भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३२५ है। विश्व-विजय करनेके बाद ये आयुध तुम्हारे मुखमण्डल पर शोभा प्राप्त कर रहे हैं। 'चण्डि'—इस संबुद्धि पदसे तात्पर्य है कि अब तक क्रोधका परित्याग नहीं किया है। चण्डि अर्थात् कोपने! पञ्चबाणोंका सवैशिष्ट्य वर्णन इस प्रकार है— (१) तुम्हारे अधर बन्धूक अर्थात् दुपहरियाके फूलके समान लाल वर्णके हैं। ये कामदेवके रक्तवर्णके आकर्षण बाण हैं। (२) तुम्हारे सुशीतल कपोल मधूक अर्थात् महुयेके समान सरस सुनहली पाण्डुवर्ण कान्तिमय हैं। मानो अभी-अभी उसमेंसे रस चू पड़ेगा। ये कामदेवके पीतवर्णके वशीकरण बाण हैं। (३) तुम्हारी नीली आँखें समस्त सौन्दर्यका सार अपने साथ ही सन्निहित किये हुए हैं। इन्होंने नील कमलोंकी सुन्दरताका तिरस्कार कर दिया है। ये कामदेव के कृष्ण-वर्णीय उन्मादन बाण हैं। (४) तुम्हारी नासिका तिलके फूलके सदृश है। ये कामदेवके पीतवर्णीय द्रावण बाण हैं। (५) तुम्हारे दाँत कुन्द पुष्पके समान हैं। ये कामदेवके श्वेतवर्णीय शोषण बाण हैं। इस प्रकार अपने सम्पूर्ण पञ्च आयुधोंद्वारा कामदेव तुम्हारे मुखकी सेवाके प्रसादसे विश्व विजय कर रहा है। प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूलविक्रीड़ित छन्द एवं उत्प्रेक्षा अलंकार है। दृशौ तव मदालसे वदनमिन्दु-सन्दीपनं गतिर्जन-मनोरमा विजितरम्भमूरुद्वयम्। रतिस्तव कलावती रुचिरचित्रलेखे भ्रुवा- वहो विबुध-यौवतं वहसि तन्वि! पृथ्वीगता ॥६॥