गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
दशमः सर्गः-चतुरचतुर्भुजः ३१९ अन्य किसीको प्रवेश करनेका सौभाग्य प्राप्त नहीं है। हे प्रणयिनि राधे! अब मानका परित्याग भी करो। अब तुम ऐसा करो कि मैं तुम्हारे स्तनमण्डलका आलिङ्गन कर सकूँ। अपना किंकर बनाकर मुझे तदर्थ अनुमति दो। प्रस्तुत श्लोकमें हरिणी नामक वृत्त तथा काव्यलिंग नामक अलंकार है। श्रीराधा प्रौढ़ नायिका हैं और श्रीकृष्ण प्रगल्भ नायक हैं। मुग्धे विधेहि मयि निर्दय-दन्तदंश दोर्वल्लि-बन्ध-निबिडस्तन-पीडनानि । चण्डि ! त्वमेव मुदमुञ्च न पञ्चबाण- चाण्डाल-काण्ड-दलनादसवः प्रयान्तु ॥२॥ अन्वय-[यदि मद्रचनात् न प्रत्येषि तर्हि स्वयमेव दण्डमाचरेत्याह]-अयि मुग्धे, मयि निर्दय-दन्तदंशः-दोर्वल्लि- बन्ध-निविड़-स्तनपीड़नानि (निर्दयं, निष्ठुरं यथा तथा दन्तदंशः दशनाघातः तथा दोर्वल्लिबन्धः भुजलताबन्धनं तथा निविड़ाभ्यां स्तनाभ्यां पीड़नञ्च तानि) विधेहि (घटय)। अयि चण्डि (कोपने) त्वमेव मूदम् (सुखं) अञ्च (प्राप्नुहि) [तव सुखोत्पादनाय ईदृग्विधेन दण्डेन यदि मे प्राणा यान्ति, यान्तु, परं] पञ्चबाण-चाण्डाल-काण्ड-दलनात् (पञ्चबाण एव चाण्डालः दुष्टचेष्टत्वादिति भावः तस्य काण्डदलनात् बाणप्रहारात्) मम असवः (प्राणाः) न प्रयान्तु (गच्छन्तु) ॥२॥ पद्यानुवाद- पञ्चबाण-चाण्डाल बाणसे, प्राण न जायें मेरे। निज अपराधीको रदसे, अब छेदो तुम्हीं सबेरे॥ और बाँध लो बाहुलताके, बन्धनमें अति मुझको। दृढ़ कुच-पीड़ा दे हँस बोलो, बन्दी मुक्ति न तुझको ॥ अनुवाद-हे विमुग्धे! यदि मैं अपराधी हूँ तो मुझे दण्ड देने में विलम्ब क्यों कर रही हो? दण्ड दो-अपने दाँतोके
३२० श्रीगीतगोविन्दम् दंशनसे निर्दय होकर आघात करो, भुज-लता द्वारा प्रगाढ़ रूपसे मुझे बाँध लो। कठिन स्तनोंसे प्रबल उत्पीड़न करो। हे कोपमयि! मुझको इस प्रकार कठोर दण्ड देकर तुम्हीं सुखी होओ। ऐसे कठोर दण्डसे यदि मेरे प्राण निकल जायें तो भले निकल जायें, परन्तु मदनरूप चाण्डालके बाण प्रहारसे मेरे प्राण न जायें॥२॥ बालबोधिनी— श्रीकृष्ण श्रीराधासे कहते हैं- हे मुग्धे ! यदि तुम्हें मेरे वचनोंपर विश्वास नहीं है, तो मुझे दण्ड दे सकती हो। क्रोधके आवेशमें तुम मुझे समझनेका प्रयास ही नहीं कर रही हो। अतः तुम यथेच्छ रूपसे मुझपर शासन करो। कन्दर्प-चाण्डाल अपने पञ्चबाणोंसे मुझे मारनेकी चेष्टा कर रहा है, पर इतनी कृपा करना कि मेरे प्राण न चले जायें। हे आत्महितानभिज्ञे ! चण्डित्वका परित्याग करो। तुम्हारे ही सम्बन्धसे इस चाण्डाल कामदेवके बाणोंसे विदीर्ण हो मेरे प्राण निकले जा रहे हैं। इससे मेरी रक्षा करो। मुझे दण्ड देकर तुम सुखी हो जाओ, निर्दयतासे दांतों द्वारा काट डालो, निविड़ स्तनोंसे मुझे पीस डालो, भुजलताओँसे कसकर बाँध लो। मुझसे हँसकर कह दो- अब तुम मेरे बन्दी हो, मेरे बन्धनसे अब कभी भी तुम मुक्त न हो सकोगे। शशिमुखि ! तव भाति भङ्गुर भ्रू, र्युवजनमोह-कराल कालसर्पी। तदुदित-भय-भञ्जनाय यूनां त्वदधर-सीधु-सुधैव सिद्धमंत्रः ॥३॥ अन्वय—[मम कोपो नास्त्येव चेत् तत्राह] — अयि शशिमुखि (चन्द्रानने), तव भङ्गुरभ्रूः (भङ्गुरा कुटिला भ्रूः) [यदि कोपिना नासि तत् कुतस्ते भ्रुवोर्भङ्गुरत्वम्?], युवजन-मोह-कराल- कालसर्पी (युवजनानां तरुणानाम् अस्माकं मोहाय मूर्च्छाविधानाय
दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३२१ कराला भीषणा कालसर्पा भाति विराजते), तदुदित-भय-भञ्जनाय तस्याः भ्रुवः उदितस्य भयस्य भञ्जनाय नाशाय) यूनां [अस्माकं] त्वदधर-सीधु-सुधैव (तव अधर-मधुरूपा सुधा एव; मादकत्वात् सीधु इति मधुरत्वाच्च सुधेत्युक्तम्) सिद्धमन्त्रः [नान्यत् किञ्चिदित्यर्थः] [अमृतपानेनैव विषभयं निवर्तते इति भावः] ॥३॥ पद्यानुवाद— बंकिम भौंहें नागिनि तेरी डस लेती जब जन को। अधर सुधा ही विष हरता है, विरुज बनाता तन को॥ अनुवाद—हे शशिमुखि ! तुम्हारी कुटिल भ्रूलता युवजन विह्वलकारी कराल कालजयी सर्पिणीके समान है। इससे उत्पन्न भयको भञ्जन हेतु तुम्हारे अधरसे विगलित मदिरा सुधा ही एकमात्र सिद्धमन्त्र स्वरूप है। बालबोधिनी—श्रीकृष्ण वात्स्यायन-न्यायका आश्रय लेकर कहते हैं—हे चन्द्रमुखि ! तुम्हारा मुखमण्डल तो चन्द्रमा सरीखा है, परन्तु तुम्हारे मुखपर विद्यमान भौंहें अति कुटिल हैं, जो मेरे जैसे युवजनोंके लिए महाभयंकर काल सर्पिणीके समान मोहित करनेवाली, अत्यन्त भयका उत्पादन कर रही हैं, अरे जो हिंस्रमुखी होती हैं, परन्तु तुम तो चन्द्रमुखी हो। तरुणोंके प्रति कोप प्रकाशित मत करो। इस काल नागिनीके काटनेपर कोई युवक बच नहीं सकता, न ही कोई ऐसी औषध है, जिससे गरलकी ज्वाला शान्त हो जाय। हाँ, तुम्हारी अधर-सुधा ही तुम्हारी भ्रू-रूपिणी सर्पिणीके डँसनेसे उत्पन्न विषको शान्त करनेके लिए सिद्धमन्त्र स्वरूप है। प्रस्तुत श्लोकमें पुष्पिताग्रा छंद है। कल्पितोपमा एवं रूपक अलंकार है।
३२२ श्रीगीतगोविन्दम् व्यथयति वृथा मौनं तन्वि! प्रपञ्चय पञ्चमं, तरुणि मधुरालापैस्तापं विनोदय दृष्टिभिः। सुमुखि! विमुखी भावं तावद्विमुञ्च न मुञ्च मां स्वयमतिशयस्निग्धो मुग्धे। प्रियोऽयमुपस्थितः ॥४ ॥ अन्वय—[एवमुक्तेऽपि अनुत्तरामाह]—अयि तन्वि (कृशाङ्गि! मामप्राप्य त्वमपि कृशासीति भावः), [यस्मात् तव] वृथा (अकारणं) मौनं (तूष्णीम्भावः) मां व्यथयति (सन्तापयति) [तस्मात्] पञ्चमं (स्वरं) प्रपञ्चय (विस्तारय); [मधुरमालप इति भावः]। हे तरुणि (किशोरि) मधुरालापैः (मधुरैः आलापैः भाषितैः) तापं (मन्मथसन्तापं) विनोदय (प्रशमय)। हे सुमुखि (सुवदने), दृष्टिभिः (कृपास्निग्धावलोकनैः) विमुखीभावं (वैमुख्यं प्रत्याख्यानकार्कश्यमिति यावत्) विमुञ्च (त्यज) मां न मुञ्च (मा त्याक्षीः) [सुमुख्यास्ते विमुखीभावो न युक्त इत्यर्थः]। [कथमेवं करोमीत्याह]—हे मुग्धे (विचारमूढे) प्रियः अयम् अतिशयस्निग्धः (अतिप्रेमवान्), [कथं स्निग्धज्ञानम् अत आह]—स्वयम् [अनाहूत एव] उपस्थितः (आगतः), [अतस्त्यागे मूढ़ता एवेत्यर्थः] ॥४॥ पद्यानुवाद— तन्वि! मौन हो मार रही क्यों? पंचम स्वरमें बोलो। तरल दीठसे देख हृदयके, सारे बन्धन खोलो॥ विमुख भाव यह सुमुखि! तुम्हारा अनुचित आज बड़ा है। स्वयं स्निग्ध अतिशय तव प्रिय, यह मुग्धे! सजल खड़ा है॥ अनुवाद—हे कृशाङ्गि! तुम्हारा यह व्यर्थ मौन-अवलम्बन मुझे व्यथित कर रहा है। हे तरुणि! पञ्चम स्वरका विस्तार करो। मधुर आलापों तथा कृपा अवलोकनके द्वारा मेरे संतापका विमोचन करो। हे सुमुखि! अपनी विमुखताके भावका परित्याग करो, मेरा त्याग नहीं। हे अविचारकारिणि! तुमसे अतिशय स्नेह करनेवाला तुम्हारा प्रिय यहाँ उपस्थित है।
दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३२३ बालबोधिनी—श्रीराधाने अब भी कोई उत्तर न दिया, तब श्रीकृष्ण अत्यन्त अनुनय भरे वचनोंसे उनसे कहने लगे—हे तन्वि ! कितनी कृशताको प्राप्त हो गयी हो ? तुम्हारी चुप्पी तुम्हें व्यर्थ ही अन्दर ही अन्दर कुतर रही है, मुझे इतना कष्ट दे रही है, पञ्चम राग छेड़ो, कोमलता धारण करो। इस वसन्त ऋतुमें तो कामिनियाँ अपने प्रियतमोंका अनुकरण किया करती हैं, तुम तो कोयलसे भी अधिक मधुर संलापिनी हो, मधुर आलाप करो, अपनी दृष्टिसे रस-वृष्टि करो। हे तरुणि ! कृपा-अवलोकन द्वारा मेरा संताप दूर करो। हे सुमुखि ! तुम्हारे लिए मेरे प्रति वैमुख्य उचित नहीं है। उदासीनताका अपरिग्रह करो, दम्भ छोड़ दो, मेरा परित्याग मत करो। हे मुग्धे ! हे विचाररहिते ! मैं तुम्हारा प्रिय हूँ। अतिशय स्निग्ध स्नेहपरायण हूँ। अनाहूत ही यहाँ उपस्थित हुआ हूँ। यह देखो साश्रु होकर खड़ा हूँ। अपनी स्नेह दृष्टिसे मुझे बाँध लो। प्रस्तुत श्लोकमें हरिणी वृत्त, यथासंरत्न अलङ्कार, अनुकूल नायक, प्रसाद गुण, कैशिकी वृत्ति, वैदर्भी रीति तथा मागधी गीति है। बन्धूकद्युति-बान्धवोऽयमधरः स्निग्धो मधूकच्छवि - चकास्ति नील-नलिन श्रीमोचने लोचनम्। गण्डश्चण्डि ! नासाभ्येति तिल-प्रसून-पदवीं कुन्दाभदन्ति ! प्रिये ! प्रायस्त्वन्मुख-सेवया विजयते विश्वं स पुष्पायुधः ॥