गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८४ श्रीगीतगोविन्दम् के लिए, उनका बध करनके लिए ही घूमते हैं, मेरा भी बध कर रहे हो तो इसमें वैचित्र्य ही क्या है? आपने तो अपने बाल्यकालमें ही कंस-भगिनी, युद्धप्रिया पूतनाका बधकर ख्याति पायी है, तो मेरी जैसी अबलाका बध करना तो कितना आसान है। जब ऐसी प्रबला आपके द्वारा कालकवलित हो गयी, तो मेरी जैसी अबलाका बध करनेमें आश्चर्य ही क्या है? शास्त्रोंमें स्त्री-बध निषिद्ध कहा गया है, निन्दनीय माना गया है, पर आपकी यह नृशंसता तो जन्मसिद्ध ही है। कृपाकर चले जाओ। अब तो आप युवक हैं, ऐसी स्थितिमें मुझ जैसी स्त्रीका बध करनेमें आपको कोई प्रयास भी नहीं करना पड़ेगा। हे निष्ठुर ! अब रहने भी दो। श्रीजयदेव-भणित-रति-वञ्चित-खण्डित-युवति-विलापम्। शृणुत सुधा-मधुरं विबुधा ! विबुधा लयतोऽपि दुरापम् ॥ हरि हरि याहि माधव..... ॥८॥ अन्वय—हे विबुधाः (श्रीकृष्णमधुरलीलास्वादचतुराः; देवा वा) सुधामधुरं (सुधायाः अपि मधुरं) [अतएव] विबुधालयतोऽपि (स्वर्गादपि; अत्र सप्तम्यास्तसिः) दुरापं (दुर्लभं) [श्रीराधाकृष्णो- पासनालभ्यत्वात्; तत्रेदं नास्तीति भावः] श्रीजयदेव-भणित- रतिवञ्चितखण्डित-युवति-विलापं (श्रीजयदेवेन भणितम् उक्तं रतिवञ्चितायाः खण्डितायाः युवत्याः श्रीराधायाः विलापं) शृणुत। (आकर्णयत) ॥८॥ अनुवाद—हे विद्वानों ! श्रीजयदेव कवि द्वारा विरचित खण्डिता, रतिवञ्चिता युवती श्रीराधाका अमृतसे भी अधिक सुमधुर एवं सुरलोकमें भी सुदुर्लभ विलापका श्रवण करें। पद्यानुवाद— जयदेव कथित रति-वंचित खंडित युवती जनका— विलाप है, छू लेता जो अन्तर भावुक मनका ॥