गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३३९ जलकी धारा तरङ्गायमान होकर प्रिय प्राप्तिका संदेशा दे रही है। कामके आवेशसे स्फुरित तुम्हारे स्तन ही तो फड़क कर शुभ शकुन बन रहे हैं। इसे अभिशाप समझकर अब तुम विलम्ब मत करो, शीघ्र चलो। अधिगतमखिल-सखीभिरिदं तव वपुरपि रति-रण-सज्जम्। चण्डि ! रणित-रसना-रव-डिण्डिममभिसर सरसमलज्जम्॥ मुग्धे....॥६॥ अन्वय—[सम्प्रति माधवानुसरणे काञ्च्यादि-भूषणमेव त्वां वाद्यं व्यनक्तीत्याह]—अयि चण्डि (रतिरणप्रवीणे) [न केवलं तव मन एव, परन्तु] तव वपुः (शरीरम्) अपि रतिरणसज्जं (रतिरणे) सुरतसंग्रामे सज्जं (सज्जितं) [इति] अखिलसखीभिः (सहचरीवर्गैः) अधिगतं (परिज्ञातम्) [अन्यथा कथं काञ्च्यादि ग्रहणमति भावः]; [अतः] रणितरसनारवडिण्डिमं (रणिता शब्दिता या रसना काञ्ची तस्याः रवः ध्वनिरेव डिण्डिमः रणवाद्यभेदः यत्र तादृशं यथा तथा) सरसम् (सोत्साहम्) [अतएव] अलज्जं (लज्जाशून्यं यथा तथा) अभिसर (प्रियाभिमुखमनङ्गरङ्गभूमिं याहि) [रणसज्जितस्य विलम्बो भीतिमेव आसञ्जयति इत्यर्थः]॥६॥ अनुवाद—हे रतिरणनिपुणे ! हे चण्डि ! तुम्हारा यह शरीर रति-रण हेतु सुसज्जित हो रहा है। यह विलक्षणता तुम्हारी सखियोंने जान ली है। अतः लज्जाका परित्याग कर मणिमय मेखलाके मनोहर सिञ्जनसे डिण्डिम ध्वनि करती हुई परमोत्साहके साथ अभिसरण हेतु गमन करो। पद्यानुवाद— ज्ञात सखीसे लज्जित कैसे, रति-रण-हित सज्जित है जिससे, किंकिणी मिस बजती है जैसे। मेरे स्मरकी सकल भुवनमें, चल सखि ! चल घनश्याम सदन में ॥