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गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

अष्टमः सर्गः—विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २८७ प्रश्न-सा लग गया है, कैसा संकट उपस्थित हुआ है, न जी पा रही हूँ, न मर पा रही हूँ। हे धूर्त ! तुम्हें इस दशामें देखकर मुझे शोक भी उतना नहीं होता, जितनी कि लज्जा अनुभूत होती है। आपने जिस कामिनीके साथ रमण किया, उसके चरणोंको अपने वक्षःस्थल पर धारण किया, उसके पैरोंकी महावरसे आपका वक्षःस्थल राग-रञ्जित हो गया है। इस अरुणोदय कालमें सन्ध्याकालीन अरुण-द्युतिको देखकर ऐसा लग रहा है कि जो अनुराग आपने अपने हृदयमें वहन किया था, वह आज बाहर प्रकट हो गया है। जहाँ आप कौस्तुभमणि धारण किया करते थे, वहाँ उस प्रेयसी उपभोग चिह्नोंको देखकर मैं लज्जासे गढ़ी जा रही हूँ। जिस अनन्य प्रणयके अपार गर्वसे मैं अमर्यादित रूपसे आह्लादित हुआ करती थी, आपने अपने इस गर्हित आचरणसे उस प्रेमका सूत्र ही तोड़ दिया, उसका उपभोग करके आपको लज्जा भी नहीं आती। धन्य हो कृष्ण ! चले जाओ ! हे छलिया ! मैंने तुमसे ही क्यों प्रीति की ? प्रस्तुत श्लोकमें शिखरिणी छन्द है। अग्रिम श्लोकमें श्रीकृष्णने विचार किया—इतना प्रयत्न करके भी श्रीराधाके अत्यन्त प्रगाढ़ मानका निर्बन्ध दूर नहीं हो रहा है। अतः अब बंशी दूतीकी सहायता लेनी पड़ेगी। दूसरा कोई उपाय नहीं सूझ रहा है, बंशी-ध्वनिसे राधिकाका मान अवश्य ही दूर होगा—ऐसा विचारकर कवि जयदेव बंशीध्वनिके द्वारा आशीर्वादका विस्तार कर रहे हैं। अन्तर्मोहन-मौलि-घूर्णन-चलन्मन्दार-विस्रंशन स्तब्धाकर्षण-दृष्टिहर्षण-महामन्त्रः कुरङ्गीदृशाम्। दृप्यद्दानव-दूयमान-दिविषद्-दुर्वार-दुःखापदां भ्रंशः कंसरिपोह्व्यापोयतु वः श्रेयांसि वंशीरवः ॥२॥ इति सप्तदश सन्दर्भः। इति श्रीगीतगोविन्दे महाकाव्ये खण्डितावर्णने विलक्ष- लक्ष्मीपतिर्नामाष्टमः सर्गः।

२८८ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—[अथ वंशीरवश्रवणेन श्रीराधिकायाः अतिगाढ़ोऽपि मानः अपयास्यतीति कविः वंशीध्वनिं वर्णयन् आशिषमातनोति]— कुरङ्गी-दृशाम् (मृगलोचनानाम्) अन्तर्मोहन-मौलि-घूर्णन- चलन्मन्दार-विस्रंसन-स्तब्धाकर्षण-दृष्टि-हर्षण-महामन्त्रः (अन्तर्मोहने मनोमोहने मौलि-घूर्णने साधु साधु इति शिरःकम्पने चलतां मन्दाराणां देवतरु-कुसुमानां विस्रंसने तथा स्तब्धे स्तम्भे, आकर्षणे, तथा दृष्टिहर्षणे वशीकरणे महामन्त्रः) [तथा] दृप्यद्दानवदूयमान-दिविषद्-दुर्वार-दुःखापदां (दृप्यद्भिः दर्पपूर्णैः दानवैः दूयमानानां पीड्यमानानां दिविषदां देवानां दुर्वारणां दुःखापदाम् अनिवार्यदुःखपङ्क्तीनां) भ्रंशः (ध्वंसः नाशक इत्यर्थः) [वंशीरव-श्रवणमात्रेणैव देवाः दैत्यभयात् मुच्यन्ते इति भावः] कंसरिपोः (श्रीकृष्णस्य) वंशीरवः वः (युष्माकं) श्रेयांसि (शुभानि) व्यपोहयतु (विगतविघ्नानि करोतु) [अतएव विलक्षो गाढ़मानविलोकाद् विस्मयान्वितो लक्ष्मीपतिः श्रीराधापतिर्यत्र सः इति अष्टमः सर्गः] ॥२॥ अनुवाद—गोपियोंके अन्तःकरणको मोहनेवाली, मौलिस्थित मणिमय किरीटोंको घूर्णित करनेवाली, चञ्चल मनोहर पुष्पोंको विभ्रंशित करनेवाली, दृप्त दानवोंके द्वारा विदलित देवताओंके दुर्निवार दुःखको दूर करनेवाली, कुरङ्गीनयनाओंके लिए स्तम्भन, आकर्षण एवं नेत्रोंके हर्षकी अभिवृद्धि करनेवाली वंशीध्वनि आप सबके मङ्गलमय मार्गके विघ्नोंका नाश करे। बालबोधिनी—प्रस्तुत श्लोक द्वारा इस सर्गके अन्तमें श्रीजयदेव कवि अपने पाठकों एवं श्रोताओंके लिए मङ्गलाचरणरूप आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहते हैं—कंसारि श्रीकृष्णका वंशीरव कल्याणका विस्तार करे। वह वंशीध्वनि दर्पीले दानवोंके कारण देवताओंको होनेवाले असह्य कष्टको दूर करनेवाली है, कुरङ्गीनयनाओंके अन्तःकरणको इस प्रकार मोहित करती है कि वे आनन्दमें निमग्न हो शिरश्चालन करने लगती हैं और घूर्णित-मौलि (मस्तक) हो

