गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३६ श्रीगीतगोविन्दम् बालबोधिनी—सखि! चल भी पड़ो। सुनो न, तुम्हारे अभिसार हेतु कितने ही मंगल संकेत हो रहे हैं। यह वसन्त-ऋतु है। चहुँ दिशाओंसे भ्रमरोंका गुंजन निनादित हो रहा है। ये तुम्हारी नूपुर ध्वनिसे ताल मेल बिठानेके लिए विकल हो रहे हैं। रमणीय तरुणीजनोंके चित्तको मोहित करनेवाली इन भ्रमरोंकी ध्वनि सुनो, सखि! जैसा यह मधुप श्यामवर्णका है वैसे ही श्रीकृष्ण श्यामवर्णके हैं। उनके अभिसरण हेतु संकेत नाद तरुणियोंके चित्तको मंगल कर देते हैं। भला उनकी सानुनयपूर्ण चाटुकारोक्तियाँ किसके मनको आन्दोलित नहीं करतीं। देखो, सुनो इस मधुमासमें कामदेवकी आज्ञाकारिणी कोकिलाएँ भी कूक उठी हैं। इनका पंचम स्वर मानो कामदेवकी आज्ञाका उद्घोष कर रहा है। कामदेवकी वन्दिनी होकर भी ये कूज रही हैं, तुम भी इन कोकिलाओंमें अपने भावोंको समाहित कर दो। कामदेवके आदेशको प्रसारित-प्रचारित होने दो। कामदेवके कुसुमसायक मनोजकी आज्ञाका डिम-डिम नाद (उद्घोष) करो। कामदेवका आदेश है—सभी विलासी तरुण-तरुणियाँ वसन्त ऋतुमें उन्मुक्त विहार करें। प्रस्तुत श्लोकमें ‘मधुप’ शब्दसे श्रीकृष्ण उपलक्षित हो रहे हैं। ‘कुसुमशरासन शासन वन्दिनि’ पदसे कोकिलाओंके विभावत्वको प्रकट किया गया है। अनिल-तरल-किसलय-निकरेण करेण लतानिकुरम्बम्। प्रेरणमिव करभोरु! करोति गतिं प्रति मुञ्च विलम्बम् ॥ मुग्धे.... ॥४॥ अन्वय—[मद्वचनमनुमोदमाना लतासन्ततिरपि त्वां प्रेरयतीत्याह] —अयि करभोरु (“मणिबन्धादाकनिष्ठं करस्य करभो बहिः” इति अमर-शासनात् करभः कनिष्ठाङ्गुलितो मणिबन्धपर्यन्तः करस्य बहिर्भागः तद्वत्, यद्वा करिशावक-शुण्डवत् ऊरु