भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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२९८ श्रीगीतगोविन्दम् हरिरुपयातु वदतु बहु-मधुरम्। किमिति करोषि हृदयमतिविधुरम्॥ माधवे... ॥७॥ अन्वय—[श्रोतव्यमेवाह]—हरिः उपयातु (समीपमागच्छतु) बहु मधुरं (चाटु) वदतु। किमिति (कथं) हृदयम् अतिविधुरं (व्याकुलं) करोषि? [श्रीहरेर्मधुरवचनेन मोदस्व चित्तं मा खेदय इत्यर्थः] ॥७॥ अनुवाद—श्रीहरिको अपने निकट आने दो, सुमधुर बातें करने दो, क्यों हृदयको इतना अधिक दुःखी कर रही हो? पद्यानुवाद— जा बोलोंसे गान झरो। मानिनि! मत अब मान करो॥ बालबोधिनी—सखी कहती है—हे प्रिय राधे, हरिको अपने समीप आने दो, उन्हें मधुर बातें कहने दो। उनसे तुम्हारा पृथक् रहना ठीक नहीं है। उनके चाटु वाक्योंसे स्वयंको आनन्दित कर, उन्हें भी आनन्द प्रदान करो। तुम्हारा हृदय उन्हींके लिए व्याकुल है, तुम अपने हृदयके विरुद्ध ऐसा क्यों करती हो? व्यर्थमें ही हृदयको अतिशय वञ्चित कर रही हो, इसी तरह मान करके अपने चित्तको सन्तप्त करना ठीक नहीं है, मान छोड़ दो। श्रीजयदेव-भणितमति-ललितम् । सुखयतु रसिकजनं हरि-चरितम् ॥ माधवे... ॥८॥ अन्वय—हरि चरितं (हरेः चरितं यत्र तत्) [अतः] अतिललितं (अतिमनोहरं) श्रीजयदेव-भणितं (श्रीजयदेवोक्तिः) रसिकजनं (श्रीकृष्णलीलारहस्यरसज्ञं भक्तजनं) सुखयतु (सुखी- करोतु) ॥८॥ अनुवाद—श्रीजयदेव कवि द्वारा विरचित अति सुललित श्रीकृष्ण-चरित-कथा रसिकजनोंका सुख-वर्द्धन करे।