गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२० श्रीगीतगोविन्दम् दंशनसे निर्दय होकर आघात करो, भुज-लता द्वारा प्रगाढ़ रूपसे मुझे बाँध लो। कठिन स्तनोंसे प्रबल उत्पीड़न करो। हे कोपमयि! मुझको इस प्रकार कठोर दण्ड देकर तुम्हीं सुखी होओ। ऐसे कठोर दण्डसे यदि मेरे प्राण निकल जायें तो भले निकल जायें, परन्तु मदनरूप चाण्डालके बाण प्रहारसे मेरे प्राण न जायें॥२॥ बालबोधिनी— श्रीकृष्ण श्रीराधासे कहते हैं- हे मुग्धे ! यदि तुम्हें मेरे वचनोंपर विश्वास नहीं है, तो मुझे दण्ड दे सकती हो। क्रोधके आवेशमें तुम मुझे समझनेका प्रयास ही नहीं कर रही हो। अतः तुम यथेच्छ रूपसे मुझपर शासन करो। कन्दर्प-चाण्डाल अपने पञ्चबाणोंसे मुझे मारनेकी चेष्टा कर रहा है, पर इतनी कृपा करना कि मेरे प्राण न चले जायें। हे आत्महितानभिज्ञे ! चण्डित्वका परित्याग करो। तुम्हारे ही सम्बन्धसे इस चाण्डाल कामदेवके बाणोंसे विदीर्ण हो मेरे प्राण निकले जा रहे हैं। इससे मेरी रक्षा करो। मुझे दण्ड देकर तुम सुखी हो जाओ, निर्दयतासे दांतों द्वारा काट डालो, निविड़ स्तनोंसे मुझे पीस डालो, भुजलताओँसे कसकर बाँध लो। मुझसे हँसकर कह दो- अब तुम मेरे बन्दी हो, मेरे बन्धनसे अब कभी भी तुम मुक्त न हो सकोगे। शशिमुखि ! तव भाति भङ्गुर भ्रू, र्युवजनमोह-कराल कालसर्पी। तदुदित-भय-भञ्जनाय यूनां त्वदधर-सीधु-सुधैव सिद्धमंत्रः ॥३॥ अन्वय—[मम कोपो नास्त्येव चेत् तत्राह] — अयि शशिमुखि (चन्द्रानने), तव भङ्गुरभ्रूः (भङ्गुरा कुटिला भ्रूः) [यदि कोपिना नासि तत् कुतस्ते भ्रुवोर्भङ्गुरत्वम्?], युवजन-मोह-कराल- कालसर्पी (युवजनानां तरुणानाम् अस्माकं मोहाय मूर्च्छाविधानाय