अष्टमः सर्गः—विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २८९ जाती हैं, वे मुग्ध होकर अवलोकन किया करती हैं, स्वर्गलोककी अप्सराओंकी मन्दार पुष्पकी माला इस वंशीध्वनिसे भ्रंशित होने लगती है, टूटने लगती है—इस प्रकार श्रीकृष्णकी वंशीध्वनिका 'वशीकारत्व' बताया है। वशीकृत देवता साधु-साधु कहकर शिरोधूननके द्वारा प्रशंसा करते हैं। शिरोधूनन एवं मन्दारके विभ्रंशनसे वंशीका 'मारण' अभिलक्षित है। स्तम्भत्व एवं आकर्षणत्व तो सिद्ध ही है। वंशीध्वनिको सुनकर व्रज-कुरङ्गनाएँ हिरणियाँ आकर्षित हो स्तम्भित रह जाती हैं। उच्चाटन तो वंशीरवमें प्रमाणित ही है। अन्तःकरणोंका मोहित हो जाना मोहनत्व है। इस प्रकार मोहनत्व, वशीकरणत्व, स्तम्भत्व, आकर्षणत्व, उच्चाटनत्व एवं मारणत्वके गुणोंसे युक्त होनेके कारण वंशीध्वनि महामंत्र स्वरूप है। इस महामन्त्रत्वका जादू गोपियोंसे विशेष रूपसे सम्बन्धित है। श्रीकृष्ण श्रीराधाके प्रगाढ़ मानको दूर करनेके लिए षत्साधन सम्पन्न महामन्त्रस्वरूप वंशीध्वनि करने लगे। इति श्रीजयदेवकृतौ श्रीगीतगोविन्दे खण्डितावर्णने विलक्ष्यलक्ष्मीपतिर्नामाष्टमः सर्गः। इस प्रकार श्रीजयदेव कवि प्रणीत गीतगोविन्द काव्यके खण्डिता नायिका वर्णन प्रसङ्गमें विलक्ष्यलक्ष्मीपति नामक आठवें सर्गकी बालबोधिनी व्याख्या समाप्त।

नवमः सर्गः (मुग्ध-मुकुन्दः) तामथ मन्मथ-खिन्नां रति-रस-भिन्नां विषाद-सम्पन्नाम्। अनुचिन्तित-हरि-चरितां कलहान्तरितामुवाच रहसि सखी ॥१॥ अन्वय—अथ अनन्तरम्; (प्रणत्यापि मानानपगमात् श्रीकृष्णे अन्तर्हिते सति) सखी रहः (एकान्ते) कलहान्तरितां (कलहान्तरितावस्थां प्राप्तां) [अतएव] मन्मथखिन्नां (मन्मथेन मदनेन खिन्ना सन्तप्ता तां) रतिरसभिन्नां (रतिरसेन सुरतानन्देन भिन्ना खण्डिता ताम्) विषादसम्पन्नां (विषादेन चित्तक्लेशेन सम्पन्ना युक्ता ताम्) अनुचिन्तित-हरि-चरिताम् (अनुचिन्तितं पुनःपुनश्चिन्तितं हरेः चरितं चातूक्ति-पाद-पतनादि यया तादृशीं) [अन्तरुत्सुकामपि बहिर्मानावगुण्ठितां] तां [श्रीराधाम्] उवाच॥ [कलहान्तरितालक्षणम्—चाटुकारमपि प्राणनाथं रोषादपास्य या। पश्चात्तापमवाप्नोति कलहान्तरिता तु सा॥ इति साहित्यदर्पणे ॥१॥ अनुवाद—मदनबाणसे प्रपीड़िता, रतिवञ्चिता, विषादयुक्ता, कलहान्तरिता, शृङ्गार रससे युक्त श्रीहरिके चरित्रके विषयमें सतत चिन्तन करने वाली श्रीराधासे सखीने एकान्तमें कहा— पद्यानुवाद— मन्मथखिन्ने! रतिरसभिन्ने! शोक-विपन्ने राधे!॥ हरि चिन्तन रत! सलिल नयनगत! बैठी हो चुप साधे॥ मानिनि! मत अब मान करो। बालबोधिनी—श्रीराधा श्रीकृष्णोक्त सभी वाक्योंका तिरस्कार करती हैं, उनके युक्तियुक्त वचनों एवं प्रणत-भाव-समुदायको छल चातुरी समझकर मन-ही-मन उनके व्यवहारकी समालोचना करती हैं। प्रणयकोपसे अनेक प्रकारके आक्षेप लगाती हैं। वे जितना भी प्रणत होते जाते हैं, उनका मान उतना ही बढ़ता जाता है, पुनः स्वकृत कलहको सोच-सोच कर

