्ठं) अतिसरसं (रसभरपूर्णं) कुचकलसं (स्तनकुम्भं) किमु (किमर्थं) विफलीकुरुषे (व्यर्थयसि) [तदनुभवं बिना अस्य विफलीकरणं न युक्तमित्यर्थ:] ॥२॥ अनुवाद-सुपक्व ताल-फलसे भी गुरुतर (भारी) एवं अति रसपूर्ण इन कुच-कलशोंको विफल क्यों कर रही हो? पद्यानुवाद- लज्जित ताल-फलोंकी गुरुता, कुच-कलशोंकी अनुपम रसता, रसमयि! रसका दान करो। मानिनि! मत अब मान करो ॥ बालबोधिनी-सखी कहती हैं कि हे राधे! तुम्हारे कुच-कलश ताल फलसे भी श्रेष्ठ हैं। रस-शास्त्रोंमें ताल-फलको अति गुरु एवं रसमय फल बताया गया है। अतः जिन कुच-कलशोंकी रसता एवं गुरुताके सम्मुख ताल फलका गुरुत्व एवं रसत्व भी निकृष्ट हो जाता है, उनकी सार्थकता तो हरिमें है, हरिके स्पर्शमें है, इन कलशोंका गुरुत्व उन्हींके लिए है और तुम उनका उद्देश्य ही नष्ट कर रही हो। स्तनोंकी विस्तृति अभिव्यक्त करनेके लिए ही उनकी तुलना कलशोंसे की गयी है। मान छोड़ दो एवं श्रीहरिको इस रस-विलासका अनुभव करने दो। कति न कथितमिदमनुपदमचिरम्। मा परिहर हरिमतिशय-रुचिरम् ॥ माधवे... ॥३॥

नवमः सर्गः—मुग्ध-मुकुन्दः २९५ अन्वय—[तदुपदेशं बिना इत्थं क्रियते इत्याह]—इदम् अनुपदम् (पदे पदे) अचिरम् (अधुनैव) कति (कतवारं) [मया] न कथितम्; [यत्] अतिशय-रुचिरं (अतिसुन्दरं) हरिं (मनोहरणशीलं) मा परिहर (मा त्याक्षीः) ॥३॥ अनुवाद—मैं तुम्हें कितनी बार कह रही हूँ कि तुम निरतिशय सुन्दर मनोहर श्रीहरिका परित्याग मत करो। पद्यानुवाद— हरि-तन कलित ललित हियहारी, भूलो मान, बनो बलिहारी, विनती इतनी कान धरो। मानिनि! मत अब मान करो ॥ बालबोधिनी—सखी कहती है—हे राधे! मैं तुम्हें पुनः पुनः समझा रही हूँ कि तुम मान मत करो। श्रीहरि रूप-लावण्यमें सबसे सुन्दर हैं—तुम अपना मान छोड़कर उनका अभिसरण करो, अपना मनोभाव बदलो, श्रीहरि अतिशय रुचिर हैं, सबके मनको हर लेनेवाले हैं, उनका त्याग कभी भी उचित नहीं है। किमिति विषीदसि रोदिषि विकला ? विहसति युवतिसभा तव सकला ॥ माधवे... ॥४॥ अन्वय—[एतदाकर्ण्य साश्रुनेत्रां प्रत्याह]—विकला (व्याकुला) [सती] किमिति (किमर्थं) विषीदसि (विषण्णा भवसि) रोदिषि च [माविषीद मारोद इत्यर्थः]; [तव एवं व्याकुलतामवलोक्य] सकला (समग्रा) युवति सभा (प्रतिपक्ष-युवति-समूहः) विहसति (विशेषेण हसति) ॥४॥ अनुवाद—तुम इतनी शोकविह्वल होकर क्यों रो रही हो? तुम्हारे विकलता-प्रदर्शक इन हाव भावोंको देखकर तुम्हारी प्रतिपक्षी युवतियाँ प्रमुदित हो रही हैं।

