गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमः सर्गः-चतुरचतुर्भुजः ३१९ अन्य किसीको प्रवेश करनेका सौभाग्य प्राप्त नहीं है। हे प्रणयिनि राधे! अब मानका परित्याग भी करो। अब तुम ऐसा करो कि मैं तुम्हारे स्तनमण्डलका आलिङ्गन कर सकूँ। अपना किंकर बनाकर मुझे तदर्थ अनुमति दो। प्रस्तुत श्लोकमें हरिणी नामक वृत्त तथा काव्यलिंग नामक अलंकार है। श्रीराधा प्रौढ़ नायिका हैं और श्रीकृष्ण प्रगल्भ नायक हैं। मुग्धे विधेहि मयि निर्दय-दन्तदंश दोर्वल्लि-बन्ध-निबिडस्तन-पीडनानि । चण्डि ! त्वमेव मुदमुञ्च न पञ्चबाण- चाण्डाल-काण्ड-दलनादसवः प्रयान्तु ॥२॥ अन्वय-[यदि मद्रचनात् न प्रत्येषि तर्हि स्वयमेव दण्डमाचरेत्याह]-अयि मुग्धे, मयि निर्दय-दन्तदंशः-दोर्वल्लि- बन्ध-निविड़-स्तनपीड़नानि (निर्दयं, निष्ठुरं यथा तथा दन्तदंशः दशनाघातः तथा दोर्वल्लिबन्धः भुजलताबन्धनं तथा निविड़ाभ्यां स्तनाभ्यां पीड़नञ्च तानि) विधेहि (घटय)। अयि चण्डि (कोपने) त्वमेव मूदम् (सुखं) अञ्च (प्राप्नुहि) [तव सुखोत्पादनाय ईदृग्विधेन दण्डेन यदि मे प्राणा यान्ति, यान्तु, परं] पञ्चबाण-चाण्डाल-काण्ड-दलनात् (पञ्चबाण एव चाण्डालः दुष्टचेष्टत्वादिति भावः तस्य काण्डदलनात् बाणप्रहारात्) मम असवः (प्राणाः) न प्रयान्तु (गच्छन्तु) ॥२॥ पद्यानुवाद- पञ्चबाण-चाण्डाल बाणसे, प्राण न जायें मेरे। निज अपराधीको रदसे, अब छेदो तुम्हीं सबेरे॥ और बाँध लो बाहुलताके, बन्धनमें अति मुझको। दृढ़ कुच-पीड़ा दे हँस बोलो, बन्दी मुक्ति न तुझको ॥ अनुवाद-हे विमुग्धे! यदि मैं अपराधी हूँ तो मुझे दण्ड देने में विलम्ब क्यों कर रही हो? दण्ड दो-अपने दाँतोके