५॥ अन्वय—[अतः पञ्चपुष्पाञ्चितमास्यं ते पुष्पायुधविलासेन मां दुनोतीति भङ्ग्यास्तदङ्गानि स्तौति]—अयि चण्डि (कोपने) अयि प्रिये, अयं स्निग्धः (लावण्यमयः) तव अधरः बन्धुकद्युतिवान्धवः (बन्धुकस्य पुष्पविशेषस्य बाँधुलि फुल इति भाषा या द्युतिः कान्तिः तस्या वान्धवः बन्धुककुसुम
३२४ श्रीगीतगोविन्दम्
सदृश इत्यर्थः, लोहितत्वात् साम्यम्) गण्डे (कपोले) मधुच्छविः (मधुकपुष्पस्य महुयाफुल इति भाषा छविर्दीप्तिः) चकास्ति [पाण्डुत्वात् अत्रापि साम्यम्] [तथा] नील-नलिन-श्रीमोचने (नीलनलिनयोः नीलोत्पलयोः श्रीमोचने शोभा-तिरस्कारके) लोचने [चकास्तः] [कार्ष्ण्यादत्र साम्यम्] अयि कुन्दाभ-दन्ति (कुन्दकुसुमदशने)। अत्रापि शौक्लात् साम्यम्] [तव] नासा (नासिका) तिलप्रसूनपदवीं (तिलप्रसूनस्य तिलपुष्पस्य पदवीं) अभ्येति (तिल-कुसुम-सदृशी भातीत्यर्थः) [अत्र आकृत्या साम्यम्]; [अतएव] सः (प्रसिद्धः) पुष्पायुध (कामः) प्रायः (बाहुल्येन) त्वन्मुखसेवया (तव मुखाराधनेन) [त्वन्मुखस्थितानि एतानि कुसुमानि लब्ध्वा तैरेवायुधैः] विश्वं विजयते (अभिभवति) ॥५॥ पद्यानुवाद— अधर सुमन बन्धूक सरस सम, कल कपोल रस भीने। फूल मधूक बन्धुसे दर्शित, नेत्र नलिन-छवि लीने॥ तिल-प्रसून-पदवी सी नासा दन्त कुन्द सम भासे। मुख आश्रित पुष्पायुध तेरे, जग विजयी हो हासे॥ अनुवाद—हे प्रिये! चण्डि! तुम्हारा अधर बन्धूक- पुष्पकी भाँति मनोहर अरुण वर्णके हैं, तुम्हारे सुशीतल कपोल मधूक पुष्पकी छविको धारण किये हुए हैं, तुम्हारे लोचन इन्दीवरकी शोभाको तिरस्कृत कर रहे हैं, तुम्हारी नासिका तिलके फूलके समान है, तुम्हारे दशन कुन्द पुष्पकी भाँति शुभ्रवर्णीय हैं। हे प्रिये! पुष्पायुधने अपने पाँच पुष्प रूपी बाणोंके द्वारा तुम्हारे मुखकी सेवा करके सारे संसारको जीत लिया है। बालबोधिनी—हे प्रिये! तुम्हारे मुखकमल पर पुष्पधन्वा कामदेवके समान पञ्च आयुध विलसित हो रहे हैं—हे चण्डि! यह सुविख्यात विश्व विजेता कामदेव तुम्हारे इन पुष्प आयुधोंको लेकर ही समस्त विश्वको विजय कर रहा
दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३२५ है। विश्व-विजय करनेके बाद ये आयुध तुम्हारे मुखमण्डल पर शोभा प्राप्त कर रहे हैं। 'चण्डि'—इस संबुद्धि पदसे तात्पर्य है कि अब तक क्रोधका परित्याग नहीं किया है। चण्डि अर्थात् कोपने! पञ्चबाणोंका सवैशिष्ट्य वर्णन इस प्रकार है— (१) तुम्हारे अधर बन्धूक अर्थात् दुपहरियाके फूलके समान लाल वर्णके हैं। ये कामदेवके रक्तवर्णके आकर्षण बाण हैं। (२) तुम्हारे सुशीतल कपोल मधूक अर्थात् महुयेके समान सरस सुनहली पाण्डुवर्ण कान्तिमय हैं। मानो अभी-अभी उसमेंसे रस चू पड़ेगा। ये कामदेवके पीतवर्णके वशीकरण बाण हैं। (३) तुम्हारी नीली आँखें समस्त सौन्दर्यका सार अपने साथ ही सन्निहित किये हुए हैं। इन्होंने नील कमलोंकी सुन्दरताका तिरस्कार कर दिया है। ये कामदेव के कृष्ण-वर्णीय उन्मादन बाण हैं। (४) तुम्हारी नासिका तिलके फूलके सदृश है। ये कामदेवके पीतवर्णीय द्रावण बाण हैं। (५) तुम्हारे दाँत कुन्द पुष्पके समान हैं। ये कामदेवके श्वेतवर्णीय शोषण बाण हैं। इस प्रकार अपने सम्पूर्ण पञ्च आयुधोंद्वारा कामदेव तुम्हारे मुखकी सेवाके प्रसादसे विश्व विजय कर रहा है। प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूलविक्रीड़ित छन्द एवं उत्प्रेक्षा अलंकार है। दृशौ तव मदालसे वदनमिन्दु-सन्दीपनं गतिर्जन-मनोरमा विजितरम्भमूरुद्वयम्। रतिस्तव कलावती रुचिरचित्रलेखे भ्रुवा- वहो विबुध-यौवतं वहसि तन्वि! पृथ्वीगता ॥६॥
