भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 373, कुल 448 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 373

एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३४१ अनुवाद—तुम्हारे करकमलके रमणीय पञ्चनख रति- रणोपयोगी मदनके पंचबाण स्वरूप हैं। इनसे अपनी सखीका आश्रय करके तुम लीलापूर्वक चलो। प्रख्यात शीलमय श्रीहरिको भी अपने वलयकी क्वणित ध्वनि से अवबोध करा दो। पद्यानुवाद— स्मर-शर-सम नख, कर निज सुन्दर, दे हाथोंमें सखिके सत्वर, खन-खन वलय बजा शैया पर। चल हारे हरि शील दयनमें, चल सखि ! चल घनश्याम सदन में ॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीसे कहती है—हे सुभगे ! तुम्हारे इन कोमल मनोहर हाथोंके नाखून कामदेवके पंच-बाणरूपी पुष्प हैं। इन सुन्दर नखवाले हाथोंसे बड़े हाव-भावपूर्वक सखीका हाथ पकड़कर लीलापूर्वक चलो। ये नख कामके बाणके समान ही बेधक हैं। इस रतिरणमें ये मनोहर नख ही तुम्हारे शस्त्रास्त्र हैं। जिस प्रकार कोई योद्धा अपने प्रतिद्वन्द्वी को सूचित करके ही युद्धमें प्रवृत्त होता है। उसी प्रकार तुम भी अपने हाथोंके कंकणकी ध्वनिसे, अपनी चूड़ियोंकी झंकारसे कामदेवके वशीभूत प्रतीक्षारत श्रीकृष्णको अपने आगमनको जता दो। वे अपनी तैयारीमें लगे हैं, अपने मनकी अभिलाषापूर्ण करना चाहते हैं। उन्हें सूचित करके ही तुम रतिरणमें प्रवृत्त होओ। श्रीजयदेव-भणितमधरीकृत-हारमुदासितरामम्। हरि-विनिहित-मनसामधितिष्ठतु कण्ठतटीमविरामम् ॥ मुग्धे.... ॥८ ॥ अन्वय—अधरीकृतहारं (अधरीकृतः तिरस्कृतः हारः येन तत्; इदमेवगीतं परमं कण्ठभूषणमित्यर्थः) उदासितरामं (उदासिता तिरस्कृता रामा उत्तमा रमणी येन तथाविधं; सुन्दर्या रमण्या