नवमः सर्गः—मुग्ध-मुकुन्दः २९१ सन्तप्त होती हैं, उद्विग्न होती हैं, केवल हरिकी ही चिन्ता करती हैं—इस प्रकार श्रीराधाकी कलहान्तरितावस्थाकी पाँच विशेषताओंका वर्णन किया गया है— मन्मथखिन्ना—कामकी उद्विग्नतासे श्रीराधाको अत्यधिक कष्टकी अनुभूति हो रही है। रतिरसभिन्ना—काम-केलि रससे वञ्चित होनेके कारण विषादशालिनी हो रही हैं। विषादसम्पन्नाम्—सम्भोगके प्रति अनुरक्ति होनेके कारण वे भावशबलताकी स्थिति तक पहुँच चुकी हैं। अनुचिन्तितहरिचरितां—वे बार-बार श्रीकृष्णके चरित्रका ही चिन्तन कर रही थीं। कलहान्तरिता—सखियोंके सामने अपने पैरों पर पड़ते हुए प्राणबल्लभको देखकर भी जो नायिका उन्हें बुरा-भला कहती है तथा निषेध करती है, उसे कलहान्तरिता नायिका कहते हैं। उसमें प्रलाप, सन्ताप, ग्लानि, दीर्घनिःश्वास आदि चेष्टाएँ लक्षित होनेके कारण उसे कलहान्तरिता कहा जाता है। कलहान्तरिता नायिकाका लक्षण यह है— प्राणेश्वरं प्रणयकोपविशेष-भीतं या चाटुकारमवधीर्य विशेषवाग्भिः। सन्तप्यते मदनवह्निशिखासमूहैर्बाष्पाकुलेह कलहान्तरिता हिसा स्यात्॥ अथ अष्टादशः सन्दर्भः। गीतम् ॥१८॥ गुर्जरीराग-यतितालाभ्यां गीयते। गीतगोविन्द काव्यका प्रस्तुत अठारहवाँ प्रबन्ध गुर्जरी राग तथा यति तालके द्वारा गाया जाता है।

“मानिनि! मत अब मान करो।”

नवमः सर्गः—मुग्ध-मुकुन्दः २९३ हरिरभिसरति वहति मधुपवने किमपरमधिकसुखं सखि ! भवने ॥१ ॥ माधवे मा कुरु मानिनि ! मानमये ॥ध्रुवपदम् ॥ अन्वय—अये मानिनी (मानवति राधे) मृदुपवने (मलयमारुते) वहति [सति] हरिः (कृष्णः) अभिसरति (सङ्केतस्थानमायाति); [तस्मात्] माधवे मानं मा कुरु (मधुवंशोद्भवे श्रिया महासम्पत्तेः पत्यौ चेति मानानर्हत्वादिति भावः) [कथं वञ्चकेऽस्मिन् मानो न विधेय इत्याह]—सखि भवने (कृष्णविहीने गृहे) अपरम् (अन्यत्) अधिकसुखं किम् [अस्ति] [माधवाभि- सरणादन्यत् सुखं नास्त्येवेति भावः] ॥१॥ अनुवाद—हे मानिनि ! देखो, इस समय मन्द-मन्द वासन्ती समीर प्रवाहित हो रहा है, श्रीकृष्ण अभिसारके लिए तुम्हारे सङ्केत भवनमें आ रहे हैं। हे सखि ! इससे अधिक बढ़कर और सुख क्या हो सकता है ? पद्यानुवाद— मन्द-मन्द मधु वायु विहरती, लायी उसको यहाँ, सिहरती, बैठी जिसका ध्यान धरो। मानिनि! मत अब मान करो ॥ बालबोधिनी—हे सखी! अब तुम्हें लक्ष्मीपति माधवसे मान नहीं करना चाहिए, वे मधुवंशमें उत्पन्न हुए हैं, महासम्पत्तिके अधिकारी हैं, फिर भी तुम्हें मना रहे हैं, मनाते चले जा रहे हैं—तुम मान करना छोड़ दो। वासन्ती बयार प्रवाहित हो रही है, हरि स्वयं तुम्हारे अभिसारके लिए आ रहे हैं—तुम्हारे ही भवनमें अर्थात् घरमें। इससे बढ़कर सुख और क्या हो सकता है? उनका आगमन सुखकी परावधि है—राधे ! तुम उनका सम्मान करो।

