गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३४ श्रीगीतगोविन्दम् करो, यह ध्रुव पद है। तज्जुल आदि विभावसे निकुंज उपादान इत्यादि प्रकट हो रहा है। घन-जघन-स्तन-भार भरे! दरमन्थरचरणविहारम्। मुखरित-मणिमञ्जीरमुपैहि विधेहि मरालनिकारम्॥ मुग्धे.... ॥२॥ अन्वय—[एतन्निशाम्य मौनेन सम्मतिमूहमाना शीघ्रं गमनप्रकारमाह]—अयि घन-जघन-स्तन-भारभरे (जघनेच स्तनौच जघनस्तनं घनं संहतं यत् जघनस्तनं तस्य भारस्य भरः अतिशयो यस्याः तत्सम्बुद्धौ) [अतएव] दर-मन्थर-चरण-विहारं (दरमन्थरः ईषन्मन्दः चरणविहारः पादविक्षेपः यथा स्यात् तथा) मुखरितमणिमञ्जीरं (मुखरितौ शब्दितौ मणिमञ्जीरौ रत्ननूपुरौ यत्र तत् यथा तथा) उपेहि (कृष्णमुपगच्छ) [तेन] मरालनिकारं (मरालानां राजहंसानां निकारं परिभवं) विधेहि (गमनेन मरालं पराजयस्वेत्यर्थः); [नूपुर-ध्वनेर्हंसपरिभावित्वादिति भावः]॥२॥ अनुवाद—हे परस्पर गुरु-भारयुक्त स्तन और जघन युगल शालिनि राधे! तुम ईषत् मन्द-मन्थर गतिसे चरणोंको विन्यस्त करते हुए मणिरचित नूपुरोंसे मनोहर शब्द करते हुए मराल-गमनकी शोभाको भी पराजित करते हुए श्रीकृष्णके समीप चलो। पद्यानुवाद— जीन पयो धन सघन नव, मणि नूपुरका झन-झन-झन-खा ले मन्थर गति अति सखि। अभिनव हर हंसोंकी चाल चरणमें चल सखि! चल घनश्याम सदन में॥ बालबोधिनी—स्थूल ऊरुद्वय एवं पीन पयोधरोंसे विभूषित श्रीराधा! तुम स्तन-भार एवं श्रोणी-भारसे झुकी जा रही हो। तुम धीरे-धीरे चलो, तुम्हारी विलम्बित लयमयी चाल हंसोंको भी लज्जित करनेवाली है। तुम धीरे-धीरे मन्थर