२९६ श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— सिसक सिसक रोती हो विकले, तरुण सखी हँसती है, तरले। क्यों झूठा अभिमान करो? मानिनि! मत अब मान करो ॥ बालबोधिनी—सखीकी बातोंको सुनकर श्रीराधा सिसक-सिसक कर रोती हैं, बिलखती हैं। तब सखी कहती है—हे राधे! इस समय तुम विषाद क्यों कर रही हो, क्यों बिलख रही हो? तुम्हारी प्रतिपक्षी युवतियाँ तुम्हारे इन हाव-भावोंको देखकर तुम्हारा उपहास कर रही हैं। कितनी नादान हो तुम, साक्षात् श्रीहरि तुम्हारे चरणोंमें लुण्ठन कर रहे हैं और तुम रोती ही जा रही हो। सजल-नलिनीदल-शीलितशयने। हरिमवलोकय सफलय नयने ॥ माधवे... ॥५ ॥ अन्वय—[यथेयं युवतिसभा न विहसति तथोपदिश इत्याह]—सजल-नलिनी-दल-शीलित-शयने (सजलैः नलिनीदलैः शीलित रचिते शयने शय्यायां) हरिम् अवलोकय; नयने (नेत्रे) सफलय (सफलीकुरु); [त्रिभुवननयनमहोत्सवावलोकनात् अन्यत् फलं नास्तीति भावः] ॥५ ॥ अनुवाद—तुम सजल कमलके दलसे रचित शीतल शय्या पर श्रीकृष्णको प्रेमभरी दृष्टिसे अवलोकन कर नयन-युगलको सफल बनाओ। पद्यानुवाद— सजल कमल जल शीतल शयने— प्रिय राजित हैं, कल चलनयने! पूरे सब अरमान करो। मानिनि! मत अब मान करो ॥

नवमः सर्गः—मुग्ध-मुकुन्दः २९७ बालबोधिनी—सखी श्रीराधासे कह रही है—हे राधे ! देखो, इस अभिसरण-स्थल पर हीरक-हारोंसे युक्त शीतल कमल-पल्लवोंसे रची सेज पर श्रीहरि लेट गये हैं, तुम उनका अवलोकन करो जिनके लिए तरस रही हो, उनके साथ कैसा कलह ? वे तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं, तुम मान ही नहीं छोड़ रही हो। जनयसि मनसि किमिति गुरुखेदम् ? शृणु मम वचनमनीहित भेदम् ॥ माधवे... ॥६॥ अन्वय—[एतदाकर्ण्य खिद्यन्तीं प्राह]—किमिति (कथं) मनसि (चित्ते) गुरुखेदं (महत् कष्टं) जनयसि (सहसे इत्यर्थः) [नैव विधेयम्]; अनीहितभेदं (अनीहितम् अचेष्टित- मनभिलषितमिति यावत् विरहदुःखं तस्य भेदो यस्मात् तादृशं; यथा युवयोः पुनरपि विरहो न भवेदेवम्भूवमित्यर्थः) मम वचनं शृणु [तथा सति पुनस्ते विरहदुःखं मा भवितेत्यर्थः] ॥६ ॥ अनुवाद—तुम मन-ही-मन इतनी क्षुब्ध क्यों हो रही हो ? मेरी बात सुनो, मैं बिना किसी भेदके तुमसे हितकी बात कहती हूँ। पद्यानुवाद— खेद-भारसे बोझिल मन क्यों? काँप रहा है मृदु तन क्यों यों? बालबोधिनी—सखीकी ये सब बात सुनकर भी श्रीराधा दुःखी हो रही थीं, तब सखीने पुनः कहा—हे प्रिय सखि ! मनमें इतना द्वेष क्यों भरा हुआ है, क्यों व्यर्थकी आशंकाएँ तुम्हारे मनमें उठ रही हैं? इतना भारी दुःख क्यों कर रही हो—इस विदारक विरहसे तुम इच्छारहित चेष्टारहित अभिलाषारहित हो गई हो। देखो, मेरी बात सुनो, मैं तुम्हारा अहित नहीं चाहती हूँ—यह समझ लो। तुममें और श्रीकृष्णमें किसी भी प्रकारका भेद नहीं है।

