गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०० श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—राधे ! श्रीकृष्णने विविध विनय वचनोंसे अनुरोध किया और तुम अत्यन्त कठोर बन गयीं। वे तुम्हारे निकट प्रणत हुए और तुमने उनकी ओरसे मुख फेर कर उनकी उपेक्षा की, उन्होंने कितना प्रबल अनुराग दिखाया, तुम द्वेष कर रही हो। वे तुम्हारे प्रति उन्मुख हुए और तुम उनसे विमुख बनी रहीं। हे विपरीत-आचरण-कारिणी ! इस आचरण-वैपरीत्यके कारण ही तुम्हें चन्दन विलेपन विषकी भाँति, स्निग्ध सुशीतल चन्द्र प्रखर दिनकरसम, सुशीतल हिमकर हुताशनवत् और रतिजनित हर्ष विषम यातना सदृश अनुभूत हो रहा है। बालबोधिनी—श्रीराधाके द्वारा जब कोई उत्तर-प्रत्युत्तर नहीं दिया गया, तब सखी उसे सम्बोधित करती हुई बोली—राधे ! इस समय तुम्हें क्या हो गया है? विपरीत आचरण कर रही हो। कैसा उल्टा-पुल्टा व्यवहार कर रही हो, जिस प्रेमके लिए इतनी विकल विदग्ध हो रही थीं, जब वे मिलन हेतु आये तो विचित्र हो गयी हो, इस सुखद अवसरको अपने हाथोंसे खो रही हो, श्रीकृष्ण तुमसे कितना कोमल स्नेह कर रहे हैं, पर तुमने इतना मान कर लिया है कि उनके प्रति इतनी निठुर, रुक्ष, कठोर होकर उनसे पौरुष वाक्य कह रही हो। वे तुम्हारे पैरोंमें विनत हो रहे हैं और तुम स्तब्ध खड़ी हो। वे सर्वगुणसम्पन्न होकर भी तुम्हारे प्रति कितना अनुराग प्रकाश कर रहे हैं और तुम उनसे द्वेष कर रही हो। तुम्हारे श्रीमुखका दर्शन कर कितने उन्मुख-अभिमुख उल्लसित-उत्सुक हो रहे हैं, और तुम उदासीन होकर विमुखता प्रदर्शित कर रही हो। शायद तुम्हारी मति पलट गयी है, विपरीत आचरण करनेवाली तुम्हारे लिए यह समुचित है कि ऐसे सुखदायी अवसर पर चन्दनका लेपन तुम्हें गरल सरिस सन्तप्त कर रहा है, चन्द्रमाकी शीतल किरणें सन्तप्तकारी सूर्यकी दाहक लपटें