२९४ श्रीगीतगोविन्दम् ताल-फलादपि गुरुमतिसरसम् किं विफली कुरुषे कुच-कलशम् ? माधवे..... ॥२॥ अन्वय-[सुखमस्तु तेन मम किम्? इति चेत् स्तनाभ्यां किमपराद्धमिति सोत्प्रासमाह]-तालफलात् अपि गुरुं (स्थौल्येन काठिन्येन वर्त्तुलत्वेन च तालफलादपि श्रेष्ठं) अतिसरसं (रसभरपूर्णं) कुचकलसं (स्तनकुम्भं) किमु (किमर्थं) विफलीकुरुषे (व्यर्थयसि) [तदनुभवं बिना अस्य विफलीकरणं न युक्तमित्यर्थ:] ॥२॥ अनुवाद-सुपक्व ताल-फलसे भी गुरुतर (भारी) एवं अति रसपूर्ण इन कुच-कलशोंको विफल क्यों कर रही हो? पद्यानुवाद- लज्जित ताल-फलोंकी गुरुता, कुच-कलशोंकी अनुपम रसता, रसमयि! रसका दान करो। मानिनि! मत अब मान करो ॥ बालबोधिनी-सखी कहती हैं कि हे राधे! तुम्हारे कुच-कलश ताल फलसे भी श्रेष्ठ हैं। रस-शास्त्रोंमें ताल-फलको अति गुरु एवं रसमय फल बताया गया है। अतः जिन कुच-कलशोंकी रसता एवं गुरुताके सम्मुख ताल फलका गुरुत्व एवं रसत्व भी निकृष्ट हो जाता है, उनकी सार्थकता तो हरिमें है, हरिके स्पर्शमें है, इन कलशोंका गुरुत्व उन्हींके लिए है और तुम उनका उद्देश्य ही नष्ट कर रही हो। स्तनोंकी विस्तृति अभिव्यक्त करनेके लिए ही उनकी तुलना कलशोंसे की गयी है। मान छोड़ दो एवं श्रीहरिको इस रस-विलासका अनुभव करने दो। कति न कथितमिदमनुपदमचिरम्। मा परिहर हरिमतिशय-रुचिरम् ॥ माधवे... ॥३॥

नवमः सर्गः—मुग्ध-मुकुन्दः २९५ अन्वय—[तदुपदेशं बिना इत्थं क्रियते इत्याह]—इदम् अनुपदम् (पदे पदे) अचिरम् (अधुनैव) कति (कतवारं) [मया] न कथितम्; [यत्] अतिशय-रुचिरं (अतिसुन्दरं) हरिं (मनोहरणशीलं) मा परिहर (मा त्याक्षीः) ॥३॥ अनुवाद—मैं तुम्हें कितनी बार कह रही हूँ कि तुम निरतिशय सुन्दर मनोहर श्रीहरिका परित्याग मत करो। पद्यानुवाद— हरि-तन कलित ललित हियहारी, भूलो मान, बनो बलिहारी, विनती इतनी कान धरो। मानिनि! मत अब मान करो ॥ बालबोधिनी—सखी कहती है—हे राधे! मैं तुम्हें पुनः पुनः समझा रही हूँ कि तुम मान मत करो। श्रीहरि रूप-लावण्यमें सबसे सुन्दर हैं—तुम अपना मान छोड़कर उनका अभिसरण करो, अपना मनोभाव बदलो, श्रीहरि अतिशय रुचिर हैं, सबके मनको हर लेनेवाले हैं, उनका त्याग कभी भी उचित नहीं है। किमिति विषीदसि रोदिषि विकला ? विहसति युवतिसभा तव सकला ॥ माधवे... ॥४॥ अन्वय—[एतदाकर्ण्य साश्रुनेत्रां प्रत्याह]—विकला (व्याकुला) [सती] किमिति (किमर्थं) विषीदसि (विषण्णा भवसि) रोदिषि च [माविषीद मारोद इत्यर्थः]; [तव एवं व्याकुलतामवलोक्य] सकला (समग्रा) युवति सभा (प्रतिपक्ष-युवति-समूहः) विहसति (विशेषेण हसति) ॥४॥ अनुवाद—तुम इतनी शोकविह्वल होकर क्यों रो रही हो? तुम्हारे विकलता-प्रदर्शक इन हाव भावोंको देखकर तुम्हारी प्रतिपक्षी युवतियाँ प्रमुदित हो रही हैं।

२९६ श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— सिसक सिसक रोती हो विकले, तरुण सखी हँसती है, तरले। क्यों झूठा अभिमान करो? मानिनि! मत अब मान करो ॥ बालबोधिनी—सखीकी बातोंको सुनकर श्रीराधा सिसक-सिसक कर रोती हैं, बिलखती हैं। तब सखी कहती है—हे राधे! इस समय तुम विषाद क्यों कर रही हो, क्यों बिलख रही हो? तुम्हारी प्रतिपक्षी युवतियाँ तुम्हारे इन हाव-भावोंको देखकर तुम्हारा उपहास कर रही हैं। कितनी नादान हो तुम, साक्षात् श्रीहरि तुम्हारे चरणोंमें लुण्ठन कर रहे हैं और तुम रोती ही जा रही हो। सजल-नलिनीदल-शीलितशयने। हरिमवलोकय सफलय नयने ॥ माधवे... ॥५ ॥ अन्वय—[यथेयं युवतिसभा न विहसति तथोपदिश इत्याह]—सजल-नलिनी-दल-शीलित-शयने (सजलैः नलिनीदलैः शीलित रचिते शयने शय्यायां) हरिम् अवलोकय; नयने (नेत्रे) सफलय (सफलीकुरु); [त्रिभुवननयनमहोत्सवावलोकनात् अन्यत् फलं नास्तीति भावः] ॥५ ॥ अनुवाद—तुम सजल कमलके दलसे रचित शीतल शय्या पर श्रीकृष्णको प्रेमभरी दृष्टिसे अवलोकन कर नयन-युगलको सफल बनाओ। पद्यानुवाद— सजल कमल जल शीतल शयने— प्रिय राजित हैं, कल चलनयने! पूरे सब अरमान करो। मानिनि! मत अब मान करो ॥

