गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२२ श्रीगीतगोविन्दम् व्यथयति वृथा मौनं तन्वि! प्रपञ्चय पञ्चमं, तरुणि मधुरालापैस्तापं विनोदय दृष्टिभिः। सुमुखि! विमुखी भावं तावद्विमुञ्च न मुञ्च मां स्वयमतिशयस्निग्धो मुग्धे। प्रियोऽयमुपस्थितः ॥४ ॥ अन्वय—[एवमुक्तेऽपि अनुत्तरामाह]—अयि तन्वि (कृशाङ्गि! मामप्राप्य त्वमपि कृशासीति भावः), [यस्मात् तव] वृथा (अकारणं) मौनं (तूष्णीम्भावः) मां व्यथयति (सन्तापयति) [तस्मात्] पञ्चमं (स्वरं) प्रपञ्चय (विस्तारय); [मधुरमालप इति भावः]। हे तरुणि (किशोरि) मधुरालापैः (मधुरैः आलापैः भाषितैः) तापं (मन्मथसन्तापं) विनोदय (प्रशमय)। हे सुमुखि (सुवदने), दृष्टिभिः (कृपास्निग्धावलोकनैः) विमुखीभावं (वैमुख्यं प्रत्याख्यानकार्कश्यमिति यावत्) विमुञ्च (त्यज) मां न मुञ्च (मा त्याक्षीः) [सुमुख्यास्ते विमुखीभावो न युक्त इत्यर्थः]। [कथमेवं करोमीत्याह]—हे मुग्धे (विचारमूढे) प्रियः अयम् अतिशयस्निग्धः (अतिप्रेमवान्), [कथं स्निग्धज्ञानम् अत आह]—स्वयम् [अनाहूत एव] उपस्थितः (आगतः), [अतस्त्यागे मूढ़ता एवेत्यर्थः] ॥४॥ पद्यानुवाद— तन्वि! मौन हो मार रही क्यों? पंचम स्वरमें बोलो। तरल दीठसे देख हृदयके, सारे बन्धन खोलो॥ विमुख भाव यह सुमुखि! तुम्हारा अनुचित आज बड़ा है। स्वयं स्निग्ध अतिशय तव प्रिय, यह मुग्धे! सजल खड़ा है॥ अनुवाद—हे कृशाङ्गि! तुम्हारा यह व्यर्थ मौन-अवलम्बन मुझे व्यथित कर रहा है। हे तरुणि! पञ्चम स्वरका विस्तार करो। मधुर आलापों तथा कृपा अवलोकनके द्वारा मेरे संतापका विमोचन करो। हे सुमुखि! अपनी विमुखताके भावका परित्याग करो, मेरा त्याग नहीं। हे अविचारकारिणि! तुमसे अतिशय स्नेह करनेवाला तुम्हारा प्रिय यहाँ उपस्थित है।