भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 356, कुल 448 में से

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३२४ श्रीगीतगोविन्दम्

सदृश इत्यर्थः, लोहितत्वात् साम्यम्) गण्डे (कपोले) मधुच्छविः (मधुकपुष्पस्य महुयाफुल इति भाषा छविर्दीप्तिः) चकास्ति [पाण्डुत्वात् अत्रापि साम्यम्] [तथा] नील-नलिन-श्रीमोचने (नीलनलिनयोः नीलोत्पलयोः श्रीमोचने शोभा-तिरस्कारके) लोचने [चकास्तः] [कार्ष्ण्यादत्र साम्यम्] अयि कुन्दाभ-दन्ति (कुन्दकुसुमदशने)। अत्रापि शौक्लात् साम्यम्] [तव] नासा (नासिका) तिलप्रसूनपदवीं (तिलप्रसूनस्य तिलपुष्पस्य पदवीं) अभ्येति (तिल-कुसुम-सदृशी भातीत्यर्थः) [अत्र आकृत्या साम्यम्]; [अतएव] सः (प्रसिद्धः) पुष्पायुध (कामः) प्रायः (बाहुल्येन) त्वन्मुखसेवया (तव मुखाराधनेन) [त्वन्मुखस्थितानि एतानि कुसुमानि लब्ध्वा तैरेवायुधैः] विश्वं विजयते (अभिभवति) ॥५॥ पद्यानुवाद— अधर सुमन बन्धूक सरस सम, कल कपोल रस भीने। फूल मधूक बन्धुसे दर्शित, नेत्र नलिन-छवि लीने॥ तिल-प्रसून-पदवी सी नासा दन्त कुन्द सम भासे। मुख आश्रित पुष्पायुध तेरे, जग विजयी हो हासे॥ अनुवाद—हे प्रिये! चण्डि! तुम्हारा अधर बन्धूक- पुष्पकी भाँति मनोहर अरुण वर्णके हैं, तुम्हारे सुशीतल कपोल मधूक पुष्पकी छविको धारण किये हुए हैं, तुम्हारे लोचन इन्दीवरकी शोभाको तिरस्कृत कर रहे हैं, तुम्हारी नासिका तिलके फूलके समान है, तुम्हारे दशन कुन्द पुष्पकी भाँति शुभ्रवर्णीय हैं। हे प्रिये! पुष्पायुधने अपने पाँच पुष्प रूपी बाणोंके द्वारा तुम्हारे मुखकी सेवा करके सारे संसारको जीत लिया है। बालबोधिनी—हे प्रिये! तुम्हारे मुखकमल पर पुष्पधन्वा कामदेवके समान पञ्च आयुध विलसित हो रहे हैं—हे चण्डि! यह सुविख्यात विश्व विजेता कामदेव तुम्हारे इन पुष्प आयुधोंको लेकर ही समस्त विश्वको विजय कर रहा

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