नवमः सर्गः—मुग्ध-मुकुन्दः २९७ बालबोधिनी—सखी श्रीराधासे कह रही है—हे राधे ! देखो, इस अभिसरण-स्थल पर हीरक-हारोंसे युक्त शीतल कमल-पल्लवोंसे रची सेज पर श्रीहरि लेट गये हैं, तुम उनका अवलोकन करो जिनके लिए तरस रही हो, उनके साथ कैसा कलह ? वे तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं, तुम मान ही नहीं छोड़ रही हो। जनयसि मनसि किमिति गुरुखेदम् ? शृणु मम वचनमनीहित भेदम् ॥ माधवे... ॥६॥ अन्वय—[एतदाकर्ण्य खिद्यन्तीं प्राह]—किमिति (कथं) मनसि (चित्ते) गुरुखेदं (महत् कष्टं) जनयसि (सहसे इत्यर्थः) [नैव विधेयम्]; अनीहितभेदं (अनीहितम् अचेष्टित- मनभिलषितमिति यावत् विरहदुःखं तस्य भेदो यस्मात् तादृशं; यथा युवयोः पुनरपि विरहो न भवेदेवम्भूवमित्यर्थः) मम वचनं शृणु [तथा सति पुनस्ते विरहदुःखं मा भवितेत्यर्थः] ॥६ ॥ अनुवाद—तुम मन-ही-मन इतनी क्षुब्ध क्यों हो रही हो ? मेरी बात सुनो, मैं बिना किसी भेदके तुमसे हितकी बात कहती हूँ। पद्यानुवाद— खेद-भारसे बोझिल मन क्यों? काँप रहा है मृदु तन क्यों यों? बालबोधिनी—सखीकी ये सब बात सुनकर भी श्रीराधा दुःखी हो रही थीं, तब सखीने पुनः कहा—हे प्रिय सखि ! मनमें इतना द्वेष क्यों भरा हुआ है, क्यों व्यर्थकी आशंकाएँ तुम्हारे मनमें उठ रही हैं? इतना भारी दुःख क्यों कर रही हो—इस विदारक विरहसे तुम इच्छारहित चेष्टारहित अभिलाषारहित हो गई हो। देखो, मेरी बात सुनो, मैं तुम्हारा अहित नहीं चाहती हूँ—यह समझ लो। तुममें और श्रीकृष्णमें किसी भी प्रकारका भेद नहीं है।

२९८ श्रीगीतगोविन्दम् हरिरुपयातु वदतु बहु-मधुरम्। किमिति करोषि हृदयमतिविधुरम्॥ माधवे... ॥७॥ अन्वय—[श्रोतव्यमेवाह]—हरिः उपयातु (समीपमागच्छतु) बहु मधुरं (चाटु) वदतु। किमिति (कथं) हृदयम् अतिविधुरं (व्याकुलं) करोषि? [श्रीहरेर्मधुरवचनेन मोदस्व चित्तं मा खेदय इत्यर्थः] ॥७॥ अनुवाद—श्रीहरिको अपने निकट आने दो, सुमधुर बातें करने दो, क्यों हृदयको इतना अधिक दुःखी कर रही हो? पद्यानुवाद— जा बोलोंसे गान झरो। मानिनि! मत अब मान करो॥ बालबोधिनी—सखी कहती है—हे प्रिय राधे, हरिको अपने समीप आने दो, उन्हें मधुर बातें कहने दो। उनसे तुम्हारा पृथक् रहना ठीक नहीं है। उनके चाटु वाक्योंसे स्वयंको आनन्दित कर, उन्हें भी आनन्द प्रदान करो। तुम्हारा हृदय उन्हींके लिए व्याकुल है, तुम अपने हृदयके विरुद्ध ऐसा क्यों करती हो? व्यर्थमें ही हृदयको अतिशय वञ्चित कर रही हो, इसी तरह मान करके अपने चित्तको सन्तप्त करना ठीक नहीं है, मान छोड़ दो। श्रीजयदेव-भणितमति-ललितम् । सुखयतु रसिकजनं हरि-चरितम् ॥ माधवे... ॥८॥ अन्वय—हरि चरितं (हरेः चरितं यत्र तत्) [अतः] अतिललितं (अतिमनोहरं) श्रीजयदेव-भणितं (श्रीजयदेवोक्तिः) रसिकजनं (श्रीकृष्णलीलारहस्यरसज्ञं भक्तजनं) सुखयतु (सुखी- करोतु) ॥८॥ अनुवाद—श्रीजयदेव कवि द्वारा विरचित अति सुललित श्रीकृष्ण-चरित-कथा रसिकजनोंका सुख-वर्द्धन करे।

