भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 370, कुल 448 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 370

३३८ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय— [एवं भावमुद्दीप्य विकारान् दर्शयति] - यदि मद्द्द्वचन- मनात्मीयमिति मन्यसे तर्हि]-अनङ्गतङ्गवशात् (कामावेशहेतोः) स्फुरितमिव (कम्पितमिव) [अतएव] सूचित-हरि-परिरम्भं (सूचितः प्रकटितः हरेः कृष्णस्य परिरम्भः आलिङ्गनं येन तथोक्तं) [वामस्तन-कम्पनं हि प्रियसङ्गमं सूचयतीति प्रसिद्धिः]; [तथा] मनोहर-हार-विमल-जलधारम् [मनोहरः हार एव विमला स्वच्छा जलधारा यत्र तादृशं; [कुचोऽयं कलसत्वेन निरूपितः कम्पितश्चानङ्ग-तरङ्गवशात् तस्मात् हारोऽपि जलधारात्वेन निरूपितः] अमुं कुचकुम्भं पृच्छ (प्रियतम-समीपे गमनमधुना युक्तं नवेति जिज्ञासस्व) ॥५॥ अनुवाद - मनोहर हाररूपी विमल जलधाराओंसे परिशोभित अनङ्ग-तरङ्गके वशीभूत श्रीहरिके परिरम्भणके सूचक अपने इन प्रस्फुरित कुच-कुम्भोंसे ही पूछ कर देखो। पद्यानुवाद- प्रिय आलिंगनके आये क्षण, मदन तरंगित कंपित मृदुतन। पूछ कुचोंसे हार धार जल ठरते ॥ जो वन कुम्भ शकुन में। चल सखि ! चल घनश्याम सदन में ॥ बालबोधिनी - सखी कहती है - हे राधे ! क्या सोच रही हो? अब तुम्हें और किस प्रमाणकी आवश्यकता है। यदि तुम्हें मेरा विश्वास नहीं है तो मनोहर हाररूपी जलधारा वाले कुम्भके समान अपने कुचोंसे पूछ लो। भला इनके प्रस्फुरणका कारण क्या है? ये कामदेवकी तरंगसे वशीभूत होकर तरंगायित हो रहे हैं और प्रिय आलिंगनकी सूचना दे रहे हैं, इनकी रसधारामें ही श्रीहरि प्रेम-सागरमें निमग्न हो जायेंगे। इन्हें श्रीहरिके कर-कमल स्पर्शकी लालसा हो रही है। इन स्तनरूपी शकुन-कलशों पर विद्यमान विमल मनोहर हार पावन एवं निर्मल जलकी धाराके समान है। यही