२९८ श्रीगीतगोविन्दम् हरिरुपयातु वदतु बहु-मधुरम्। किमिति करोषि हृदयमतिविधुरम्॥ माधवे... ॥७॥ अन्वय—[श्रोतव्यमेवाह]—हरिः उपयातु (समीपमागच्छतु) बहु मधुरं (चाटु) वदतु। किमिति (कथं) हृदयम् अतिविधुरं (व्याकुलं) करोषि? [श्रीहरेर्मधुरवचनेन मोदस्व चित्तं मा खेदय इत्यर्थः] ॥७॥ अनुवाद—श्रीहरिको अपने निकट आने दो, सुमधुर बातें करने दो, क्यों हृदयको इतना अधिक दुःखी कर रही हो? पद्यानुवाद— जा बोलोंसे गान झरो। मानिनि! मत अब मान करो॥ बालबोधिनी—सखी कहती है—हे प्रिय राधे, हरिको अपने समीप आने दो, उन्हें मधुर बातें कहने दो। उनसे तुम्हारा पृथक् रहना ठीक नहीं है। उनके चाटु वाक्योंसे स्वयंको आनन्दित कर, उन्हें भी आनन्द प्रदान करो। तुम्हारा हृदय उन्हींके लिए व्याकुल है, तुम अपने हृदयके विरुद्ध ऐसा क्यों करती हो? व्यर्थमें ही हृदयको अतिशय वञ्चित कर रही हो, इसी तरह मान करके अपने चित्तको सन्तप्त करना ठीक नहीं है, मान छोड़ दो। श्रीजयदेव-भणितमति-ललितम् । सुखयतु रसिकजनं हरि-चरितम् ॥ माधवे... ॥८॥ अन्वय—हरि चरितं (हरेः चरितं यत्र तत्) [अतः] अतिललितं (अतिमनोहरं) श्रीजयदेव-भणितं (श्रीजयदेवोक्तिः) रसिकजनं (श्रीकृष्णलीलारहस्यरसज्ञं भक्तजनं) सुखयतु (सुखी- करोतु) ॥८॥ अनुवाद—श्रीजयदेव कवि द्वारा विरचित अति सुललित श्रीकृष्ण-चरित-कथा रसिकजनोंका सुख-वर्द्धन करे।

नवमः सर्गः—मुग्ध–मुकुन्दः २९९ पद्यानुवाद— कवि जयदेव कथित यह वाणी। रसिकजनोंको हो सुखदानी॥ रस परिपूरित प्राण करो। मानिनि! मत अब मान करो॥ बालबोधिनी—गीतगोविन्द काव्यके इस अठारहवें प्रबन्धका नाम अमन्दमुकुन्द है। श्रीहरिकी प्रसन्नता एवं रसिक भगवद्भक्तोंकी प्रसन्नता ही इस गानका एकमात्र उद्देश्य और फल है। कवि जयदेव कह रहे हैं मैंने जो यह श्रीकृष्णका चरित वर्णन किया है, वह अति ललित है, यह रसिकोंके हृदयमें आनन्दका विधान करे। स्निग्धे यत्परुषासि यत्प्रणमति–स्तब्धासि यद्रागिणि द्वेषस्थासि यदुन्मुखे विमुखतां यातासि तस्मिन्–प्रिये। तद्युक्तं विपरीतकारिणि तव श्रीखण्डचर्चा विषं शीतांशुस्तपनो हिमं हुतवहः क्रीडामुदो यातनाः ॥ अन्वय—[अथ तस्यां निरुत्तरायां राधायां सखी सेर्यमेवाह]— [राधे] तस्मिन् प्रिये (कृष्णे) स्निग्धे (स्नेहार्द्रे) [अपि] यत् परुषा (निष्ठुरा कटुभाषिणीत्यर्थः) [असि], प्रणमति (प्रणते) [अपि] यत् स्तब्धा (दण्डवत्स्थिता) असि, रागिणि (अनुरागवति) [अपि] यत् द्वेषस्था (विरक्ता) असि, उन्मुखे (त्वन्मुखाव- लोकनोत्सुके) अपि विमुखतां (प्रतिकूलतां) याता (प्राप्ता) असि, अयि विपरीतकारिणि (प्रतिकूलवर्त्तिनि) [तदेतत् ते यद्विपरीतं यातं] तद्युक्तम् (अनुरूपम्); [ततः किम् इत्यते आह]—तव श्रीखण्डचर्चा (चन्दन-विलेपनं) विषम् [विषमिव उद्वेजिका], शीतांशुः चन्द्रः तपनः (सूर्यवत् सन्तापकः), हिमं हुतवहः (अग्निः) [अग्निरिव दाहकं], तथा क्रीडामुदः (क्रीड़या मुदः आमोदाः रतिजनित-हर्षा इति यावत्) यातनाः [सम्पद्यन्ते] [विपरीतबुद्धेः सर्वमेव विपरीतं भवतीति भावः] ॥१॥