गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 353, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३२१ कराला भीषणा कालसर्पा भाति विराजते), तदुदित-भय-भञ्जनाय तस्याः भ्रुवः उदितस्य भयस्य भञ्जनाय नाशाय) यूनां [अस्माकं] त्वदधर-सीधु-सुधैव (तव अधर-मधुरूपा सुधा एव; मादकत्वात् सीधु इति मधुरत्वाच्च सुधेत्युक्तम्) सिद्धमन्त्रः [नान्यत् किञ्चिदित्यर्थः] [अमृतपानेनैव विषभयं निवर्तते इति भावः] ॥३॥ पद्यानुवाद— बंकिम भौंहें नागिनि तेरी डस लेती जब जन को। अधर सुधा ही विष हरता है, विरुज बनाता तन को॥ अनुवाद—हे शशिमुखि ! तुम्हारी कुटिल भ्रूलता युवजन विह्वलकारी कराल कालजयी सर्पिणीके समान है। इससे उत्पन्न भयको भञ्जन हेतु तुम्हारे अधरसे विगलित मदिरा सुधा ही एकमात्र सिद्धमन्त्र स्वरूप है। बालबोधिनी—श्रीकृष्ण वात्स्यायन-न्यायका आश्रय लेकर कहते हैं—हे चन्द्रमुखि ! तुम्हारा मुखमण्डल तो चन्द्रमा सरीखा है, परन्तु तुम्हारे मुखपर विद्यमान भौंहें अति कुटिल हैं, जो मेरे जैसे युवजनोंके लिए महाभयंकर काल सर्पिणीके समान मोहित करनेवाली, अत्यन्त भयका उत्पादन कर रही हैं, अरे जो हिंस्रमुखी होती हैं, परन्तु तुम तो चन्द्रमुखी हो। तरुणोंके प्रति कोप प्रकाशित मत करो। इस काल नागिनीके काटनेपर कोई युवक बच नहीं सकता, न ही कोई ऐसी औषध है, जिससे गरलकी ज्वाला शान्त हो जाय। हाँ, तुम्हारी अधर-सुधा ही तुम्हारी भ्रू-रूपिणी सर्पिणीके डँसनेसे उत्पन्न विषको शान्त करनेके लिए सिद्धमन्त्र स्वरूप है। प्रस्तुत श्लोकमें पुष्पिताग्रा छंद है। कल्पितोपमा एवं रूपक अलंकार है।