गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३४३ सा मां द्रक्ष्यति वक्ष्यति स्मरकथां प्रत्यङ्गमालिङ्गनैः। प्रीतिं यास्यति रंस्यते सखि समागत्येति संचिन्तयन्॥ स त्वां पश्यति वेपते पुलकयत्यानन्दति स्विद्यति। प्रत्युद्गच्छति मूर्च्छति स्थिर तमःपुञ्जे निकुञ्जेप्रियः ॥१॥ अन्वय—[अथ सखी श्रीराधां त्वरितुं श्रीकृष्णस्य अत्युत्कण्ठामाह]—सा (प्रिया मे) समागता मां द्रक्ष्यति; [दृष्ट्वा च] स्मरकथां (प्रेमालापं) वक्ष्यति; [ततश्च] प्रत्यङ्गं (अङ्गे अङ्गे) आलिङ्गनैः प्रीतिं यास्यति (प्राप्स्यति); [प्रीतियुक्ता सती] [मया सह] रंस्यते (विहरिष्यति)—इति चिन्ताकुलः [सन्] अयि सखि, स्थिरतमःपुञ्जे (स्थिरं गाढं तमःपुञ्जं यस्मिन् तादृशे तमाल-वनान्धकार-निविड़े) निकुञ्जे सः [तव] प्रियः (श्रीकृष्णः) त्वां पश्यति (स्वहृदये त्वामेव निरीक्षते) [दृष्ट्वाच] वेपते (स्मरावेशेन कम्पते) पुलकयति (तत्तत्स्मरणात् सञ्जातरोमाञ्चो भवति) [तव सुरतप्राप्त्याशया] आनन्दति; स्विद्यति (त्वच्चिन्तया घर्माक्तो भवति) [सैषा प्रिया मे आगतेति सम्भाव्य] प्रत्युद्गच्छति [ततश्च] मूर्च्छति ॥१॥ अनुवाद—हे सखि! तुम्हारे प्रियतम श्रीकृष्ण निकुञ्जमें निविड़ अंधकारसे आवृत्त हो चिन्तातुर हो रहे हैं कि श्रीराधा कब आकर मुझे प्रीतिपूर्ण नेत्रोंसे देखेगी। मदन-अभिलाषा सूचक रसपूर्ण बातें कहेगी। अङ्ग-प्रत्यङ्गका आलिङ्गन कर प्रसन्न होगी, रमण करेगी। इस प्रकार आपको प्रत्यक्षकी भाँति देख रहे हैं, आवेशमें कम्पित हो रहे हैं, विपुल पुलक और असीम आनन्दसे उत्फुल्ल हो रहे हैं। पसीनेसे परिप्लुत हो रहे हैं, तुम्हें आया जान उठकर खड़े हो रहे हैं और प्रबल आनन्दावेशसे मूर्च्छित हो रहे हैं। पद्यानुवाद— स्थिरतम पुंजे वेतस कुंजे चिन्तातुर हरि राधे। “वह देखेगी मुझे कहेगी स्मरवणी भुज बाँधे॥