भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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अष्टमः सर्गः—विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २८७ प्रश्न-सा लग गया है, कैसा संकट उपस्थित हुआ है, न जी पा रही हूँ, न मर पा रही हूँ। हे धूर्त ! तुम्हें इस दशामें देखकर मुझे शोक भी उतना नहीं होता, जितनी कि लज्जा अनुभूत होती है। आपने जिस कामिनीके साथ रमण किया, उसके चरणोंको अपने वक्षःस्थल पर धारण किया, उसके पैरोंकी महावरसे आपका वक्षःस्थल राग-रञ्जित हो गया है। इस अरुणोदय कालमें सन्ध्याकालीन अरुण-द्युतिको देखकर ऐसा लग रहा है कि जो अनुराग आपने अपने हृदयमें वहन किया था, वह आज बाहर प्रकट हो गया है। जहाँ आप कौस्तुभमणि धारण किया करते थे, वहाँ उस प्रेयसी उपभोग चिह्नोंको देखकर मैं लज्जासे गढ़ी जा रही हूँ। जिस अनन्य प्रणयके अपार गर्वसे मैं अमर्यादित रूपसे आह्लादित हुआ करती थी, आपने अपने इस गर्हित आचरणसे उस प्रेमका सूत्र ही तोड़ दिया, उसका उपभोग करके आपको लज्जा भी नहीं आती। धन्य हो कृष्ण ! चले जाओ ! हे छलिया ! मैंने तुमसे ही क्यों प्रीति की ? प्रस्तुत श्लोकमें शिखरिणी छन्द है। अग्रिम श्लोकमें श्रीकृष्णने विचार किया—इतना प्रयत्न करके भी श्रीराधाके अत्यन्त प्रगाढ़ मानका निर्बन्ध दूर नहीं हो रहा है। अतः अब बंशी दूतीकी सहायता लेनी पड़ेगी। दूसरा कोई उपाय नहीं सूझ रहा है, बंशी-ध्वनिसे राधिकाका मान अवश्य ही दूर होगा—ऐसा विचारकर कवि जयदेव बंशीध्वनिके द्वारा आशीर्वादका विस्तार कर रहे हैं। अन्तर्मोहन-मौलि-घूर्णन-चलन्मन्दार-विस्रंशन स्तब्धाकर्षण-दृष्टिहर्षण-महामन्त्रः कुरङ्गीदृशाम्। दृप्यद्दानव-दूयमान-दिविषद्-दुर्वार-दुःखापदां भ्रंशः कंसरिपोह्व्यापोयतु वः श्रेयांसि वंशीरवः ॥२॥ इति सप्तदश सन्दर्भः। इति श्रीगीतगोविन्दे महाकाव्ये खण्डितावर्णने विलक्ष- लक्ष्मीपतिर्नामाष्टमः सर्गः।