भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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३४४ श्रीगीतगोविन्दम् चाहेगी क्रीडारत होगी" कह यों भ्रममें भूले। तुझे देखते कँपते-हँसते रोते गिर हिय हूले ॥ बालबोधिनी—सखी कह रही है—राधे ! श्रीहरि सघन अंधकारमें बैठे हुए हैं। उस निकुंजमें अति विचित्र राग-अनुरागमय क्रिया-कलाप कर रहे हैं। उमड़-उमड़ कर शृङ्गारिक चेष्टाएँ कर रहे हैं। उस लताकुंजमें अति चिन्ताकुल होकर सोच रहे हैं। सोच-सोचकर विलस रहे हैं—राधा मुझे देखेगी। मेरे साथ मधुर-मदिर उन्मादमयी रसीली बातें करेगी। मेरे अंग-अंगका आलिंगन कर प्रसन्न हो जायेगी। तदनन्तर मेरे साथ रतिक्रीड़ा हेतु उद्यत होगी। इस प्रकार अनेकों मनोरथोंसे उल्लसित होकर हुलस रहे हैं। श्रीकृष्ण आपको ध्यानमें देखते हैं। आपका अवलोकन कर सिहर उठते हैं, पुलकायमान हो जाते हैं। स्वप्निल समागम रस मुखकी अनुभूति करने लगते हैं। रतिकेलि क्रम विकासमें उमगते हुए स्वेदपूर्ण हो जाते हैं। भाव-स्वप्नमें तुमको देखकर उठ खड़े होते हैं और यथार्थमें तुम्हें न देखकर मूर्च्छित हो जाते हैं। प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूल विक्रीड़ित छन्द, दीपक अलंकार एवं अष्ट सात्त्विक विभाग हैं— (१) स्तम्भ तथा वैवर्ण्य—निविड़ अन्धकारमें शृङ्गारिक चेष्टाएँ तथा चिन्ताकुल होकर श्रीराधाको दूर-दूर तक देखना। (२) वेपथु तथा रोमाञ्च—सुप्तभावमें श्रीराधाका कामकेलि वर्द्धक वार्तालापका चिन्तन कर काँपना एवं पुलकित होना। (३) अश्रु तथा स्वेद—कल्पनामें श्रीराधा द्वारा प्रत्येक अंग-आलिङ्गनके आनन्दकी अनुभूति करना और रतिक्रम विकासमें पसीनेसे तर होना। (४) स्वरभङ्ग तथा प्रलय—रमण हेतु श्रीराधाको बुलानेमें असमर्थ होना और श्रीराधाके न मिलने पर मूर्च्छित हो जाना।