३२६ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय-अयि तन्वि (कृशाङ्गि), तव दृशौ (नयने) मदालसे (मदजन्यहर्षेण अलसे मन्थरे) [स्वर्गे तु एकैव मदालसानाम्नी अङ्गना; ममाङ्गना त्वं तु दृग्रूपे द्वे मदालसे धारयसि]; वदनम् इन्दुसन्दीपनं (इन्दुः चन्द्रः तस्य सन्दीपनं शोभावृद्धिकरं चन्द्रादपि समधिक-शोभासम्पन्नमित्यर्थः) [स्वर्गेऽपि इन्दुसन्दीपनी-नाम्नी काचिदस्ति]; (तव) गतिः (गमनं) जनमनोरमा (जनस्य मम मनोहारिणी) [स्वर्गेऽपि जनमनोरमा इति काचित्] ऊरुद्वयं (जघन-युगलं) विजितरम्भम् (विजिता तिरस्कृता रम्भा कदली येन तत् कदल्या अपि समधिकशोभामयम्) [स्वर्गेऽपि रम्भानाम्नी काचित्]; तव रतिः (सुरतविहारः) कलावती (सुकौशलवती) [स्वर्गेऽपि कलावतीनाम्नी काचित् विद्यते]; भ्रुवौ च रुचिरचित्रलेखे (रुचिरा मनोज्ञा चित्रा चमत्कारिणी लेखा ययोस्तादृशौ) [स्वर्गेतु एका एव चित्र-लेखा]; अहो त्वं [क्षीणापि] पृथ्वीगता (भूतलस्था) [अपि] विबुध-यौवतं (देवयुवतीसमूहम्) वहसि (धारयसि) ॥६॥ पद्यानुवाद- अवनी-अप्सरी! अलस नेत्रमयि! वदन इन्दु तव शोभे। गति मनहर, रति पटु, रम्भा-उरु, चित्रलिखित भौं लोभे ॥ अनुवाद-हे तन्वि ! आश्चर्य है, धरणि तलमें अवस्थिता होकर भी तुम स्वर्गस्था विद्याधरियोंके समान प्रतीत हो रही हो, तुम्हारे नयन सिन्धु मदालसाके मदसे अलस हो रहे हैं। तुम्हारा वदन विबुध-रमणी इन्दु सन्दीपनीके समान है। तुम्हारा गमन देववनिता मनोरमाके समान मनोहर है, तुम्हारे उरुद्वयने सुरयोषिता रम्भाको भी पराजित कर दिया है। तुम्हारा रति-कौशल स्वर्गस्था कलावतीके समान विविध कौशलयुक्ता है और तुम्हारे भ्रूयुगल चित्रलेखाके समान मनोहारी एवं विचित्र हैं। बालबोधिनी-हे तन्वि राधिके ! यद्यपि तुम इस पृथ्वी पर अवस्थित हो, फिर भी ऐसा लगता है जैसा समस्त
दशमः सर्गः - चतुरचतुर्भुजः ३२७ देवस्त्रियोंका समूह तुम्हारे भीतर निवास कर रहा है। तुम्हारी आँखें सौभाग्यमदसे अलसायी हुई हैं कि अब तो प्रिय तुम्हारे चरणोंमें हैं। इस प्रकार मदजनित हर्षके कारण मेरी अङ्गना होकर भी तुमने स्वर्गकी अप्सरा मदालसाको अपने नेत्रोंमें धारण किया है। तुम्हारा मुखमण्डल विबुधरमणी इन्दुमतीका आवास है, जहाँ चन्द्रमासे भी अधिक आवश्यकता है। तुम्हें देखकर चन्द्रमाके मनमें ईर्ष्या उत्पन्न होती है, क्योंकि उसमें इतनी शक्ति कहाँ है ? तुम्हारी गति जन-जनके मनको आह्लादित करनेवाली है। अतएव तुममें मनोरमा नामक अप्सराका निवास है। तुम्हारी जाँघ कदली वृक्षको भी अनादृत कर रही है, जहाँ मानों रम्भाका निवास है। तुम्हारी गति हाव, भाव, विलास किलकिञ्चित् आदि कलाओंसे युक्त है। अतएव तुममें कलावती नामक अप्सराका निवास है। तुम्हारे भ्रूयुगल मनोहर चित्ररचनाके समान हैं। वहाँ लगता है कि तुम पृथ्वी पर रहती हुई भी इस पृथ्वी छन्दमें उतरकर देवताओंके यौवनका वितान बनी हुई हो, तुम्हारा यौवन दिव्य हो। प्रस्तुत श्लोकमें पृथ्वी छन्द तथा कल्पितोपमालंकार है। प्रीतिं वस्तनुतां हरिः कुवलयापीडेन सार्धं रणे राधा-पीन-पयोधर-स्मरण कृत्कुम्भेन सम्भेदवान्। यत्र स्विद्यति मीलति क्षण क्षिप्ते द्विपे तत्क्षणात् कंसस्यालमभूत् जितं जितमिति व्यामोह-कोलाहलः ॥७ ॥ इति एकोनविंशः सन्दर्भः। इति श्रीगीतगोविन्दे महाकाव्ये मानिनी वर्णने मुग्ध माधवो नाम दशमः सर्गः। अन्वय- [एवं स्वप्रिया-गुण कीर्त्तनावेशान्महासङ्कट-स्थानानुभूत- तत्स्पर्श-सुख-स्मरण-परवशं श्रीकृष्णं वर्णयन् भक्तानाशास्ते]- [यः
