गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३२३ बालबोधिनी—श्रीराधाने अब भी कोई उत्तर न दिया, तब श्रीकृष्ण अत्यन्त अनुनय भरे वचनोंसे उनसे कहने लगे—हे तन्वि ! कितनी कृशताको प्राप्त हो गयी हो ? तुम्हारी चुप्पी तुम्हें व्यर्थ ही अन्दर ही अन्दर कुतर रही है, मुझे इतना कष्ट दे रही है, पञ्चम राग छेड़ो, कोमलता धारण करो। इस वसन्त ऋतुमें तो कामिनियाँ अपने प्रियतमोंका अनुकरण किया करती हैं, तुम तो कोयलसे भी अधिक मधुर संलापिनी हो, मधुर आलाप करो, अपनी दृष्टिसे रस-वृष्टि करो। हे तरुणि ! कृपा-अवलोकन द्वारा मेरा संताप दूर करो। हे सुमुखि ! तुम्हारे लिए मेरे प्रति वैमुख्य उचित नहीं है। उदासीनताका अपरिग्रह करो, दम्भ छोड़ दो, मेरा परित्याग मत करो। हे मुग्धे ! हे विचाररहिते ! मैं तुम्हारा प्रिय हूँ। अतिशय स्निग्ध स्नेहपरायण हूँ। अनाहूत ही यहाँ उपस्थित हुआ हूँ। यह देखो साश्रु होकर खड़ा हूँ। अपनी स्नेह दृष्टिसे मुझे बाँध लो। प्रस्तुत श्लोकमें हरिणी वृत्त, यथासंरत्न अलङ्कार, अनुकूल नायक, प्रसाद गुण, कैशिकी वृत्ति, वैदर्भी रीति तथा मागधी गीति है। बन्धूकद्युति-बान्धवोऽयमधरः स्निग्धो मधूकच्छवि - चकास्ति नील-नलिन श्रीमोचने लोचनम्। गण्डश्चण्डि ! नासाभ्येति तिल-प्रसून-पदवीं कुन्दाभदन्ति ! प्रिये ! प्रायस्त्वन्मुख-सेवया विजयते विश्वं स पुष्पायुधः ॥५॥ अन्वय—[अतः पञ्चपुष्पाञ्चितमास्यं ते पुष्पायुधविलासेन मां दुनोतीति भङ्ग्यास्तदङ्गानि स्तौति]—अयि चण्डि (कोपने) अयि प्रिये, अयं स्निग्धः (लावण्यमयः) तव अधरः बन्धुकद्युतिवान्धवः (बन्धुकस्य पुष्पविशेषस्य बाँधुलि फुल इति भाषा या द्युतिः कान्तिः तस्या वान्धवः बन्धुककुसुम