गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३२९ बालबोधिनी—इस प्रकार अपनी प्रियाके गुण-कीर्तनके आवेशमें अत्यन्त संकटपूर्ण स्थितिमें श्रीराधाजीके स्पर्श- सुखानुभूतिका स्मरण श्रीकृष्णके द्वारा होने पर कवि जयदेव सभीको आशीर्वाद प्रदान कर रहे हैं कि श्रीहरि आपलोगोंका प्रीति-वर्द्धन करें। जब भगवान् श्रीकृष्णका कंसके हाथी कुवलयापीड़के साथ युद्ध हुआ, तब उस युद्ध-स्थलमें उस हाथीके कुम्भस्थलको देखकर उन्हें श्रीराधाजीके पीन पयोधरोंका स्मरण हो आया। उस हाथीके स्पर्शसे उन्हें श्रीराधाजीके स्पर्शानुभूति जन्य सात्त्विक भावका उदय हुआ। उस शृङ्गारिक आनन्दमें विह्वल हो जानेसे अर्थात् श्रीराधाजीके मिलन-जन्य आनन्दके स्मरणसे उन्होंने अपने नेत्र बन्द कर लिये। तब कंसके सभासदोंको यह समझकर आनन्द हुआ कि हमारी जीत हो गयी है, श्रीकृष्णने भयभीत होकर अपनी आँखें बन्द कर ली हैं। पर जैसे ही श्रीकृष्णने व्यामोह वाक्योंकी उच्च ध्वनिका श्रवण किया, तब अतिशीघ्र स्वयंको संभाल लिया और क्षणभरमें ही उस हाथीको पछाड़कर मार गिराया। तब उसी शत्रु पक्षमें उन्हीं सभासदोंके मुखसे अचानक यह ध्वनि निकल पड़ी—श्रीकृष्ण जीत गये, जीत गये। यह ध्वनि आनन्ददायक कोलाहल बन गई। इस प्रकार यह सर्ग श्रीराधाके स्मरण-जनित विकारके वर्णनसे युक्त है। इस विकार भाव द्वारा माधव अत्यन्त मनोहर वेश धारण किये हुए हैं। इति दशम सर्ग।