नवमः सर्गः—मुग्ध–मुकुन्दः २९९ पद्यानुवाद— कवि जयदेव कथित यह वाणी। रसिकजनोंको हो सुखदानी॥ रस परिपूरित प्राण करो। मानिनि! मत अब मान करो॥ बालबोधिनी—गीतगोविन्द काव्यके इस अठारहवें प्रबन्धका नाम अमन्दमुकुन्द है। श्रीहरिकी प्रसन्नता एवं रसिक भगवद्भक्तोंकी प्रसन्नता ही इस गानका एकमात्र उद्देश्य और फल है। कवि जयदेव कह रहे हैं मैंने जो यह श्रीकृष्णका चरित वर्णन किया है, वह अति ललित है, यह रसिकोंके हृदयमें आनन्दका विधान करे। स्निग्धे यत्परुषासि यत्प्रणमति–स्तब्धासि यद्रागिणि द्वेषस्थासि यदुन्मुखे विमुखतां यातासि तस्मिन्–प्रिये। तद्युक्तं विपरीतकारिणि तव श्रीखण्डचर्चा विषं शीतांशुस्तपनो हिमं हुतवहः क्रीडामुदो यातनाः ॥ अन्वय—[अथ तस्यां निरुत्तरायां राधायां सखी सेर्यमेवाह]— [राधे] तस्मिन् प्रिये (कृष्णे) स्निग्धे (स्नेहार्द्रे) [अपि] यत् परुषा (निष्ठुरा कटुभाषिणीत्यर्थः) [असि], प्रणमति (प्रणते) [अपि] यत् स्तब्धा (दण्डवत्स्थिता) असि, रागिणि (अनुरागवति) [अपि] यत् द्वेषस्था (विरक्ता) असि, उन्मुखे (त्वन्मुखाव- लोकनोत्सुके) अपि विमुखतां (प्रतिकूलतां) याता (प्राप्ता) असि, अयि विपरीतकारिणि (प्रतिकूलवर्त्तिनि) [तदेतत् ते यद्विपरीतं यातं] तद्युक्तम् (अनुरूपम्); [ततः किम् इत्यते आह]—तव श्रीखण्डचर्चा (चन्दन-विलेपनं) विषम् [विषमिव उद्वेजिका], शीतांशुः चन्द्रः तपनः (सूर्यवत् सन्तापकः), हिमं हुतवहः (अग्निः) [अग्निरिव दाहकं], तथा क्रीडामुदः (क्रीड़या मुदः आमोदाः रतिजनित-हर्षा इति यावत्) यातनाः [सम्पद्यन्ते] [विपरीतबुद्धेः सर्वमेव विपरीतं भवतीति भावः] ॥१॥

३०० श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—राधे ! श्रीकृष्णने विविध विनय वचनोंसे अनुरोध किया और तुम अत्यन्त कठोर बन गयीं। वे तुम्हारे निकट प्रणत हुए और तुमने उनकी ओरसे मुख फेर कर उनकी उपेक्षा की, उन्होंने कितना प्रबल अनुराग दिखाया, तुम द्वेष कर रही हो। वे तुम्हारे प्रति उन्मुख हुए और तुम उनसे विमुख बनी रहीं। हे विपरीत-आचरण-कारिणी ! इस आचरण-वैपरीत्यके कारण ही तुम्हें चन्दन विलेपन विषकी भाँति, स्निग्ध सुशीतल चन्द्र प्रखर दिनकरसम, सुशीतल हिमकर हुताशनवत् और रतिजनित हर्ष विषम यातना सदृश अनुभूत हो रहा है। बालबोधिनी—श्रीराधाके द्वारा जब कोई उत्तर-प्रत्युत्तर नहीं दिया गया, तब सखी उसे सम्बोधित करती हुई बोली—राधे ! इस समय तुम्हें क्या हो गया है? विपरीत आचरण कर रही हो। कैसा उल्टा-पुल्टा व्यवहार कर रही हो, जिस प्रेमके लिए इतनी विकल विदग्ध हो रही थीं, जब वे मिलन हेतु आये तो विचित्र हो गयी हो, इस सुखद अवसरको अपने हाथोंसे खो रही हो, श्रीकृष्ण तुमसे कितना कोमल स्नेह कर रहे हैं, पर तुमने इतना मान कर लिया है कि उनके प्रति इतनी निठुर, रुक्ष, कठोर होकर उनसे पौरुष वाक्य कह रही हो। वे तुम्हारे पैरोंमें विनत हो रहे हैं और तुम स्तब्ध खड़ी हो। वे सर्वगुणसम्पन्न होकर भी तुम्हारे प्रति कितना अनुराग प्रकाश कर रहे हैं और तुम उनसे द्वेष कर रही हो। तुम्हारे श्रीमुखका दर्शन कर कितने उन्मुख-अभिमुख उल्लसित-उत्सुक हो रहे हैं, और तुम उदासीन होकर विमुखता प्रदर्शित कर रही हो। शायद तुम्हारी मति पलट गयी है, विपरीत आचरण करनेवाली तुम्हारे लिए यह समुचित है कि ऐसे सुखदायी अवसर पर चन्दनका लेपन तुम्हें गरल सरिस सन्तप्त कर रहा है, चन्द्रमाकी शीतल किरणें सन्तप्तकारी सूर्यकी दाहक लपटें