३२८ श्रीगीतगोविन्दम् हरिः] राधा-पीन-पयोधर-स्मरणकृत्-कुम्भेन (राधायाः पीनयोः पयोधरयोः स्मरणकृते) सादृश्येन संस्कारोद्-बोधकतया स्मारकौ कुम्भौ यस्य तादृशेन) कुवलयापीडेन (तदाख्येन कंसहस्तिना) सार्द्धं (सह) रणे (युद्धे) सम्भेदवान् (आसङ्गवान्) [कुवलयापीडस्य कुम्भस्पर्शेन राधास्तनस्पर्श-स्मृतिवशात् सात्त्विक-भाववान् सन् इति भावः] [तथा च] यत्र (सम्भेदे) [तत्स्पर्शसुखेन सात्त्विकोदयात्] क्षणं (क्षणं व्याप्य) [कृष्णे] स्विद्यति (कान्ताकुचयुगस्मरणात् सात्त्विकभावोदयेन स्वेदं मुञ्चति सति) [तथा] मीलति (आवेशभरात् नेत्रे संकोचयति सति) [कंसस्य कंसपक्षीय- जनसमूहस्य अस्माभिः जितं जितमिति व्यामोह-कोलाहलः अलमभूत्] अथ [तेन श्रीकृष्णेन] तत्क्षणात् द्विपे (हस्तिनि कुवलयापीडे) क्षिप्ते (हत्वा दूरं प्रक्षिप्ते सति) कंसस्य (कंसपक्षीयस्य जनसमूहस्य) [अनेन] जितं जितमिति व्यामोह- कोलाहलः (व्यामोहेन शोकज-पीडया यः कोलाहलः कलरवः) अलमभूत् (प्रादुरासीत्) सः (तद्विधः) हरिः वः (युष्माकं) प्रीतिं (आनन्दं) अनुताम् (विस्तारयतु); [पूर्वत्र व्यामोहः आनन्देन, उत्तरत्र तु शोकेनेति ज्ञेयम्]। [अतएव सर्गोऽयं श्रीराधास्मरण-विकार-वर्णने मुग्धो मनोहरु माधवो यत्र स इति दशमः] ॥७॥ अनुवाद—वे भगवान् श्रीहरि सम्पूर्ण जगतका आनन्द वर्द्धन करें; जिन्हें कुवलयापीड़ हाथीके उत्तुंग कुम्भको देखकर श्रीराधाके पीन पयोधरोंका स्मरण हो आया, जो युद्धकालमें उसके स्पर्श मात्रसे अनङ्ग रसावेशके कारण स्वेदपूर्ण हो पड़ा, पुनः जिनके नयन युगल निमीलित हो गये, जिसे कंसपक्षीय जीत गये, जीत गये (हम जीत गये) और अन्ततः उसको मार देनेपर कृष्णपक्ष जीत गये, जीत गये इस प्रकारका व्यामोहयुक्त आनन्दसूचक महाकोलाहल हुआ था।
दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३२९ बालबोधिनी—इस प्रकार अपनी प्रियाके गुण-कीर्तनके आवेशमें अत्यन्त संकटपूर्ण स्थितिमें श्रीराधाजीके स्पर्श- सुखानुभूतिका स्मरण श्रीकृष्णके द्वारा होने पर कवि जयदेव सभीको आशीर्वाद प्रदान कर रहे हैं कि श्रीहरि आपलोगोंका प्रीति-वर्द्धन करें। जब भगवान् श्रीकृष्णका कंसके हाथी कुवलयापीड़के साथ युद्ध हुआ, तब उस युद्ध-स्थलमें उस हाथीके कुम्भस्थलको देखकर उन्हें श्रीराधाजीके पीन पयोधरोंका स्मरण हो आया। उस हाथीके स्पर्शसे उन्हें श्रीराधाजीके स्पर्शानुभूति जन्य सात्त्विक भावका उदय हुआ। उस शृङ्गारिक आनन्दमें विह्वल हो जानेसे अर्थात् श्रीराधाजीके मिलन-जन्य आनन्दके स्मरणसे उन्होंने अपने नेत्र बन्द कर लिये। तब कंसके सभासदोंको यह समझकर आनन्द हुआ कि हमारी जीत हो गयी है, श्रीकृष्णने भयभीत होकर अपनी आँखें बन्द कर ली हैं। पर जैसे ही श्रीकृष्णने व्यामोह वाक्योंकी उच्च ध्वनिका श्रवण किया, तब अतिशीघ्र स्वयंको संभाल लिया और क्षणभरमें ही उस हाथीको पछाड़कर मार गिराया। तब उसी शत्रु पक्षमें उन्हीं सभासदोंके मुखसे अचानक यह ध्वनि निकल पड़ी—श्रीकृष्ण जीत गये, जीत गये। यह ध्वनि आनन्ददायक कोलाहल बन गई। इस प्रकार यह सर्ग श्रीराधाके स्मरण-जनित विकारके वर्णनसे युक्त है। इस विकार भाव द्वारा माधव अत्यन्त मनोहर वेश धारण किये हुए हैं। इति दशम सर्ग।
एकादशः सर्गः सामोद-दामोदरः सुचिर मनुनयेन प्रीणयित्वा मृगाक्षीं गतवति कृतवेशे केशवे कुञ्जशय्याम्। रचित-रुचिर-भूषां दृष्टि मोषे प्रदोषे स्फुरति निरवसादां कापि राधां जगाद ॥१॥ अन्वय-[एवं प्रियां प्रसाद्य कुञ्जशय्यां गतवति श्रीकृष्णे]- कापि (सखी) दृष्टिमोषे (दृष्टिं मुञ्चाति तमसावृणोति तथोक्ते दर्शनचौरे इत्यर्थः) प्रदोषे (सन्ध्यायां) स्फुरति (प्रकाशमाने सति) सुचिरं (दीर्घकालं व्याप्य) अनुनयेन मृगाक्षीं (श्रीराधां) प्रीणयित्वा (सन्तोष्य) कृतवेशे (परिहित-शृङ्गारोचित-वेशे) केशवे (कृष्णे) कुञ्जशय्यां गतवति [सति] निरवसादां (अनुनयादिना अवसादरहितां स्फूर्त्तिमतीमित्यर्थः) [अतएव] रचित-रुचिर-भूषां (रचिता रुचिरा प्रियमनोहारिणी भूषा यया तां) राधां जगाद (वभाषे) ॥१॥ अनुवाद-मृगनयना श्रीराधाको चिरकाल तक अनुनय- विनयसे प्रसन्न करके श्रीकृष्ण चले आये और मोहनवेश धारणकर निकुञ्ज-मन्दिर स्थित शय्या पर अवस्थित हो उनकी प्रतीक्षा करने लगे, इधर दृष्टि-आच्छादनकारिणी सन्ध्या उपस्थित हुई तब विविध मनोहर अलङ्कार विभूषिता श्रीराधासे कोई सखी इस प्रकार कहने लगी- पद्यानुवाद- चिर अनुनयसे हो अनुकूल धरकर सुन्दर वेश, जानेको उद्यत है जो अब कुंज शयन हरि देश। खेदरहित आतुर राधासे दृगहर संध्या काले सखी एक हँस बोल उठी-हे मृगनयनी! ब्रजवाले॥
एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३३१ बालबोधिनी—इस प्रकार श्रीकृष्ण श्रीराधाका बहुत देर तक मनुहार करते रहे, अन्ततः श्रीराधा प्रसन्न हो गयीं और श्रीकृष्ण समाश्वस्त होकर निकुञ्ज गृहमें केलि-शय्याकी रचना करने चले गये। मृगनयनी श्रीराधा उल्लसित हो गयीं। सारा खेद विषाद अपगत हो गया, हिरणी जैसी आँखोंमें भावोंका उद्वेलन होने लगा। उनमें हर्ष समा गया। भीतर ही भीतर उमगने लगीं। अभिसरणके योग्य वेशभूषा नील निचोल (नीले वसन) को पहनने लगीं, जिसे कोई और न देख सके, उनसे मिलन योग्य मनोहर आभूषणोंको स्वयं ही पहनने लगीं। इस आभरणोंको भी कोई देख न सकेगा। तभी कोई सखी श्रीराधासे अनुरोधपूर्वक श्रीकृष्णसे मिलनेके लिए प्रोत्साहित करते हुए कहने लगी—राधे, अब तो तुम्हें विश्वास हो गया न, मधुसूदन तुम्हारे अनुगत हैं। प्रदोषका अर्थ है—रात्रिकाल स्फुरित हो रहा है, इस समय दृष्टिमें कुछ स्पष्ट नहीं होता। प्रस्तुत श्लोकमें मालिनी छन्द है। अथ विंश सन्दर्भः गीतम् ॥२०॥ वसन्तरागयतितालाभ्यां गीयते। अनुवाद—श्रीगीतगोविन्द काव्यका यह बीसवाँ प्रबन्ध वसन्त राग तथा यति तालमें गाया जाता है। विरचित-चाटु-वचन-रचनं चरणे रचित-प्रणिपातम्। सम्प्रति मञ्जुल-वञ्जुल-सीमनि केलि-शयनमनुयातम् ॥ मुग्धे ! मधु-मथनमनुगतमनुसर राधिके ! ॥१॥ ध्रुवम् अन्वय—अयि मुग्धे (विचारमूढ़े) राधिके सम्प्रति (अधुना) विरचित-चाटु-वचन-रचनं (विरचिता भङ्ग्या प्रतिपादिता चाटुवचनानां रचना येन तं) [चाटुवचनमात्रेण कथं ज्ञेयानुगतिः ?
“चल सखि! चल घनश्याम सदनमें।”
एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३३३ तत्राह] चरण-रचित-प्रणिपातं (चरणे रचितः कृतः प्रणिपातः प्रणतिः येन तं पादानतमित्यर्थः) [त्वत्समीपे किमिति मया प्रार्थ्यते? तत्राह] सम्प्रति (तव प्रसादमालक्ष्य) मज्जुलवज्जुलसीमनि (मज्जुलानां मनोज्ञानां वज्जुलानां वेतसानां सीमनि मध्यप्रदेशे) केलिशयनं (विहारशय्याम्) अनुघातम् (प्रस्थितम्) अनुगतं (शरणागतं) मधुमथनं (कृष्णं) अनुसर (अभिगच्छ) [अनुगतानु- गमनशैथिल्यात् मुग्धे इति सम्बोधनम्] ॥१॥ अनुवाद—हे मुग्धे राधिके ! विविध प्रकारके चाटुवाक्योंके अनुनय विनय द्वारा तुम्हारे चरणोंमें विनत होनेवाले श्रीकृष्ण इस समय मनोहर वेतस वनके लता-कुञ्जमें केलि शय्या पर शयन कर रहे हैं, तुम उनके अनुगत होकर उनका अभिसरण करो। पद्यानुवाद— चल सखि, चल घनश्याम सदन में मंजुल वंजुल कुंज केलि थल देख थके हरि तुझको पल-पल। की मनुहारे गिरे चरण तल भर लाये री नीर नयन में चल सखि! चल घनश्याम सदन में॥ बालबोधिनी—सखी कहने लगी—हे राधिके ! वे मधुरिपु श्रीकृष्ण तुम्हारे सम्पूर्ण रूपसे अनुगत हो गये हैं। तुम उनके पास चलो एवं शीघ्र ही अभिसरण करो। देर मत करो। अपने मधुर-मधुर वचनोंसे उन्होंने तुमसे अनुनय विनय किया है। तुम्हारे चरणोंमें सर्वात्मभावसे प्रणिपात किया है। तुम्हारे स्वागतकी तैयारीमें संलग्न होकर इस समय वेतसी कुंजके अन्तर्गत केलि-शय्या पर आसीन हो रहे हैं, तुम उनका अनुसरण करो। हे मुग्धे ! तुम कितनी भोली हो, प्रियके अभिसरण कालको भी नहीं जानती हो। चलो उनका अनुसरण करते हुए सर्वात्मभावको प्राप्त हो जाओ। प्रस्तुत श्लोकमें 'राधिके' में 'क' प्रत्यय उसके मुग्धत्वको द्योतित करता है। मधुसूदनका अनुसरण करो। विलम्ब मत
