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गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

३०० श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—राधे ! श्रीकृष्णने विविध विनय वचनोंसे अनुरोध किया और तुम अत्यन्त कठोर बन गयीं। वे तुम्हारे निकट प्रणत हुए और तुमने उनकी ओरसे मुख फेर कर उनकी उपेक्षा की, उन्होंने कितना प्रबल अनुराग दिखाया, तुम द्वेष कर रही हो। वे तुम्हारे प्रति उन्मुख हुए और तुम उनसे विमुख बनी रहीं। हे विपरीत-आचरण-कारिणी ! इस आचरण-वैपरीत्यके कारण ही तुम्हें चन्दन विलेपन विषकी भाँति, स्निग्ध सुशीतल चन्द्र प्रखर दिनकरसम, सुशीतल हिमकर हुताशनवत् और रतिजनित हर्ष विषम यातना सदृश अनुभूत हो रहा है। बालबोधिनी—श्रीराधाके द्वारा जब कोई उत्तर-प्रत्युत्तर नहीं दिया गया, तब सखी उसे सम्बोधित करती हुई बोली—राधे ! इस समय तुम्हें क्या हो गया है? विपरीत आचरण कर रही हो। कैसा उल्टा-पुल्टा व्यवहार कर रही हो, जिस प्रेमके लिए इतनी विकल विदग्ध हो रही थीं, जब वे मिलन हेतु आये तो विचित्र हो गयी हो, इस सुखद अवसरको अपने हाथोंसे खो रही हो, श्रीकृष्ण तुमसे कितना कोमल स्नेह कर रहे हैं, पर तुमने इतना मान कर लिया है कि उनके प्रति इतनी निठुर, रुक्ष, कठोर होकर उनसे पौरुष वाक्य कह रही हो। वे तुम्हारे पैरोंमें विनत हो रहे हैं और तुम स्तब्ध खड़ी हो। वे सर्वगुणसम्पन्न होकर भी तुम्हारे प्रति कितना अनुराग प्रकाश कर रहे हैं और तुम उनसे द्वेष कर रही हो। तुम्हारे श्रीमुखका दर्शन कर कितने उन्मुख-अभिमुख उल्लसित-उत्सुक हो रहे हैं, और तुम उदासीन होकर विमुखता प्रदर्शित कर रही हो। शायद तुम्हारी मति पलट गयी है, विपरीत आचरण करनेवाली तुम्हारे लिए यह समुचित है कि ऐसे सुखदायी अवसर पर चन्दनका लेपन तुम्हें गरल सरिस सन्तप्त कर रहा है, चन्द्रमाकी शीतल किरणें सन्तप्तकारी सूर्यकी दाहक लपटें

नवमः सर्गः—मुग्ध-मुकुन्दः ३०१ प्रतीत हो रही हैं, हिम कृशानु सरीखा दग्ध कर रहा है, रतिजनित आनन्द तुम्हारे लिए कष्टप्रद अनुभूत हो रही है, यह कैसी प्रतिकूलता तुम्हारे अन्तर्मनमें समा गयी है—इस विपरीत व्यवहारका शीघ्र परित्याग करो। सान्द्रानन्द-पुरन्दरादि- दिविषद्‌वृन्दैरमन्दादरा- दानम्र मुकुटेन्द्र नीलमणिभिः सन्दंशितेन्दिन्दिरम्। स्वच्छन्दं मकरन्द-सुन्दर-गलन्मन्दाकिनी-मेदुरं श्रीगोविन्दपदारविन्दमशुभस्कन्दाय वन्दामहे ॥२॥ इति अष्टादश सन्दर्भः। इति श्रीगीतगोविन्दे महाकाव्ये कलहान्तरिता वर्णने मुग्ध-मुकुन्दो नाम नवमः सर्गः। अन्वय—[सम्प्रति श्रीकृष्णस्य ऐश्वर्यं वर्णायन्नाशिषा सर्गं समापयति]—सान्द्रानन्द-पुरन्दरादि-दिविषद्‌वृन्दैः (बलेर्नियमनात् सान्द्रः निविड़ः आनन्दो येषां तेषां पुरन्दरादीनां दिविषदां देवानां वृन्दैः) अमन्दादरात् (अधिकादरात्) आनम्रैः (सम्यक् प्रणतैः) [सद्भिः] मुकुटेन्द्रनीलमणिभिः (मुकुटस्थैः इन्द्रनीलमणिभिः) सन्दंशितेन्दिन्दिरं (सन्दर्शितः इन्दिन्दिरः भ्रमरो यत्र तादृशं) [तथा] स्वच्छन्दं [यथा तथा] मकरन्द-सुन्दर-गलन्मन्दाकिनीमेदुरं (मकरन्दवत् सुन्दरं यथा तथा गलन्त्या क्षरन्त्या मन्दाकिन्या आकाशगङ्गया मेदुरं स्निग्धं) श्रीगोविन्दपदारविन्दम् अशुभस्कन्दाय (अशुभानां भक्तिप्रतिबन्धकानां विनाशाय) वन्दामहे (प्रणमामः) [अतएव श्रीराधिकामानोपशमनचिन्तया मुग्धो मुकुन्दो यत्र सोऽयं सर्गो नवमः] ॥२॥ अनुवाद—बलिराजाका गर्व खर्व होनेसे महान आनन्दमें निमग्न देवतागण बड़े आदरके साथ जिन चरणोंमें प्रणत हुए, इन्द्रनीलमणिमय मुकुटकी शोभा निज चरणोंमें प्रतिबिम्बित होनेसे जो चरण नीलकुवलय सदृश प्रतीत हुए, मकरन्दके समान मनोहारिणी मन्दाकिनी जिन चरणोंसे अनायास ही

