गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८६ श्रीगीतगोविन्दम् ममाद्य प्रख्यातप्रणयभरभङ्गेन कितव। त्वदालोकः शोकादपि किमपि लज्जां जनयति ॥१॥ अन्वय—हे कितव (धूर्त्त) प्रियापादालक्तकच्छुरितं (प्रियायाः तस्याः नायिकायाः पादालक्तेन चरणालक्तक-रसेन च्छुरितं व्याप्तं) [सुतरां] अरुणद्योति (अरुणं द्योतयतीति अरुणकान्ति) (अतएव) बहिः प्रसरदनुरागमिव (प्रसरन् प्रवृद्धिं गच्छन् अनुरागः यस्मात् तथाभूतम्इव) [तव अनुरागो हृदयं भित्त्वा बहिर्निर्गत इव इति भावार्थः] तव हृदयं पश्यन्त्याः [तवागमन प्रतीक्षमाणायाः] मम अद्य त्वदालोकः (तव दर्शनं) प्रख्यात- प्रणयभरभङ्गेन (प्रख्यातस्य प्रसिद्धस्य प्रणयस्य यः भरः आतिशय्यं तस्य भङ्गेस्तेन हेतुना) शोकादपि (त्वद्वियोगदुःखादपि) किमपि (अनिर्वचनीयां जीवन-मरणयोः सन्देहापादिकां) लज्जां जनयति ॥१॥ अनुवाद—हे शठ ! आज प्रिय व्रजाङ्गनाके चरणोंके अलक्तक रसमें रञ्जित आपका अरुण द्युतिसे युक्त हृदय आपके हृदयस्थित प्रबल अनुरागको बाहर प्रकट कर रहा है, जिसे देखकर आपका मेरा चिर-प्रसिद्ध प्रणय विच्छेदित हो रहा है। इससे मेरे चित्तमें शोककी अपेक्षा लज्जा ही अधिक उद्भूत हो रही है। पद्यानुवाद— देख तुम्हारे उर पर ‘उसके’ चरण-कमलकी छाया। भीतरका ही प्रेम-भाव ज्यों बाहर होकर आया। हुआ न मुझको शोक, हुई मैं लज्जासे अति नीचे मेरे रहते कौन सुहागिनि मेरे पियको खींचे॥ बालबोधिनी—अब खण्डिता होने पर भी राधिका प्रौढ़त्वका आलम्बन करके श्रीकृष्णपर आक्षेप करती हुई कहती है—हे कितव! हे कपटी! तुम्हारा अवलोकन न करने पर तुम्हारे आगमनकी प्रतीक्षा करते-करते मेरे सुविख्यात प्रणयका अब विच्छेद होने जा रहा है। तुम्हारा विच्छेदजनित दुःख भी मुझे अनिर्वचनीय जैसा ही हो रहा है, कैसे कहूँ, जीवन-मरणका