गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमः सर्गः - चतुरचतुर्भुजः ३२७ देवस्त्रियोंका समूह तुम्हारे भीतर निवास कर रहा है। तुम्हारी आँखें सौभाग्यमदसे अलसायी हुई हैं कि अब तो प्रिय तुम्हारे चरणोंमें हैं। इस प्रकार मदजनित हर्षके कारण मेरी अङ्गना होकर भी तुमने स्वर्गकी अप्सरा मदालसाको अपने नेत्रोंमें धारण किया है। तुम्हारा मुखमण्डल विबुधरमणी इन्दुमतीका आवास है, जहाँ चन्द्रमासे भी अधिक आवश्यकता है। तुम्हें देखकर चन्द्रमाके मनमें ईर्ष्या उत्पन्न होती है, क्योंकि उसमें इतनी शक्ति कहाँ है ? तुम्हारी गति जन-जनके मनको आह्लादित करनेवाली है। अतएव तुममें मनोरमा नामक अप्सराका निवास है। तुम्हारी जाँघ कदली वृक्षको भी अनादृत कर रही है, जहाँ मानों रम्भाका निवास है। तुम्हारी गति हाव, भाव, विलास किलकिञ्चित् आदि कलाओंसे युक्त है। अतएव तुममें कलावती नामक अप्सराका निवास है। तुम्हारे भ्रूयुगल मनोहर चित्ररचनाके समान हैं। वहाँ लगता है कि तुम पृथ्वी पर रहती हुई भी इस पृथ्वी छन्दमें उतरकर देवताओंके यौवनका वितान बनी हुई हो, तुम्हारा यौवन दिव्य हो। प्रस्तुत श्लोकमें पृथ्वी छन्द तथा कल्पितोपमालंकार है। प्रीतिं वस्तनुतां हरिः कुवलयापीडेन सार्धं रणे राधा-पीन-पयोधर-स्मरण कृत्कुम्भेन सम्भेदवान्। यत्र स्विद्यति मीलति क्षण क्षिप्ते द्विपे तत्क्षणात् कंसस्यालमभूत् जितं जितमिति व्यामोह-कोलाहलः ॥७ ॥ इति एकोनविंशः सन्दर्भः। इति श्रीगीतगोविन्दे महाकाव्ये मानिनी वर्णने मुग्ध माधवो नाम दशमः सर्गः। अन्वय- [एवं स्वप्रिया-गुण कीर्त्तनावेशान्महासङ्कट-स्थानानुभूत- तत्स्पर्श-सुख-स्मरण-परवशं श्रीकृष्णं वर्णयन् भक्तानाशास्ते]- [यः