३०२ श्रीगीतगोविन्दम् स्वच्छन्दतापूर्वक निःसृत हुई है, समस्त अशुभोंका निराकरण करनेवाले श्रीकृष्णके उन श्रीचरणकमलोंकी हम वन्दना करते हैं। बालबोधिनी- अब कवि जयदेव श्रीकृष्ण द्वारा श्रीराधाके प्रति कहे गये चाटु-वाक्योंका स्मरण कर श्रीराधाकी महिमा स्फूर्त्त होनेसे उनका सौभाग्य प्रतिपादित करनेके लिए श्रीकृष्णके ऐश्वर्यका वर्णन करने लगे हैं। उनका कहना है कि मैं अपने शिष्यों एवं प्रशिष्योंके साथ प्रेमाभक्तिके प्रतिबन्धक अशुभ समुदायकी शान्ति हेतु श्रीगोविन्दके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ। श्रीगोविन्दके चरणकमलोंका माहात्म्य बताते हुए कवि कहते हैं- भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंकी उपमा कमलसे दी गयी है-उनके श्रीचरण, कमलके समान अति मनोहर हैं। जिस प्रकार कमलमें पराग समाहित होता है, उसी प्रकार श्रीकृष्णके चरणोंमें समाहिता आकाशगङ्गा स्वच्छन्द रूपसे निःसृत हो परागवत् मनोहारिणी प्रतीत होती है। परागसे सराबोर कमल पर जैसे भ्रमर सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार अतिशय आनन्दसे ओतप्रोत हो अमन्द-आनन्दसन्दोहसे परिपूर्ण होकर इन्द्रादि देवसमूह श्रीकृष्णको साष्टाङ्ग प्रणाम करते हैं। उस समय प्रणाम करते हुए देवताओंके मस्तकपर स्थित किरीटोंकी इन्द्रनीलादि मणियोंकी कान्ति श्रीकृष्णके चरणोंमें पतित होनेसे श्रीकृष्णके चरणकमल कुवलय (नीलकमल) सदृश प्रतीत होते हैं। नीलकमलोंमें जैसे भ्रमर-समुदाय सदा मंडराता रहता है, उसी प्रकार भक्तजनोंका चित्त श्रीकृष्णके चरणोंमें सदैव मंडराता रहता है, नित्य-निरन्तर उन श्रीचरणोंकी महिमाका गान करता रहता है, योगीगण अपनी बाधाओंके निवारणके लिए उनके श्रीचरणकमलमें सदैव ध्यान लगाये रहते हैं-उन श्रीमुकुन्दके श्रीचरणकमलोंकी महिमाका वर्णन करनेकी सामर्थ्य किसमें है? कितने कौतूहलका विषय है

नवमः सर्गः—मुग्ध-मुकुन्दः ३०३ कि वे ही मुकुन्द श्रीराधाजीका मान उपशमित करनेकी चिन्तामें स्वयं मुग्ध हो रहे हैं, उन श्रीराधाजीकी महिमाका क्या वर्णन किया जाय कि उनके श्रीचरणकमलको मस्तक पर धारण करनेकी प्रार्थना स्वयं मुकुन्द श्रीकृष्ण कर रहे हैं। प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूलविक्रीड़ित छन्द है एवं रूपक अलङ्कारका प्रयोग है। चरणोंमें कमलका, गङ्गाजीमें परागका, मुकुटमें जड़ित इन्द्रनीलादि मणियोंमें भ्रमरका आरोप किया गया है। इस प्रकार श्रीगीतगोविन्द महाकाव्यमें मुग्ध-मुकुन्द नामक नवम सर्गकी बालबोधिनी वृत्ति समाप्त।

दशमः सर्गः चतुरचतुर्भुजः अत्रान्तरे मसृण-रोष-वशामसीम- निःश्वासनिसहमुखीं सुमुखीमुपेत्य। सब्रीडमीक्षितसखीवदनां प्रदोषे सानन्दगद्गदपदं हरिरित्युवाच ॥१॥ अन्वय-अत्रान्तरे (अस्मिन्नवसरे) प्रदोषे (रजनीमुखे) हरिः (श्रीकृष्णः) असीम-निःश्वास-निःसहमुखीं (असीमनिःश्वासेन पुनः पुनः निःश्वासेन निःसहं कान्तवचनादिरहितं मुखं यस्याः तां) [तथा] मसृणरोषवशाम् (मसृणस्य अनुताप-शिथिलस्य रोषस्य वशाम् अधीनाम्; शिथिलमानेन सख्यायत्तामित्यर्थः) [अतएव] सब्रीडं (किमधुना विधेयमिति सलज्जं यथास्यात् तथा) ईक्षितसखीवदनां (ईक्षितं दृष्टं सख्याः वदनं यया तादृशीं) सुमुखीं (किञ्चित्-कोपोशमेन प्रसन्नवदनां) राधाम् उपेत्य (प्राप्य) सानन्दगद्गदपदं (सानन्दनि गद्गदानी गलदक्षराणि पदानि यत्र तद् यथा स्यात् तथा) इति (वक्ष्यमाणं वचनम्) उवाच ॥१॥ पद्यानुवाद- लजती लखती सखी ओर औ लेतीं श्वासें रीते। रोषमयी राधासे बोले प्रमुदित हरि दिन बीते ॥ अनुवाद-इसी समय दिवसका अवसान होने पर मसृण रोषमयी दीर्घ निःश्वासोंको सहन करनेमें असमर्थ मलिन मुखवाली, लज्जापूर्वक सखीके मुखको देखनेवाली सुवदना श्रीराधाके समीप आकर आनन्दसे उत्फुल्लित हुए श्रीहरि श्रीराधासे गद्गद स्वरमें कहने लगे। बालबोधिनी-प्रियसखीने कोप दूर करनेके लिए श्रीराधाको विविध प्रकारसे समझाया। पर किशोरीजीका क्रोधावेश क्षीण

दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३०५ नहीं हुआ, इतनेमें दिन भी ढलने लगा, विरह-तापसे दीर्घश्वास चल रहे हैं, मुख-कमल अतिशय मलिन हो रहा है, सखी उसके मान प्रशमन करनेके सारे उपाय कर शान्त हो चुकी है, स्वयंने भी अभी-अभी श्रीकृष्णकी उपेक्षा की है, फिर उनको पानेकी अभिलाषा कैसे करे। अतः बार-बार अत्यन्त लज्जाके साथ सखीकी ओर देख रही है। प्रेमकी उद्विग्नता है, उदासी छाई है। इसी प्रदोषकालमें श्रीकृष्णने विचार किया कि श्रीराधा हृदयमें पछता रही होंगी। चलो, उसने जो आरोप लगाया है, उसे स्वीकार कर उसीकी बात रखकर क्षमा याचना कर लूँ। अतः वे सुवन्दना श्रीराधाके समीप आकर आनन्दसे प्रफुल्लित होकर प्रणयसे गद्गद स्वरमें निवेदन करने लगे। ऊनविंश सन्दर्भः गीतम् ॥१९॥ देशवराडीरागाष्टातालीतालाभ्यां गीयते। अनुवाद—गीतगोविन्द काव्यका यह उन्नीसवाँ प्रबन्ध देशवराडी राग तथा अष्टताली तालमें गाया जाता है। वदसि यदि किञ्चिदपि दन्त-रुचि-कौमुदी हरति दर-तिमिरमति घोरम्। स्फुरदधर-शीधवे तव वदन-चन्द्रमा रचयतु लोचन चकोरम्॥१॥ प्रिये! चारुशीले! मुञ्च मयि मानमनिदानम्। सपदि मदाननलो दहति मम मानसं देहि मुखकमल-मधुपानम्॥ध्रुवपदम्॥ अन्वय—अयि चारुशीले (मनोज्ञस्वभावे) प्रिये (प्रेयसि) मयि अनिदानं (अकारणं) मानं (कोपं) मुञ्च (चारुशीलायास्ते

“प्रिये! चारुशीले! तजो मान प्यारा।”

अकारणमानोऽयुक्त इति भावः)। मदनाननलः (कामाग्निः) सपदि (झटिति; तव मान-समकालमेव इत्यर्थः), मम मानसं दहति; [तस्मात्] मुखकमल-मधुपानं (मुखमेव कमलं पद्मं तस्य मधु तस्य पानं) देहि (अन्तर्दाहस्य पानेनैव शान्तिः, अतो मां मुखपद्ममधु पायय इत्यर्थः) (ध्रु) ॥ [दुरापमिदं दूरेऽस्तु]—यदि किञ्चिदपि वदसि तदा [तव] दन्तरुचिकौमुदी (दन्तानां रुचिः दीप्तिरेव कौमुदी ज्योत्स्ना) [मम] अतिघोरं (भयजनकं) दरतिमिरं (प्रगाढं हृदय-निहितं तिमिरम् अन्धकारं) हरति। [किञ्च] तव वदनचन्द्रमाः (मुखचन्द्रः) स्फुरदधर-सीधवे (स्फुरतः उच्छलितस्य अधरस्य सीधवे अमृताय अमृतपानार्थमित्यर्थः) [मम] लोचनचकोरं (लोचनं नेत्रमेव चकोरस्तं) रोचयति (साभिलाषं करोति) [नयनस्य चकोरत्वेन त्वदेकजीवनत्वमुक्तम्] ॥१॥ पद्यानुवाद— प्रिये! चारुशीले! तजो मान प्यारा, अधर-पद्म-रस दे हरो ताप सारा। तनिक बोल बोलो, खिले दन्त ज्योत्स्ना, हरो घोर तम-मय, भरो प्राण-कोना, सुधा सम अधर मधु, वदन चन्द्रमा से— लगे लोल लोचन, चकोरक बने से प्रिये! चारुशीले! तजो मान प्यारा, अधर पद्म-रस दे हरो ताप सारा॥ अनुवाद—हे प्रिये ! हे सुन्दर स्वभावमयी राधे ! मेरे प्रति इस प्रकार अकारण मानका परिहार करो, मदनाननल मेरे हृदयको दग्ध कर रहा है, मुझे अपने मुखकमलका मधुपान करने दो, यदि तुम मुझसे कुछ भी बात करोगी तो तुम्हारी दशन पंक्तिकी किरणोंकी ज्योतिसे मेरा भय रूपी घोर अंधकार दूर हो जायेगा, तुम्हारा मुखचन्द्र मेरे नयन-चकोरको तुम्हारी अधर-सुधाका पान करनेके लिए अभिलाषी बना दे।

३०८ श्रीगीतगोविन्दम् बालबोधिनी—श्रीकृष्ण श्रीराधाजीसे कहते हैं—हे प्रिये ! तुम्हारा स्वभाव तो अति शोभन है। तुमने मेरे विषयमें जो अकारण मान ठान लिया है, वह तो उचित नहीं है। जबसे तुमने मान किया है, तबसे कामदाह मुझे जलाये जा रहा है, मानका कोई कारण भी तो नहीं है, व्यर्थ ही परस्त्री-रमणकी शंका कर रही हो—तुम्हारे ही आश्रयसे काम मुझे व्यथित कर रहा है। अपने मुखकमलका मुझे मधुपान कराओ, जिससे मेरा अन्तर्दाह प्रशमित हो जायेगा—यह अति दुर्लभ है। इसे जाने दो, पर कुछ बोलो तो सही, अनुकूल अथवा प्रतिकूल, पर कुछ तो कहो—जब तुम कुछ कहोगी तो तुम्हारा मुखकमल विलसित-विकसित होगा। इससे तुम्हारे दन्तकी कान्ति-कौमुदी प्रकाशित होगी और इससे मेरे अन्तःकरणमें निहित भय-तिमिर विनष्ट हो जायेगा। राधे, तुम्हारे चन्द्रवदनसे ऐसी अधर सुधा छलक रही है कि मेरे नयन चकोर तो इस आसवका पान करना चाहते हैं। प्रिये, चारुचरित्रे ! तुम ही तो मेरे नयन-चकोरकी जीवन-स्वरूपा हो। सत्यमेवासि यदि सुदति मयि कोपिनी देहि खरनयनशरघातम्। घटय भुजबन्धनं जनय रदखण्डनं येन वा भवति सुखजातम् ॥ प्रिये.... ॥२॥ अन्वय—अयि सुदति (प्रसन्नवदने) यदि [त्वदेकजीवने] मयि सत्यमेव कोपिनी (क्रुद्धा) असि, [तदा] खरनयन-शरघातं (खरैः तीक्ष्णैः नयन-शरैः घातं प्रहारं) देहि (कुरु इत्यर्थः), [एतेनापि यदि न तुष्यसि] भुजबन्धनं (भुजाभ्यां बन्धनं) घटय (विधेहि); [तेनापि असन्तोषश्चेत्] रदखण्डनं (रदैः दन्तैः खण्डनं दंशनं) जनय (कुरु); [किं बहुना] येन वा (अन्येन) [तव] सुखजातं (सुखसमूहः) भवति [तत्कुरु इति शेषः] [अत्र गूढोऽभिप्रायः स्वीयेऽपराधिनि दण्डएवोचितो नोपेक्षा कर्त्तव्या इति] ॥२॥

दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३०९ पद्यानुवाद— अगर रोष है, खर-नखर वाण छेदो भुजपाश बाँधो, अधर दन्त भेदो। अनुवाद—हे शोभन-दन्ते! यदि तुम यथार्थमें ही मुझपर कुपित हो रही हो तो मुझपर तीक्ष्ण नख-वाणोंका आघात करो, अपने भुजबन्धनमें मुझे बाँध लो, दाँतोंके आघातसे मेरे होठोंको काटो, जिससे तुम्हें सुख मिले—तुम वही करो। बालबोधिनी—श्रीकृष्ण श्रीराधाको मनाते हुए कह रहे हैं—हे शोभनदन्ते! सुन्दर दन्तराजिसे विलसित प्रियतमे राधे! तुम मेरे प्रति रोष मत करो। यदि वस्तुतः मुझपर क्रोध प्रकाशित ही करना चाहती हो, तो मुझपर अपने तीक्ष्ण नेत्र-वाणोंका प्रहार करो, फिर भी तुम्हारे क्रोधकी शान्ति नहीं होती है, तो मुझे और भी दण्ड दो। अपनी भुजाओंके बन्धनमें मुझे बाँध लो, कैद कर लो, फिर भी सन्तुष्टि नहीं होती है तो अपने दन्त आघातसे मुझे खण्डित कर दो, मेरे शरीरको काट डालो, इससे भी तुम्हें सन्तोष नहीं होता हो तो तुम्हें जो उपाय उचित लगे, वही करो। मैं अपराध योग्य हूँ, दण्डनीय हूँ। अपने सुखके लिए मुझपर किसी भी दण्डका विधान करो। यहाँ ताड़न-बन्धन, खंडन आदिके व्याजसे नखक्षत, आलिङ्गन एवं चुम्बन आदिकी प्रार्थना की जा रही है। त्वमसि मम भूषणं त्वमसि मम जीवनं, त्वमसि मम भव-जलधि-रत्नम्। भवतु भवतीह मयि सततमनुरोधिनी, तत्र मम हृदयमतियत्नम् ॥ प्रिये.... ॥३॥ अन्वय—[ननु या तव प्रियतमा सैव दण्डं विदधातु इति चेत् तत्राह]—अयि प्रियतमे त्वं भूषणम् (अलङ्कारः) असि;

३१० श्रीगीतगोविन्दम् त्वं मम जीवनं (प्राणभूता) असि [त्वद्व्यतिरेकेण अन्यज्जीवना- दिकमपि मे नास्ति तर्हि अन्याङ्गनानां का वार्त्ता इति भावः]; [किञ्च] त्वं मम भवजलधिरत्नं (भवः संसारः स एव जलधिः तत्र त्वमेव रत्नरूपा सर्वप्रेयसीश्रेष्ठा इत्यर्थः) असि; [यथा कश्चित् रत्नाकरात् विचित्ररत्नं लब्ध्वा आत्मानं पूर्णमनोरथं मनुते तथा स्त्रीरत्नभूतां त्वां प्राप्य कृतार्थोऽस्मीति भावः]; [अतएव] भवती इह (अस्मिन् त्वन्मात्रशरणे) मयि सततम् (सदा) अनुरोधिनी (अनुकूला) भवतु। तत्र (तव आनुकूल्ये) मम हृदयम् (चित्तम्) अतियत्नं (अतिशयेन यत्नो यस्य तत् अतीव यत्नवदित्यर्थः) [तवानुकूल्यलाभार्थमेव हृदयं मे सततं यतते इति भावः]॥३॥ पद्यानुवाद— सखी, प्राण, भूषण तुम्हीं रत्न भव की। द्रवो आज रानी! हरो आग हिय की॥ प्रिये! चारुशीले! तजो मान प्यारा। अधर पद्म-रस दे हरो ताप सारा॥ अनुवाद—तुम ही मेरी भूषण स्वरूप हो, तुम ही मेरा जीवन हो, तुम ही मेरे संसार-समुद्रके रत्नस्वरूप हो, अब तुम ही सतत मेरे प्रति अनुरोधिनी बनी रहो—यही मेरा एकान्तिक प्रयास है। बालबोधिनी—यदि श्रीराधा कहे कि हे श्रीकृष्ण! मैं तो तुम्हें दण्ड भी नहीं दे पाती, तुम्हारी और भी प्रियाएँ हैं, उन्हींसे जाकर निवेदन करो। तो इस आशंका पर श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिये ! तुम ही मेरा सम्पूर्ण श्रृंगार हो, तुमसे ही अलंकृत होकर तो मैं सर्वत्र सौभाग्यवान हूँ, बाह्य आभूषणकी बात तो दूर रहे तुम ही मेरे जीवनका आधार हो, मेरी प्राण! तुम्हारे बिना तो मैं जी भी नहीं सकता। दूसरी रमणियोंकी तब बात ही कहाँ? तुम ही मुझे इस भवसागरमें मिली अनुपम रत्नराशि हो। जैसे कोई रत्नाकरसे विचित्र

दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३११ रत्न प्राप्तकर अपनेको कृतार्थ मानता है वैसे ही मैं तुम जैसी रमणी-रत्नको प्राप्तकर कृतकृत्य हो रहा हूँ। अतः मेरे ऊपर सदैव अनुकूल बनी रहो—यही मेरा हृदय निरन्तर यत्न कर रहा है। मेरा सम्पूर्ण प्रयास तुम्हारी कृपा प्राप्तिके लिए ही है। नीलनलिनाभमपि तन्वि तव लोचनं धारयति कोकनद-रूपम्। कुसुमशरबाणभावेन यदि रञ्जयसि कृष्णमिदमेतदनुरूपम् ॥ प्रिये.... ॥४॥ अन्वय—[स्वगुण-परीक्षणोपकरणत्वेन चेन्मामङ्गीकरोषि तथापि चरितार्थः स्याम् इत्यत आह]—अयि तन्वि (कृशाङ्गि) नील- नलिनाभमपि (नीलोत्पलतुल्यमपि) तव लोचनं [सम्प्रति अभिमानज-रोषात्] कोकनदरूपं (रक्तोत्पलरूपं) धारयति [एतेन त्वयि अनुरञ्जिनी विद्यास्ति इत्यवधारितम्; एषा विद्या मयि परीक्ष्यताम्]; [परीक्षाप्रकारमाह]—यदि [त्वं] कृष्णं (कृष्णरूपं मां) [तेन लोचनेन] कुसुमशरबाणभावेन (कुसुमशरस्य मदनस्य यः सम्मोहनाख्यः बाणः तस्य भावः उत्पत्तिः यस्मात् तथाभूतेन सानुरागकटाक्षावलोकनेन इत्यर्थः) रञ्जयसि, [तर्हि] इदं (कार्यमेव) एतदनुरूपं (एतस्य लोचनस्य योग्यं) [स्यात्]; शिक्षिता विद्या प्रयोगेणैव साफल्यं व्रजतीति भावः] ॥४॥ पद्यानुवाद— नलिन नेत्र नीले, बने कोकनद से। हुआ कृष्ण रञ्जित, अगर बाण-स्मर से ॥ तभी सिद्ध होगा नयन-रूप सुन्दर। तभी सिद्ध होगा, वदन-रूप सुन्दर ॥ प्रिये! चारुशीले! तजो मान प्यारा। अधर पद्म-रस दे हरो ताप सारा ॥ अनुवाद—हे कृशाङ्गि ! तुम्हारे इन्दीवरके समान नेत्रोंने इस समय रक्तोपलका रूप धारण किया है। मदन-भावसे

३१२ श्रीगीतगोविन्दम् परिपूर्ण कटाक्ष बाणसे कृष्णवर्ण इस शरीरको यदि रञ्जित कर दोगी—तो अनुरूप होगा। बालबोधिनी—श्रीकृष्ण कह रहे हैं—राधे! तुम्हारी आँखें तो स्वाभाविक ही नीलकमलके समान हैं, तुम अपने नेत्रोंको नये-नये अनुराग-रंगमें रञ्जित करनेमें सुनिपुण हो। अपने इन गुणोंको उपकरण रूपमें बनाकर यदि मुझे अङ्गीकार करती हो तो मेरा जीवन चरितार्थ हो जायेगा, पर अधुना तुम्हारे नेत्रोंने सहजताका परित्याग कर रक्तकमलकी आरक्तता धारण कर ली है। यह तो तुम्हारी कोई अनुरञ्जिनी विद्या है। ऐसा स्पष्ट हो रहा है कि कृष्णवर्णकी वस्तुओंको रक्त वर्णकी बना देनेकी तुममें सामर्थ्य है, अतएव तुम यदि इन कटाक्षरूपी मदन-शरोंसे मुझे बेध दो, तब तो मैं समझूँगा कि तुमने विद्याका समुचित प्रयोग किया है। राधे, क्रोध न कर मुझसे प्रेम करो एवं काम-क्रीड़ाव्यावृप्त हो जाओ। यही तुम्हारी स्वाभाविकता है। स्फुरतु कुचकुम्भयोरुपरि मणिमञ्जरी रञ्जयतु तव-हृदयदेशम्। रसतु रसनापि तव घन-जघनमण्डले घोषयतु-मन्मथनिदेशम् ॥ प्रिये.... ॥५ ॥ अन्वय—[एतच्छ्रवणेन किञ्चित् प्रसन्नामवलोक्य आह]—प्रिये, तव कुचकुम्भयोः (स्तनकलसयोः) उपरि मणिमञ्जरी (मणिमाला) स्फुरतु (दोदुल्यमाना भवतु); तव हृदयदेशं रञ्जयतु (शोभयतु) च, [किञ्च] तव घनजघनमण्डले (घने निविड़े जघनमण्डले) रसनापि (काञ्ची अपि) रसतु (शब्दायताम्); मन्मथनिदेशं (मन्मथस्य कामस्य निदेशम् आज्ञां) घोषयतु च (प्रचारयतु) च [वचनभङ्ग्या प्रार्थनाविशेषोऽयम्] ॥५॥ पद्यानुवाद— कनक-कुम्भ पर हार, धारो न अपना, लसे आज जिससे, हृदय-देश दुगुना,

दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३१३ सघन री जघन पर रशन मंजु डोले, करें घोष किण-किण, मदन-बोल बोले। प्रिये! चारुशीले! तजो मान प्यारा, अधर पद्म-रस दे हरो ताप सारा। अनुवाद—तुम्हारे कुच-कुम्भके ऊपर मणिमय मञ्जरी देदीप्यमान होकर तुम्हारे हृदय देशको सुशोभित करें, तुम्हारे परस्पर अविरल जघन युगलके ऊपर विराजमान काञ्चि कन्दर्पके आदेशका उद्घोष करे। बालबोधिनी—वचन-भङ्गीके द्वारा श्रीकृष्ण श्रीराधासे रति-केलिकी प्रार्थना कर रहे हैं। मेरे साथ काम-केलि रूप शुभ कार्यका शुभारम्भ किया जाय, लाज छोड़, तुम रति-क्रीड़ाके लिए कटिबद्ध हो गयी हो। सुरतारम्भसे पूर्व पूर्ण-कलशोंकी प्रतिष्ठा आवश्यक है। कलशवत् विपुलाकार स्तन-कलशों पर मणि-मञ्जरी प्रकाशित हो, अर्थात् यह मणिमय हार दोलायमान होकर तुम्हारे वक्षस्थलको सुशोभित करे, विशाल मध्य भाग मांसल जांघोंको घेरे हुए तुम्हारी करधनी, केलि-क्रीड़ा करते हुए किण-किण मधुर ध्वनि निनादित करती हुई कामदेवकी उमड़ती हुई आकांक्षाओंके आदेशोंकी उद्घोषणा करे। आदेश यह है कि इस वसन्त ऋतुकी मादक बेलामें सभी विलास-प्रवण नर-नारी विलास क्रियामें व्याप्त हो जायें, मानिनी-जन मानका त्याग करके रति-क्रीड़ामें प्रवृत्त हो जायें। स्थल-कमलगञ्जनं मम हृदय-रञ्जनं जनित-रति-रङ्ग-पर भागम्। भृण मसृण वाणि करवाणि चरणद्वयं सरस-लसदलक्तकरागम् ॥ प्रिये.... ॥६॥ अन्वय—हे मसृणवाणि (स्निग्धभाषिणि) भण (कथय, आज्ञापय इत्यर्थः); स्थल-कमल-गञ्जनं (स्थलकमलानां स्थलपद्मानां गञ्जनं तिरस्कारकम्; आरक्तत्वात् कोमलत्वाच्च) मम हृदयरञ्जनं (हृदयरञ्जनं) (हृदयपरितोषकरं) जनित-रति-रङ्ग-

३१४ श्रीगीतगोविन्दम् परभागं (जनितः कृतः रतिरङ्गे सुरतोत्सवे परभागः परमशोभा येन तादृशं) तव चरणद्वयं (पादयुगलं) सरस-लसदलक्तक-रागं (सरसेन आर्द्रेण लसता दीप्तिमत्ता उज्ज्वलेन इत्यर्थः अलक्तकेन रागं लौहित्यं यत्र तादृशं सुरञ्जितमित्यर्थः) करवाणि (विदधामि) ॥६॥ पद्यानुवाद— चरण युग तुम्हारे, कमलमान गंजन। रमण-राग कारी हृदय-भाग-रंजन॥ लगा दूँ उन्हीं में, इन्हीं हाथसे सब। सजीला रसीला महावर सजनि! अब॥ प्रिये! चारुशीले! तजो मान प्यारा। अधर पद्म-रस दे तरो ताप सारा॥ अनुवाद—हे सुमधुरवचने ! स्थल-कमलको पराजित करनेवाले, मेरे हृदयकी शोभा बढ़ानेवाले तुम्हारे ये चरण-युगल रतिकालमें कामोद्रेकको अभिवर्द्धित करनेवाले हैं। तुम आदेश करो, ऐसे चरणोंको मैं अलक्तक-रस (महावर) से रञ्जित कर दूँ। बालबोधिनी—श्रीराधा अभी भी कोई उत्तर नहीं दे रही हैं। तब श्रीकृष्ण कहते हैं—हे स्निग्धवचने, अतिशय मधुर वाणी बोलने वाली! कोमल वचनोंसे ही बाण चला लेती हो, तुम अपनी कोमल काकलीसे आज्ञा करो। स्थल-कमलकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाले, मेरे हृदयको अनुरञ्जित करनेवाले इन चरण द्वयको अलता (महावर) रंगसे और रञ्जित कर दूँ, जिससे सुरतक्रीड़ाकी बेलामें ये चरण-युगल और शोभा धारण कर कामोद्रेक कर सकें। ये रंगमय होकर मेरे हृदयका राग बन जाएँ। हे प्रियभाषिणी ! ये अनुरञ्जित चरण-युगल रति-केलिरसमें एक अनिर्वचनीय सुषमाको धारण करेंगे। ये चरण श्रृंगार रसके सरस आधार हैं, शृंगार उत्पत्तिके द्वार हैं, स्पृहाकी उत्पत्ति करानेवाले हैं। चारुचरित्रे ! प्रसन्न हो, मान

दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३१५ त्याग करो। रमणीके अलक्तक रसरञ्जित मनोहर चरणयुगलको देखकर युवाओंके मनमें काम-भावनाका उद्रेक होता ही है। स्मर-गरल-खण्डनं मम शिरसि मण्डनं देहि पद-पल्लवमुदारम्। ज्वलति मयि दारुणो मदन-कदनानलो(१) हरतु तदुपाहितविकारम्॥ प्रिये चारुशीले.... ॥७॥ अन्वय—[अतस्तदङ्गीकारेणैव मे तापोपशमनमिति तद्गुण- स्फूर्तिपरवशः सन् प्रार्थयते]—[अयि प्राणेश्वरि] मम शिरसि (मदीयमस्तके) स्मरगरलखण्डनं (काम-कालकूट-दमनं) उदारं (वाञ्छितप्रदत्वात् महत्) मण्डनं (भूषणरूपं) पदपल्लवं देहि (अर्पय); दारुणः (भीषणः) मदनकदनानलः (कामसन्तापाग्निः) मयि ज्वलति; तदुपाहित-विकारं (तेन मदनतापानलेन उपाहितः उत्पादितः विकारः तम्) [ममेति शेषः] हरतु (शमयतु) [पदपल्लवधारण-मात्रेणैव तापोऽपयास्यतीति भावः] ॥७॥ पद्यानुवाद— धरो पाद-पल्लव, मदन-ताप हर्ता। इसी तप्त शिर पर हृदय शान्ति कर्ता॥ चटुल चाटु पटु हरि, भुला राधिका को। सुलावे हृदय पर, झुला साधिका को॥ प्रिये! चारुशीले! तजो मान प्यारा। अधर पद्म-रस दे हरो ताप सारा॥ अनुवाद—हे प्रिये! अपने मनोहर चरण किसलयको मेरे मस्तकपर आभूषण-स्वरूप अर्पण कराओ। जिससे मुझे जर्जरित करनेवाला यह अनङ्गरूप गरल प्रशमित हो जाय, मदन यातना रूप निदारुण जो अनल मुझे संतप्त कर रहा है, उससे वह दाहजन्य उत्पन्न विकार भी शान्त हो जाय। (१) मदनकदनारूनः इति क्वचित्; कामक्लेश एव दारुणोऽरुणः सूर्यः मयि ज्वलतीत्यर्थः।