३३४ श्रीगीतगोविन्दम् करो, यह ध्रुव पद है। तज्जुल आदि विभावसे निकुंज उपादान इत्यादि प्रकट हो रहा है। घन-जघन-स्तन-भार भरे! दरमन्थरचरणविहारम्। मुखरित-मणिमञ्जीरमुपैहि विधेहि मरालनिकारम्॥ मुग्धे.... ॥२॥ अन्वय—[एतन्निशाम्य मौनेन सम्मतिमूहमाना शीघ्रं गमनप्रकारमाह]—अयि घन-जघन-स्तन-भारभरे (जघनेच स्तनौच जघनस्तनं घनं संहतं यत् जघनस्तनं तस्य भारस्य भरः अतिशयो यस्याः तत्सम्बुद्धौ) [अतएव] दर-मन्थर-चरण-विहारं (दरमन्थरः ईषन्मन्दः चरणविहारः पादविक्षेपः यथा स्यात् तथा) मुखरितमणिमञ्जीरं (मुखरितौ शब्दितौ मणिमञ्जीरौ रत्ननूपुरौ यत्र तत् यथा तथा) उपेहि (कृष्णमुपगच्छ) [तेन] मरालनिकारं (मरालानां राजहंसानां निकारं परिभवं) विधेहि (गमनेन मरालं पराजयस्वेत्यर्थः); [नूपुर-ध्वनेर्हंसपरिभावित्वादिति भावः]॥२॥ अनुवाद—हे परस्पर गुरु-भारयुक्त स्तन और जघन युगल शालिनि राधे! तुम ईषत् मन्द-मन्थर गतिसे चरणोंको विन्यस्त करते हुए मणिरचित नूपुरोंसे मनोहर शब्द करते हुए मराल-गमनकी शोभाको भी पराजित करते हुए श्रीकृष्णके समीप चलो। पद्यानुवाद— जीन पयो धन सघन नव, मणि नूपुरका झन-झन-झन-खा ले मन्थर गति अति सखि। अभिनव हर हंसोंकी चाल चरणमें चल सखि! चल घनश्याम सदन में॥ बालबोधिनी—स्थूल ऊरुद्वय एवं पीन पयोधरोंसे विभूषित श्रीराधा! तुम स्तन-भार एवं श्रोणी-भारसे झुकी जा रही हो। तुम धीरे-धीरे चलो, तुम्हारी विलम्बित लयमयी चाल हंसोंको भी लज्जित करनेवाली है। तुम धीरे-धीरे मन्थर
एकादशः सर्गः-सामोद-दामोदरः ३३५ गतिसे उस मंजुल केलि-कुञ्जमें पधारो। अपने मणिमय नूपुरोंसे सुसज्जित कदमोंको ऐसे विन्यस्त करो कि उनका मधुर रस-वर्द्धक नाद होता रहे। हे मुग्धे ! अब इन शिथिल पादारविन्दोंको पृथ्वी पर रखते हुए हंसकी चालको पराजित करते हुए मधुसूदनके समीप चलो। देर मत करो। इन मणिनूपुरोंको मुखरित होने दो। शृणुरमणीयतरं तरुणीजनमोहन-मधु-रिपु-वरावम्। कुसुम-शरासन शासन-वन्दिनि पिकनिकरे भज भावम् ॥ मुग्धे.... ॥३॥ अन्वय- [तत्र च गत्वा] - रमणीयतरं (अतिमनोहरं) [अतएव] तरुणी-जन-मोहन-मधुरिपु-रावम् (तरुणीजनानां युवतीनां मोहनं मोहजनकं मधुरिपोः कृष्णस्य रावं वचनं) शृणु; [तथा] कुसुम-शरासन-शासन-वन्दिनि (कुसुम-शरासनस्य पुष्पधन्वनः कामस्य शासनम् आदेशः “हे युवत्यः कान्तसङ्गाहमन्तरेण मद्बाणात् अन्यो रक्षिता नास्ति, अतो मानं त्यजत" इति कामाज्ञा तस्य वन्दिनि स्तावके) पिक-निकरे (कोकिलसमूहे) भावं (अनुरागं) भज। [इदानीं कोकिल-समूहे कृतं विद्वेषं त्यक्त्वा तेषामालापं सुखेन शृणु इत्यर्थः] ॥३॥ अनुवाद - तुम तरुणियोंके मन-मोहक भ्रमरों (श्रीकृष्ण) के रमणीयतर सुमधुर वचनोंका श्रवण करो। कन्दर्पके सुमधुर आदेशका प्रचार करनेवाले कोकिल समूहके गानमें निज भावोंको प्राप्त करो। पद्यानुवाद- मधुवाणी मोहनकी सुन ले, मोहित युवजन जिस पर गुन ले। कुसुम शरासन शासन धुन ले ॥ कूक उठी कोकिल मधुवन में। चल सखि। चल घनश्याम सदन में ॥
३३६ श्रीगीतगोविन्दम् बालबोधिनी—सखि! चल भी पड़ो। सुनो न, तुम्हारे अभिसार हेतु कितने ही मंगल संकेत हो रहे हैं। यह वसन्त-ऋतु है। चहुँ दिशाओंसे भ्रमरोंका गुंजन निनादित हो रहा है। ये तुम्हारी नूपुर ध्वनिसे ताल मेल बिठानेके लिए विकल हो रहे हैं। रमणीय तरुणीजनोंके चित्तको मोहित करनेवाली इन भ्रमरोंकी ध्वनि सुनो, सखि! जैसा यह मधुप श्यामवर्णका है वैसे ही श्रीकृष्ण श्यामवर्णके हैं। उनके अभिसरण हेतु संकेत नाद तरुणियोंके चित्तको मंगल कर देते हैं। भला उनकी सानुनयपूर्ण चाटुकारोक्तियाँ किसके मनको आन्दोलित नहीं करतीं। देखो, सुनो इस मधुमासमें कामदेवकी आज्ञाकारिणी कोकिलाएँ भी कूक उठी हैं। इनका पंचम स्वर मानो कामदेवकी आज्ञाका उद्घोष कर रहा है। कामदेवकी वन्दिनी होकर भी ये कूज रही हैं, तुम भी इन कोकिलाओंमें अपने भावोंको समाहित कर दो। कामदेवके आदेशको प्रसारित-प्रचारित होने दो। कामदेवके कुसुमसायक मनोजकी आज्ञाका डिम-डिम नाद (उद्घोष) करो। कामदेवका आदेश है—सभी विलासी तरुण-तरुणियाँ वसन्त ऋतुमें उन्मुक्त विहार करें। प्रस्तुत श्लोकमें ‘मधुप’ शब्दसे श्रीकृष्ण उपलक्षित हो रहे हैं। ‘कुसुमशरासन शासन वन्दिनि’ पदसे कोकिलाओंके विभावत्वको प्रकट किया गया है। अनिल-तरल-किसलय-निकरेण करेण लतानिकुरम्बम्। प्रेरणमिव करभोरु! करोति गतिं प्रति मुञ्च विलम्बम् ॥ मुग्धे.... ॥४॥ अन्वय—[मद्वचनमनुमोदमाना लतासन्ततिरपि त्वां प्रेरयतीत्याह] —अयि करभोरु (“मणिबन्धादाकनिष्ठं करस्य करभो बहिः” इति अमर-शासनात् करभः कनिष्ठाङ्गुलितो मणिबन्धपर्यन्तः करस्य बहिर्भागः तद्वत्, यद्वा करिशावक-शुण्डवत् ऊरु
