गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४० श्रीगीतगोविन्दम् बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीसे कहती है कि अब क्यों ठसक रही हो, तुम्हारी अभिलाषा तो हदके पार चली गयी है। फिर ठहराव क्यों? श्रीकृष्णके साथ अभिसार करनेमें कैसी लज्जा, तुम्हारी सखियाँ ही हैं, बस यहाँ और कोई नहीं है। व्यर्थ ही क्यों कोप कर रही हो। तुम्हारी सभी सखियोंको यह बात अच्छी तरह मालूम हो गई है कि तुम्हारा शरीर रतिरूप संग्रामके लिए तत्पर है। यह शरीर अलंकारोंसे मण्डित हो रहा है। अर्थात् रति-क्रीड़ा उपयोगी सम्पूर्ण उपादानोंसे विभूषित हो रहा है। युद्धकी वरांगना बनकर तुम प्रस्तुत हो रही हो। ठीक ही तो है जिस तरह युद्धके लिए प्रयाणके समय विविध वाद्य बजाये जाते हैं। उसी तरह जब रति-रणके लिए तुम प्रस्थान करोगी तो उस समय करधनीमें संलग्न घुँघरू बजने लगेंगे। उसी डिण्डिम घोषको करती हुई तुम लाज छोड़कर रसके प्रवाहमें प्रवाहित होकर श्रीहरिके सन्निकट अनुरागके साथ अभिसरण करो। चलो, हे चण्डि ! संकेत स्थलकी ओर उन्मुख हो। रणके लिए उद्यत श्रीराधाके लिए चण्डी विशेषण उचित ही है। स्मर-शर-सुभग-नखेन सखीमवलम्ब्य करेण सलीलम्। चल वलय-क्वणितैरवबोधय हरिमपि निजगतिशीलम् ॥ मुग्धे.... ॥७॥ अन्वय—स्मर-शर-सुभग-नखेन (स्मरस्य कामस्य शराइव सुभगाः शोभना नखा यस्य तादृशेन, तव पञ्च नखा एव सम्मोहनादीनि कामास्त्राणि इतिभावः) करेण (हस्तेन) सलीलं (सविलासं यथा तथा) सखीम् अवलम्ब्य चल (गच्छ) [गत्वाच] वलयक्वणितैः (कङ्कणसिञ्जनैः) निजगतिशीलं (निजगतौ त्वत्प्राप्तौ शीलं समाधिः चित्तैकाग्रतेति यावत् यस्य तादृशं हरिमपि (हरिञ्च) अवबोधय (ज्ञापय, रणाय सावधानं कुरु इति भावः) [समीचीनो योद्धा हि प्रतिभटमवहितं कृत्वैव युध्यते इत्यर्थः] ॥७॥