३१६ श्रीगीतगोविन्दम् बालबोधिनी—हे राधे ! मुझे अङ्गीकार करोगी, तभी मेरा ताप दूर होगा। सर्वविजयी तुम्हारे गुणोंकी स्फूर्ति होनेसे मैं विवश होकर तुमसे प्रार्थना कर रहा हूँ कि अपने पद-पल्लवको मेरे मस्तक पर अर्पित करो। ये पद-पल्लव अति उदार हैं, ये प्रार्थीजननोंके मनोभीष्टको पूर्ण करनेवाले हैं। नव-पल्लवके समान लालिमा, कोमलता और शैत्य आदि गुणोंसे विभूषित होनेके कारण अलङ्कार-स्वरूप हैं। इन चरणोंको मेरे मस्तक पर अर्पण करनेसे कामजन्य गरलका खण्डन तो होगा ही मेरा मस्तक भी समलंकृत हो जायेगा। यहाँ काममें सर्पविषकी उत्प्रेक्षाकी गयी है। तुम्हारे पैरोंका संस्पर्श पाकर कामगरल उसी प्रकार समाप्त हो जायेगा जिस प्रकार गरुड़का चरण-स्पर्श प्राप्तकर सर्पविष समाप्त हो जाता है। कामजन्य संताप सम्बन्धसे अन्तर्मनमें उदित मनोविकार आदि दोष भी तुम्हारे चरणोंके अर्पण करनेसे समाप्त हो जायेंगे। यह कामक्लेश अति निदारुण है, अनलके समान मेरे हृदयको जला रहा है। एक-एक मर्म अंगार बन रहा है। भीतर-बाहर ज्वलनशील यह काम-ज्वर तुम्हारे पद-पल्लवके सिर पर रखनेसे ही दूर होगा। इस सम्पूर्ण प्रबन्धकी नायिका श्रीराधा प्रौढ़ा तथा मानवती है और नायक श्रीकृष्ण अनुकूल हैं। इति चटुल-चाटु-पटु-चारु मुरवैरिणो राधिकामधि वचन-जातम्। जयति पद्मावती रमण जयदेवकवि भारती भणितमतिशातम् ॥ प्रिये चारुशीले.... ॥८ ॥ अन्वय—इति (उक्तप्रकारं) पद्मावतीरमण-जयदेव-कवि- भारती-भणितं (पद्मावती श्रीराधा-परतया तथानाम्नी श्रीजयदेवपत्नी; तद्गुण-वर्णनादिना तस्याः रमणः स चासौ जयदेवकविश्चेति; तस्य भारत्या वाण्या भणितं वर्णितं) राधिकाम् अधि (राधिकां लक्ष्यीकृत्य इत्यर्थः) चटुल-चाटु-पटु-चारु (चटुलं

दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३१७ चातुर्ययुक्तं चाटु प्रीतिकरं पटु कौशलपूर्णं चारु मनोहरं; यद्वा चटुलं चञ्चलं नानाविधमितियावत्, चटुल-चाटुना पटु मानापनयनसमर्थं चारु शोभनं) अतिशातं (परमसुखप्रदमित्यर्थः) सुरवैरिणः (मुरारेः) वचनजातं (वाक्यसमूहः) जयति (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तताम्) ॥८॥ अनुवाद—पद्मावतीके प्रिय श्रीजयदेव कवि द्वारा विरचित राधिकाको सम्बोधित करके श्रीकृष्ण द्वारा उक्त चाटुयुक्त सुकुमार, मान हरणमें कुशल, मोहन माधुरीपूर्ण वचन समुदायकी जय हो। बालबोधिनी—इस प्रकार मुरवैरी श्रीकृष्णकी यह वचनावली जो श्रीराधाको अभिलषित करके सर्वोत्कृष्ट रूपसे प्रकाशित हुई है, वे सब प्रकारसे जययुक्त हों। अपनी परम प्रेयसी श्रीराधाके मान-अपमान हेतु ये वाक्य समूह अति समर्थ एवं परम सुखप्रद हैं। इस मनोहर अष्टपदीमें चतुर एवं प्रिय मीठी बातोंका ही संकलन है, पद्मावती अर्थात् श्रीराधा-श्रीकृष्णके ऊपर विजयिनी हों और विजयी हों। भारतीसे भूषित, पद्मावती-पति जयदेव, इसी अष्टपदीमें कवि जयदेवकी स्फूर्ति को श्रीकृष्णने जयदेवके वेशमें स्वयं लिपिबद्ध किया है—देहि पदपल्लवं मे उदारम्....। यह गीत गीतगोविन्दका उन्नीसवाँ प्रबन्ध है। इस प्रबन्धका नाम चतुर्भुजरागराजिचन्द्रोद्योत है। परिहर कृतातङ्के! शङ्कां त्वया सततं घन स्तनजघनया क्रान्ते स्वान्ते परानवकाशिनि। विशति वितनोरन्यो धन्यो न कोऽपि ममान्तरं प्रणयिनि! परिरम्भारम्भे विधेहि विधेयताम् ॥१॥ अन्वय—[अपरमपि कृत्यं विज्ञापयितुमाह]—अयि कृतातङ्के (कृतः आतङ्कः सन्देहः अन्यस्त्रीसम्भोगवितर्क इत्यर्थः यया तत्सम्बुद्धौ) शङ्कां परिहर (त्यज); सततं (निरन्तरं; नतु

