गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशः सर्गः-सामोद-दामोदरः ३३७ यस्याः तत्सम्बुद्धौ) लतानिकुरम्बं (लतासमूहः) [अपि] अनिलतरल-किशलयनिकरेण (अनिलेन वायुना तरलः चञ्चलः यः किशलयनिकरः तद्रूपेण) करेण प्रेरणमिव करोति; [तस्मात्] गतिं (गमनं) प्रति विलम्बं मुञ्च [अचेतनानुकूल्येनापि त्वच्चेतो न द्रवतीत्यभिप्रायः। वस्तुतस्तु उद्दीपनमेवैतत् सर्वम्] ॥४॥ अनुवाद—हे करिशुण्ड सम रमणीय उरु युगल शालिनि ! पवन वेगसे चञ्चल लता-समुदाय नये-नये पल्लवों द्वारा मानो तुम्हें संकेत करते हुए प्रेरित कर रहा है। अतः हे करभोरु! अब जानेमें विलम्ब मत करो। पद्यानुवाद— लतापुंजके पल्लव हिलकर, बुला रहे ज्यों उठा सहज कर, हे करभोरु। गमन कर सत्वर। मद छाया है मलय पवनमें, चल सखि! चल घनश्याम सदनमें॥ बालबोधिनी—सखी कहती है—हे करभोरु ! अर्थात् हाथीकी सूँड़के समान जंघाओं वाली! वायुसे चञ्चल पल्लवरूपी हाथोंसे लताओंके समूह तुम्हें श्रीहरिके पास जानेकी प्रेरणा दे रहे हैं, चलो, सारी प्रकृति तुम्हें आगे ले जानेके लिए विकल है, अब विलम्ब मत करो। यह मन्द-मन्द बयार चल रही है। किसलयके आन्दोलन-संकेत तुम्हें प्रोत्साहित कर रहे हैं। अचेतन चेतनके समान तुम्हें प्रतिबोधित कर रहे हैं। अतः तुम्हारी इष्ट-सिद्धि अवश्यम्भावी है। त्वरित गतिसे चलो, जल्दी करो। तुममें अनुरक्त प्रियतम श्रीकृष्ण वञ्जुल लतागृहमें विलास शय्या पर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। चलते समय तुम्हारे पैरोंका ऊपरी हिस्सा हथेली या हथेलीकी ढलान जैसा लगता है। स्फुरित-मनङ्ग-तरङ्ग-वशादिव सूचित हरि-परिरम्भम्। पृच्छ मनोहर-हार-विमल-जलधारममुं कुचकुम्भम् ॥ मुग्धे.... ॥५ ॥