भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३३१ बालबोधिनी—इस प्रकार श्रीकृष्ण श्रीराधाका बहुत देर तक मनुहार करते रहे, अन्ततः श्रीराधा प्रसन्न हो गयीं और श्रीकृष्ण समाश्वस्त होकर निकुञ्ज गृहमें केलि-शय्याकी रचना करने चले गये। मृगनयनी श्रीराधा उल्लसित हो गयीं। सारा खेद विषाद अपगत हो गया, हिरणी जैसी आँखोंमें भावोंका उद्वेलन होने लगा। उनमें हर्ष समा गया। भीतर ही भीतर उमगने लगीं। अभिसरणके योग्य वेशभूषा नील निचोल (नीले वसन) को पहनने लगीं, जिसे कोई और न देख सके, उनसे मिलन योग्य मनोहर आभूषणोंको स्वयं ही पहनने लगीं। इस आभरणोंको भी कोई देख न सकेगा। तभी कोई सखी श्रीराधासे अनुरोधपूर्वक श्रीकृष्णसे मिलनेके लिए प्रोत्साहित करते हुए कहने लगी—राधे, अब तो तुम्हें विश्वास हो गया न, मधुसूदन तुम्हारे अनुगत हैं। प्रदोषका अर्थ है—रात्रिकाल स्फुरित हो रहा है, इस समय दृष्टिमें कुछ स्पष्ट नहीं होता। प्रस्तुत श्लोकमें मालिनी छन्द है। अथ विंश सन्दर्भः गीतम् ॥२०॥ वसन्तरागयतितालाभ्यां गीयते। अनुवाद—श्रीगीतगोविन्द काव्यका यह बीसवाँ प्रबन्ध वसन्त राग तथा यति तालमें गाया जाता है। विरचित-चाटु-वचन-रचनं चरणे रचित-प्रणिपातम्। सम्प्रति मञ्जुल-वञ्जुल-सीमनि केलि-शयनमनुयातम् ॥ मुग्धे ! मधु-मथनमनुगतमनुसर राधिके ! ॥१॥ ध्रुवम् अन्वय—अयि मुग्धे (विचारमूढ़े) राधिके सम्प्रति (अधुना) विरचित-चाटु-वचन-रचनं (विरचिता भङ्ग्या प्रतिपादिता चाटुवचनानां रचना येन तं) [चाटुवचनमात्रेण कथं ज्ञेयानुगतिः ?