३१८ श्रीगीतगोविन्दम्

क्षणमिति भावः) घनस्तनजघनया (घनं निविड़ं स्तनजघनं यस्याः तादृश्या) [त्वया] क्रान्ते (निरन्तरं व्याप्ते) [अतः] परानवकाशिनि (अन्यावकाश-शून्ये) स्वान्ते (मदीये मनसि) वितनोः (तनुशून्यात् कामात्) अन्यः कोऽपि धन्यः (तादृक् सौभाग्यवान्) अन्तरं (अभ्यन्तरं) न विशति [मनोद्वारेणैव एतदभ्यन्तरं प्रविश्यते; मनस्तु मे त्वया परिव्याप्तं तर्हि केन पथा प्रवेष्टव्यमन्येन शरीरिणा जनेन, कामस्तु मनोभवः अतस्तत्र तस्यैव प्रवेशेऽधिकारोऽस्तीत्यर्थः]; [शङ्कां त्यक्त्वा यत् कर्त्तव्यं तदाह]—हे प्रणयिनि परीरम्भारम्भे (परीरम्भस्य आश्लेषस्य आरम्भे उपक्रमे) विधेयतां (इतिकर्त्तव्यतां) विधेहि (व्यवस्थापय) ॥१॥ पद्यानुवाद— घन उर जघन सतत आक्रांते! स्वान्ते। मम मन सूना। तज शंका भुजमें भर जाओ, जो हुलास हिय दूना॥ अनुवाद—दूसरी नायिकाके प्रति मुझे आसक्त समझकर व्यर्थकी शंकाओंका परित्याग कर दो। परस्पर अविरल स्तन एवं जघन युगल शालिनी हे प्रणयिनी राधे! मेरे मनमें किसी दूसरी नायिकाके लिए अवकाश ही नहीं है। मदनके अतिरिक्त दूसरे किसीके प्रवेश करनेका सौभाग्य नहीं है। परिरम्भणके लिए अब मुझे आदेश दो। बालबोधिनी—अब श्रीकृष्ण श्रीराधासे कह रहे हैं—क्यों यह शंका अपने मनमें व्यर्थ ही पैदा कर ली है। अन्य वनिता-सङ्गका आरोप मुझपर मत लगाओ। मेरा तो अन्तःस्थल और हृदय तुम्हारे कुच-कलशों एवं जघनोंके भारसे इस तरह आक्रान्त है कि कहीं दूसरोंकी स्मृतिका अवकाश ही नहीं है। मेरे हृदयमें तुम्हारे प्यारने सम्पूर्ण रूपसे व्याप्त होकर आक्रमण कर लिया है, वहाँ दूसरेके लिए किञ्चिन्मात्र भी स्थान नहीं है। वहाँ कोई कैसे प्रवेश कर सकता है। तुम्हारे रहनेसे मेरे हृदयमें मदनके अतिरिक्त

दशमः सर्गः-चतुरचतुर्भुजः ३१९ अन्य किसीको प्रवेश करनेका सौभाग्य प्राप्त नहीं है। हे प्रणयिनि राधे! अब मानका परित्याग भी करो। अब तुम ऐसा करो कि मैं तुम्हारे स्तनमण्डलका आलिङ्गन कर सकूँ। अपना किंकर बनाकर मुझे तदर्थ अनुमति दो। प्रस्तुत श्लोकमें हरिणी नामक वृत्त तथा काव्यलिंग नामक अलंकार है। श्रीराधा प्रौढ़ नायिका हैं और श्रीकृष्ण प्रगल्भ नायक हैं। मुग्धे विधेहि मयि निर्दय-दन्तदंश दोर्वल्लि-बन्ध-निबिडस्तन-पीडनानि । चण्डि ! त्वमेव मुदमुञ्च न पञ्चबाण- चाण्डाल-काण्ड-दलनादसवः प्रयान्तु ॥२॥ अन्वय-[यदि मद्रचनात् न प्रत्येषि तर्हि स्वयमेव दण्डमाचरेत्याह]-अयि मुग्धे, मयि निर्दय-दन्तदंशः-दोर्वल्लि- बन्ध-निविड़-स्तनपीड़नानि (निर्दयं, निष्ठुरं यथा तथा दन्तदंशः दशनाघातः तथा दोर्वल्लिबन्धः भुजलताबन्धनं तथा निविड़ाभ्यां स्तनाभ्यां पीड़नञ्च तानि) विधेहि (घटय)। अयि चण्डि (कोपने) त्वमेव मूदम् (सुखं) अञ्च (प्राप्नुहि) [तव सुखोत्पादनाय ईदृग्विधेन दण्डेन यदि मे प्राणा यान्ति, यान्तु, परं] पञ्चबाण-चाण्डाल-काण्ड-दलनात् (पञ्चबाण एव चाण्डालः दुष्टचेष्टत्वादिति भावः तस्य काण्डदलनात् बाणप्रहारात्) मम असवः (प्राणाः) न प्रयान्तु (गच्छन्तु) ॥२॥ पद्यानुवाद- पञ्चबाण-चाण्डाल बाणसे, प्राण न जायें मेरे। निज अपराधीको रदसे, अब छेदो तुम्हीं सबेरे॥ और बाँध लो बाहुलताके, बन्धनमें अति मुझको। दृढ़ कुच-पीड़ा दे हँस बोलो, बन्दी मुक्ति न तुझको ॥ अनुवाद-हे विमुग्धे! यदि मैं अपराधी हूँ तो मुझे दण्ड देने में विलम्ब क्यों कर रही हो? दण्ड दो-अपने दाँतोके