गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमः सर्गः—विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २८५ बालबोधिनी—यहाँ कवि श्रीजयदेवने विद्वानों अथवा देवताओंको सम्बोधित करते हुए कहा है—हे विद्वानों ! अभिलषणीय रतिसे वञ्चित खण्डिता युवतीके विलापको सुनो, यह विलाप अमृतसे भी अधिक मधुर है। श्रीकृष्णके द्वारा उपेक्षिता श्रीराधा रति-क्रीड़ासे वञ्चित हुई हैं, अतः अपने प्रियतमकी विरह-वेदनामें जो वह विलाप कर रही हैं, उस सुधाका रसास्वादन देवलोकमें कदापि संभव नहीं है। देवलोकमें सर्वाधिक सुमधुर वस्तु अमृत है, पर श्रीराधाके विलापकी तुलनामें वह अमृत नगण्य है, इसे तो मनुष्य-तनसे इस भौम जगतमें ही प्राप्त किया जा सकता है। अतः जो विद्वान अमृत-प्राप्तिके लिए, सुरतकी उपलब्धिके लिए लालायित रहते हैं, उन्हें इस अतुलनीय भौम-सुधाका पान अवश्य ही करना चाहिए। प्रस्तुत प्रबन्धकी नायिका श्रीराधा खण्डिता है, जिसका लक्षण है— निद्रा-कषाय-मुकुलीकृत-ताम्रनेत्रो नारी-नखव्रणविशेष-विचित्रताङ्गः । यस्याः कुतोऽपि पतिरेति गृहं प्रभाते सा खण्डेति कथिताकविभिः पुराणैः ॥ अर्थात् निशा जागरणके कारण रातमें जिसकी निद्रा पूरी न हो सकी, वह लाल नेत्रोंवाला, अन्य रमणीके नख-क्षतोंके चिह्नोंसे विशेष विचित्र अङ्गोंवाला, किसी नायिकाका पति (प्रियतम) कहींसे प्रातःकाल जब गृहमें प्रवेश करता है, उस नायिकाको कवियोंने खण्डिता कहा है। इस गीतगोविन्द काव्यके सत्रहवें प्रबन्धका नाम 'लक्ष्मीपति- रत्नावली' है। इसमें मेघराग है, विप्रलम्भ नामका शृङ्गार और करुण रस है। तवेदं पश्यन्त्याः प्रसरदनुरागं बहिरिव। प्रिया-पाद-लक्त-च्छुरितमरुणद्योति-हृदयम् ॥