गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३३३ तत्राह] चरण-रचित-प्रणिपातं (चरणे रचितः कृतः प्रणिपातः प्रणतिः येन तं पादानतमित्यर्थः) [त्वत्समीपे किमिति मया प्रार्थ्यते? तत्राह] सम्प्रति (तव प्रसादमालक्ष्य) मज्जुलवज्जुलसीमनि (मज्जुलानां मनोज्ञानां वज्जुलानां वेतसानां सीमनि मध्यप्रदेशे) केलिशयनं (विहारशय्याम्) अनुघातम् (प्रस्थितम्) अनुगतं (शरणागतं) मधुमथनं (कृष्णं) अनुसर (अभिगच्छ) [अनुगतानु- गमनशैथिल्यात् मुग्धे इति सम्बोधनम्] ॥१॥ अनुवाद—हे मुग्धे राधिके ! विविध प्रकारके चाटुवाक्योंके अनुनय विनय द्वारा तुम्हारे चरणोंमें विनत होनेवाले श्रीकृष्ण इस समय मनोहर वेतस वनके लता-कुञ्जमें केलि शय्या पर शयन कर रहे हैं, तुम उनके अनुगत होकर उनका अभिसरण करो। पद्यानुवाद— चल सखि, चल घनश्याम सदन में मंजुल वंजुल कुंज केलि थल देख थके हरि तुझको पल-पल। की मनुहारे गिरे चरण तल भर लाये री नीर नयन में चल सखि! चल घनश्याम सदन में॥ बालबोधिनी—सखी कहने लगी—हे राधिके ! वे मधुरिपु श्रीकृष्ण तुम्हारे सम्पूर्ण रूपसे अनुगत हो गये हैं। तुम उनके पास चलो एवं शीघ्र ही अभिसरण करो। देर मत करो। अपने मधुर-मधुर वचनोंसे उन्होंने तुमसे अनुनय विनय किया है। तुम्हारे चरणोंमें सर्वात्मभावसे प्रणिपात किया है। तुम्हारे स्वागतकी तैयारीमें संलग्न होकर इस समय वेतसी कुंजके अन्तर्गत केलि-शय्या पर आसीन हो रहे हैं, तुम उनका अनुसरण करो। हे मुग्धे ! तुम कितनी भोली हो, प्रियके अभिसरण कालको भी नहीं जानती हो। चलो उनका अनुसरण करते हुए सर्वात्मभावको प्राप्त हो जाओ। प्रस्तुत श्लोकमें 'राधिके' में 'क' प्रत्यय उसके मुग्धत्वको द्योतित करता है। मधुसूदनका अनुसरण करो। विलम्ब मत