गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमः सर्गः—मुग्ध–मुकुन्दः २९९ पद्यानुवाद— कवि जयदेव कथित यह वाणी। रसिकजनोंको हो सुखदानी॥ रस परिपूरित प्राण करो। मानिनि! मत अब मान करो॥ बालबोधिनी—गीतगोविन्द काव्यके इस अठारहवें प्रबन्धका नाम अमन्दमुकुन्द है। श्रीहरिकी प्रसन्नता एवं रसिक भगवद्भक्तोंकी प्रसन्नता ही इस गानका एकमात्र उद्देश्य और फल है। कवि जयदेव कह रहे हैं मैंने जो यह श्रीकृष्णका चरित वर्णन किया है, वह अति ललित है, यह रसिकोंके हृदयमें आनन्दका विधान करे। स्निग्धे यत्परुषासि यत्प्रणमति–स्तब्धासि यद्रागिणि द्वेषस्थासि यदुन्मुखे विमुखतां यातासि तस्मिन्–प्रिये। तद्युक्तं विपरीतकारिणि तव श्रीखण्डचर्चा विषं शीतांशुस्तपनो हिमं हुतवहः क्रीडामुदो यातनाः ॥ अन्वय—[अथ तस्यां निरुत्तरायां राधायां सखी सेर्यमेवाह]— [राधे] तस्मिन् प्रिये (कृष्णे) स्निग्धे (स्नेहार्द्रे) [अपि] यत् परुषा (निष्ठुरा कटुभाषिणीत्यर्थः) [असि], प्रणमति (प्रणते) [अपि] यत् स्तब्धा (दण्डवत्स्थिता) असि, रागिणि (अनुरागवति) [अपि] यत् द्वेषस्था (विरक्ता) असि, उन्मुखे (त्वन्मुखाव- लोकनोत्सुके) अपि विमुखतां (प्रतिकूलतां) याता (प्राप्ता) असि, अयि विपरीतकारिणि (प्रतिकूलवर्त्तिनि) [तदेतत् ते यद्विपरीतं यातं] तद्युक्तम् (अनुरूपम्); [ततः किम् इत्यते आह]—तव श्रीखण्डचर्चा (चन्दन-विलेपनं) विषम् [विषमिव उद्वेजिका], शीतांशुः चन्द्रः तपनः (सूर्यवत् सन्तापकः), हिमं हुतवहः (अग्निः) [अग्निरिव दाहकं], तथा क्रीडामुदः (क्रीड़या मुदः आमोदाः रतिजनित-हर्षा इति यावत्) यातनाः [सम्पद्यन्ते] [विपरीतबुद्धेः सर्वमेव विपरीतं भवतीति भावः] ॥१॥