गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४२ श्रीगीतगोविन्दम् अपि सुन्दरतरमित्यर्थः) श्रीजयदेवभणितं (श्रीजयदेवभाषितं) हरि-विनिहित-मनसां (हरौ कृष्णे विनिहितम् अर्पितं मनो येषां तादृशानां कृष्णभक्तानामित्यर्थः कण्ठतटीं (कण्ठदेशं) अविरामम् (निरन्तरम्) अधितिष्ठतु (कृष्णार्पितचित्ताः सततं जयदेवगीतं कीर्त्तयन्तु इति भावः) ॥८॥ अनुवाद—श्रीजयदेव कथित यह गीत भूषण-स्वरूप मनोहर हार तथा मनमोहिनी वराङ्गनाको तिरस्कृत करनेवाला है, जिनका मन श्रीकृष्णके प्रति समर्पित हो गया है, ऐसे भक्तोंके कण्ठमें यह गीत अविरल रूपसे विराजित हो। पद्यानुवाद— श्रीजयदेव कथित यह कविता कण्ठहार हो जिनकी। रहे न इच्छा हार ग्रहण की वामा यौवन धनकी ॥ बालबोधिनी—श्रीजयदेव कवि द्वारा कहा गया यह गीत रत्नोंके हारको तिरस्कृत करनेवाला, युवतियोंको उदासीन बनानेवाले भगवद्भक्तोंके कण्ठमें सदा निवास करे। यह हार अधरीकृत है। जो मुक्तादिसे ग्रथित हारको अवदोलित करनेवाला है। जिन पराशर आदि वैष्णवोंका चित्त भगवानमें लगा हुआ है, वे लोग रत्नोंके हारको नहीं, जयदेव कथित इस हारको धारण करेंगे। वे ही वैष्णव इस गीतको अपने कण्ठसे आलिङ्गित करेंगे—किसी रमणीको नहीं। यह हार इन्हीं वैष्णवोंके गलेमें विराजेगा। हार और रमणी तो सांसारिक रागियोंके गलेको अलंकृत करते हैं, और वे भी सभी अवस्थाओंमें नहीं बल्कि तारुण्यावस्थामें ही। जयदेव कवि कृत यह गीत श्रीहरि विषयक होनेसे भगवद्भक्तोंके कण्ठको सभी अवस्थाओंमें समलंकृत करे। प्रस्तुत अष्टपदीमें शृङ्गार विप्रलम्भ नामक रस है। उत्तम नायक है। श्रीहरितालराजिजलधरविलसित नामका यह बीसवाँ प्रबन्ध सम्पूर्ण हुआ।