नवमः सर्गः—मुग्ध-मुकुन्दः ३०१ प्रतीत हो रही हैं, हिम कृशानु सरीखा दग्ध कर रहा है, रतिजनित आनन्द तुम्हारे लिए कष्टप्रद अनुभूत हो रही है, यह कैसी प्रतिकूलता तुम्हारे अन्तर्मनमें समा गयी है—इस विपरीत व्यवहारका शीघ्र परित्याग करो। सान्द्रानन्द-पुरन्दरादि- दिविषद्‌वृन्दैरमन्दादरा- दानम्र मुकुटेन्द्र नीलमणिभिः सन्दंशितेन्दिन्दिरम्। स्वच्छन्दं मकरन्द-सुन्दर-गलन्मन्दाकिनी-मेदुरं श्रीगोविन्दपदारविन्दमशुभस्कन्दाय वन्दामहे ॥२॥ इति अष्टादश सन्दर्भः। इति श्रीगीतगोविन्दे महाकाव्ये कलहान्तरिता वर्णने मुग्ध-मुकुन्दो नाम नवमः सर्गः। अन्वय—[सम्प्रति श्रीकृष्णस्य ऐश्वर्यं वर्णायन्नाशिषा सर्गं समापयति]—सान्द्रानन्द-पुरन्दरादि-दिविषद्‌वृन्दैः (बलेर्नियमनात् सान्द्रः निविड़ः आनन्दो येषां तेषां पुरन्दरादीनां दिविषदां देवानां वृन्दैः) अमन्दादरात् (अधिकादरात्) आनम्रैः (सम्यक् प्रणतैः) [सद्भिः] मुकुटेन्द्रनीलमणिभिः (मुकुटस्थैः इन्द्रनीलमणिभिः) सन्दंशितेन्दिन्दिरं (सन्दर्शितः इन्दिन्दिरः भ्रमरो यत्र तादृशं) [तथा] स्वच्छन्दं [यथा तथा] मकरन्द-सुन्दर-गलन्मन्दाकिनीमेदुरं (मकरन्दवत् सुन्दरं यथा तथा गलन्त्या क्षरन्त्या मन्दाकिन्या आकाशगङ्गया मेदुरं स्निग्धं) श्रीगोविन्दपदारविन्दम् अशुभस्कन्दाय (अशुभानां भक्तिप्रतिबन्धकानां विनाशाय) वन्दामहे (प्रणमामः) [अतएव श्रीराधिकामानोपशमनचिन्तया मुग्धो मुकुन्दो यत्र सोऽयं सर्गो नवमः] ॥२॥ अनुवाद—बलिराजाका गर्व खर्व होनेसे महान आनन्दमें निमग्न देवतागण बड़े आदरके साथ जिन चरणोंमें प्रणत हुए, इन्द्रनीलमणिमय मुकुटकी शोभा निज चरणोंमें प्रतिबिम्बित होनेसे जो चरण नीलकुवलय सदृश प्रतीत हुए, मकरन्दके समान मनोहारिणी मन्दाकिनी जिन चरणोंसे अनायास ही

३०२ श्रीगीतगोविन्दम् स्वच्छन्दतापूर्वक निःसृत हुई है, समस्त अशुभोंका निराकरण करनेवाले श्रीकृष्णके उन श्रीचरणकमलोंकी हम वन्दना करते हैं। बालबोधिनी- अब कवि जयदेव श्रीकृष्ण द्वारा श्रीराधाके प्रति कहे गये चाटु-वाक्योंका स्मरण कर श्रीराधाकी महिमा स्फूर्त्त होनेसे उनका सौभाग्य प्रतिपादित करनेके लिए श्रीकृष्णके ऐश्वर्यका वर्णन करने लगे हैं। उनका कहना है कि मैं अपने शिष्यों एवं प्रशिष्योंके साथ प्रेमाभक्तिके प्रतिबन्धक अशुभ समुदायकी शान्ति हेतु श्रीगोविन्दके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ। श्रीगोविन्दके चरणकमलोंका माहात्म्य बताते हुए कवि कहते हैं- भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंकी उपमा कमलसे दी गयी है-उनके श्रीचरण, कमलके समान अति मनोहर हैं। जिस प्रकार कमलमें पराग समाहित होता है, उसी प्रकार श्रीकृष्णके चरणोंमें समाहिता आकाशगङ्गा स्वच्छन्द रूपसे निःसृत हो परागवत् मनोहारिणी प्रतीत होती है। परागसे सराबोर कमल पर जैसे भ्रमर सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार अतिशय आनन्दसे ओतप्रोत हो अमन्द-आनन्दसन्दोहसे परिपूर्ण होकर इन्द्रादि देवसमूह श्रीकृष्णको साष्टाङ्ग प्रणाम करते हैं। उस समय प्रणाम करते हुए देवताओंके मस्तकपर स्थित किरीटोंकी इन्द्रनीलादि मणियोंकी कान्ति श्रीकृष्णके चरणोंमें पतित होनेसे श्रीकृष्णके चरणकमल कुवलय (नीलकमल) सदृश प्रतीत होते हैं। नीलकमलोंमें जैसे भ्रमर-समुदाय सदा मंडराता रहता है, उसी प्रकार भक्तजनोंका चित्त श्रीकृष्णके चरणोंमें सदैव मंडराता रहता है, नित्य-निरन्तर उन श्रीचरणोंकी महिमाका गान करता रहता है, योगीगण अपनी बाधाओंके निवारणके लिए उनके श्रीचरणकमलमें सदैव ध्यान लगाये रहते हैं-उन श्रीमुकुन्दके श्रीचरणकमलोंकी महिमाका वर्णन करनेकी सामर्थ्य किसमें है? कितने कौतूहलका विषय है