एकादशः सर्गः-सामोद-दामोदरः ३३७ यस्याः तत्सम्बुद्धौ) लतानिकुरम्बं (लतासमूहः) [अपि] अनिलतरल-किशलयनिकरेण (अनिलेन वायुना तरलः चञ्चलः यः किशलयनिकरः तद्रूपेण) करेण प्रेरणमिव करोति; [तस्मात्] गतिं (गमनं) प्रति विलम्बं मुञ्च [अचेतनानुकूल्येनापि त्वच्चेतो न द्रवतीत्यभिप्रायः। वस्तुतस्तु उद्दीपनमेवैतत् सर्वम्] ॥४॥ अनुवाद—हे करिशुण्ड सम रमणीय उरु युगल शालिनि ! पवन वेगसे चञ्चल लता-समुदाय नये-नये पल्लवों द्वारा मानो तुम्हें संकेत करते हुए प्रेरित कर रहा है। अतः हे करभोरु! अब जानेमें विलम्ब मत करो। पद्यानुवाद— लतापुंजके पल्लव हिलकर, बुला रहे ज्यों उठा सहज कर, हे करभोरु। गमन कर सत्वर। मद छाया है मलय पवनमें, चल सखि! चल घनश्याम सदनमें॥ बालबोधिनी—सखी कहती है—हे करभोरु ! अर्थात् हाथीकी सूँड़के समान जंघाओं वाली! वायुसे चञ्चल पल्लवरूपी हाथोंसे लताओंके समूह तुम्हें श्रीहरिके पास जानेकी प्रेरणा दे रहे हैं, चलो, सारी प्रकृति तुम्हें आगे ले जानेके लिए विकल है, अब विलम्ब मत करो। यह मन्द-मन्द बयार चल रही है। किसलयके आन्दोलन-संकेत तुम्हें प्रोत्साहित कर रहे हैं। अचेतन चेतनके समान तुम्हें प्रतिबोधित कर रहे हैं। अतः तुम्हारी इष्ट-सिद्धि अवश्यम्भावी है। त्वरित गतिसे चलो, जल्दी करो। तुममें अनुरक्त प्रियतम श्रीकृष्ण वञ्जुल लतागृहमें विलास शय्या पर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। चलते समय तुम्हारे पैरोंका ऊपरी हिस्सा हथेली या हथेलीकी ढलान जैसा लगता है। स्फुरित-मनङ्ग-तरङ्ग-वशादिव सूचित हरि-परिरम्भम्। पृच्छ मनोहर-हार-विमल-जलधारममुं कुचकुम्भम् ॥ मुग्धे.... ॥५ ॥
३३८ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय— [एवं भावमुद्दीप्य विकारान् दर्शयति] - यदि मद्द्द्वचन- मनात्मीयमिति मन्यसे तर्हि]-अनङ्गतङ्गवशात् (कामावेशहेतोः) स्फुरितमिव (कम्पितमिव) [अतएव] सूचित-हरि-परिरम्भं (सूचितः प्रकटितः हरेः कृष्णस्य परिरम्भः आलिङ्गनं येन तथोक्तं) [वामस्तन-कम्पनं हि प्रियसङ्गमं सूचयतीति प्रसिद्धिः]; [तथा] मनोहर-हार-विमल-जलधारम् [मनोहरः हार एव विमला स्वच्छा जलधारा यत्र तादृशं; [कुचोऽयं कलसत्वेन निरूपितः कम्पितश्चानङ्ग-तरङ्गवशात् तस्मात् हारोऽपि जलधारात्वेन निरूपितः] अमुं कुचकुम्भं पृच्छ (प्रियतम-समीपे गमनमधुना युक्तं नवेति जिज्ञासस्व) ॥५॥ अनुवाद - मनोहर हाररूपी विमल जलधाराओंसे परिशोभित अनङ्ग-तरङ्गके वशीभूत श्रीहरिके परिरम्भणके सूचक अपने इन प्रस्फुरित कुच-कुम्भोंसे ही पूछ कर देखो। पद्यानुवाद- प्रिय आलिंगनके आये क्षण, मदन तरंगित कंपित मृदुतन। पूछ कुचोंसे हार धार जल ठरते ॥ जो वन कुम्भ शकुन में। चल सखि ! चल घनश्याम सदन में ॥ बालबोधिनी - सखी कहती है - हे राधे ! क्या सोच रही हो? अब तुम्हें और किस प्रमाणकी आवश्यकता है। यदि तुम्हें मेरा विश्वास नहीं है तो मनोहर हाररूपी जलधारा वाले कुम्भके समान अपने कुचोंसे पूछ लो। भला इनके प्रस्फुरणका कारण क्या है? ये कामदेवकी तरंगसे वशीभूत होकर तरंगायित हो रहे हैं और प्रिय आलिंगनकी सूचना दे रहे हैं, इनकी रसधारामें ही श्रीहरि प्रेम-सागरमें निमग्न हो जायेंगे। इन्हें श्रीहरिके कर-कमल स्पर्शकी लालसा हो रही है। इन स्तनरूपी शकुन-कलशों पर विद्यमान विमल मनोहर हार पावन एवं निर्मल जलकी धाराके समान है। यही