भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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एकादशः सर्गः सामोद-दामोदरः सुचिर मनुनयेन प्रीणयित्वा मृगाक्षीं गतवति कृतवेशे केशवे कुञ्जशय्याम्। रचित-रुचिर-भूषां दृष्टि मोषे प्रदोषे स्फुरति निरवसादां कापि राधां जगाद ॥१॥ अन्वय-[एवं प्रियां प्रसाद्य कुञ्जशय्यां गतवति श्रीकृष्णे]- कापि (सखी) दृष्टिमोषे (दृष्टिं मुञ्चाति तमसावृणोति तथोक्ते दर्शनचौरे इत्यर्थः) प्रदोषे (सन्ध्यायां) स्फुरति (प्रकाशमाने सति) सुचिरं (दीर्घकालं व्याप्य) अनुनयेन मृगाक्षीं (श्रीराधां) प्रीणयित्वा (सन्तोष्य) कृतवेशे (परिहित-शृङ्गारोचित-वेशे) केशवे (कृष्णे) कुञ्जशय्यां गतवति [सति] निरवसादां (अनुनयादिना अवसादरहितां स्फूर्त्तिमतीमित्यर्थः) [अतएव] रचित-रुचिर-भूषां (रचिता रुचिरा प्रियमनोहारिणी भूषा यया तां) राधां जगाद (वभाषे) ॥१॥ अनुवाद-मृगनयना श्रीराधाको चिरकाल तक अनुनय- विनयसे प्रसन्न करके श्रीकृष्ण चले आये और मोहनवेश धारणकर निकुञ्ज-मन्दिर स्थित शय्या पर अवस्थित हो उनकी प्रतीक्षा करने लगे, इधर दृष्टि-आच्छादनकारिणी सन्ध्या उपस्थित हुई तब विविध मनोहर अलङ्कार विभूषिता श्रीराधासे कोई सखी इस प्रकार कहने लगी- पद्यानुवाद- चिर अनुनयसे हो अनुकूल धरकर सुन्दर वेश, जानेको उद्यत है जो अब कुंज शयन हरि देश। खेदरहित आतुर राधासे दृगहर संध्या काले सखी एक हँस बोल उठी-हे मृगनयनी! ब्रजवाले॥