नवमः सर्गः—मुग्ध-मुकुन्दः ३०३ कि वे ही मुकुन्द श्रीराधाजीका मान उपशमित करनेकी चिन्तामें स्वयं मुग्ध हो रहे हैं, उन श्रीराधाजीकी महिमाका क्या वर्णन किया जाय कि उनके श्रीचरणकमलको मस्तक पर धारण करनेकी प्रार्थना स्वयं मुकुन्द श्रीकृष्ण कर रहे हैं। प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूलविक्रीड़ित छन्द है एवं रूपक अलङ्कारका प्रयोग है। चरणोंमें कमलका, गङ्गाजीमें परागका, मुकुटमें जड़ित इन्द्रनीलादि मणियोंमें भ्रमरका आरोप किया गया है। इस प्रकार श्रीगीतगोविन्द महाकाव्यमें मुग्ध-मुकुन्द नामक नवम सर्गकी बालबोधिनी वृत्ति समाप्त।

दशमः सर्गः चतुरचतुर्भुजः अत्रान्तरे मसृण-रोष-वशामसीम- निःश्वासनिसहमुखीं सुमुखीमुपेत्य। सब्रीडमीक्षितसखीवदनां प्रदोषे सानन्दगद्गदपदं हरिरित्युवाच ॥१॥ अन्वय-अत्रान्तरे (अस्मिन्नवसरे) प्रदोषे (रजनीमुखे) हरिः (श्रीकृष्णः) असीम-निःश्वास-निःसहमुखीं (असीमनिःश्वासेन पुनः पुनः निःश्वासेन निःसहं कान्तवचनादिरहितं मुखं यस्याः तां) [तथा] मसृणरोषवशाम् (मसृणस्य अनुताप-शिथिलस्य रोषस्य वशाम् अधीनाम्; शिथिलमानेन सख्यायत्तामित्यर्थः) [अतएव] सब्रीडं (किमधुना विधेयमिति सलज्जं यथास्यात् तथा) ईक्षितसखीवदनां (ईक्षितं दृष्टं सख्याः वदनं यया तादृशीं) सुमुखीं (किञ्चित्-कोपोशमेन प्रसन्नवदनां) राधाम् उपेत्य (प्राप्य) सानन्दगद्गदपदं (सानन्दनि गद्गदानी गलदक्षराणि पदानि यत्र तद् यथा स्यात् तथा) इति (वक्ष्यमाणं वचनम्) उवाच ॥१॥ पद्यानुवाद- लजती लखती सखी ओर औ लेतीं श्वासें रीते। रोषमयी राधासे बोले प्रमुदित हरि दिन बीते ॥ अनुवाद-इसी समय दिवसका अवसान होने पर मसृण रोषमयी दीर्घ निःश्वासोंको सहन करनेमें असमर्थ मलिन मुखवाली, लज्जापूर्वक सखीके मुखको देखनेवाली सुवदना श्रीराधाके समीप आकर आनन्दसे उत्फुल्लित हुए श्रीहरि श्रीराधासे गद्गद स्वरमें कहने लगे। बालबोधिनी-प्रियसखीने कोप दूर करनेके लिए श्रीराधाको विविध प्रकारसे समझाया। पर किशोरीजीका क्रोधावेश क्षीण

दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३०५ नहीं हुआ, इतनेमें दिन भी ढलने लगा, विरह-तापसे दीर्घश्वास चल रहे हैं, मुख-कमल अतिशय मलिन हो रहा है, सखी उसके मान प्रशमन करनेके सारे उपाय कर शान्त हो चुकी है, स्वयंने भी अभी-अभी श्रीकृष्णकी उपेक्षा की है, फिर उनको पानेकी अभिलाषा कैसे करे। अतः बार-बार अत्यन्त लज्जाके साथ सखीकी ओर देख रही है। प्रेमकी उद्विग्नता है, उदासी छाई है। इसी प्रदोषकालमें श्रीकृष्णने विचार किया कि श्रीराधा हृदयमें पछता रही होंगी। चलो, उसने जो आरोप लगाया है, उसे स्वीकार कर उसीकी बात रखकर क्षमा याचना कर लूँ। अतः वे सुवन्दना श्रीराधाके समीप आकर आनन्दसे प्रफुल्लित होकर प्रणयसे गद्गद स्वरमें निवेदन करने लगे। ऊनविंश सन्दर्भः गीतम् ॥१९॥ देशवराडीरागाष्टातालीतालाभ्यां गीयते। अनुवाद—गीतगोविन्द काव्यका यह उन्नीसवाँ प्रबन्ध देशवराडी राग तथा अष्टताली तालमें गाया जाता है। वदसि यदि किञ्चिदपि दन्त-रुचि-कौमुदी हरति दर-तिमिरमति घोरम्। स्फुरदधर-शीधवे तव वदन-चन्द्रमा रचयतु लोचन चकोरम्॥१॥ प्रिये! चारुशीले! मुञ्च मयि मानमनिदानम्। सपदि मदाननलो दहति मम मानसं देहि मुखकमल-मधुपानम्॥ध्रुवपदम्॥ अन्वय—अयि चारुशीले (मनोज्ञस्वभावे) प्रिये (प्रेयसि) मयि अनिदानं (अकारणं) मानं (कोपं) मुञ्च (चारुशीलायास्ते

“प्रिये! चारुशीले! तजो मान प्यारा।”