भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३४५ अक्ष्णोर्निक्षिपदञ्जनं श्रवणयोस्तापिच्छ गुच्छावलीं। मूर्द्धिन् श्यामसरोजदामकुचयोः कस्तूरिका-पत्रकम् ॥ धूर्त्तानामभिसार-सत्वर-हृदां विष्वङ्निकुञ्जे सखि। ध्वान्तं नील-निचोल-चारु सुदृशां प्रत्यङ्गमालिङ्गति ॥२ ॥ अन्वय—[अथान्धकारे अभिसारोचितवेषोपकरणमपि एतदेवेत्याह]—अयि सखि निकुञ्जे विष्वक् (सर्वतोव्यापि) नीलनिचोलचारु (नीलनिचोलादपि चारु मनोज्ञं; सर्वाङ्गावरकत्वेन आलिङ्गनमुत्प्रेक्षितम्) ध्वान्तं (तमः) धूर्त्तानाम् (परवञ्चकानाम्) अभिसार-सत्वर-हृदां (अभिसारे सत्वरं त्वरान्वितं हृत् हृदयं यासां तथाभूतानां); [परवञ्चकतया कदाचित् सत्वरम् अभिसरेत् इत्यतो विलम्बो न कार्य इति भावः] सुदृशां (सुलोचनानां रमणीनां) अक्ष्णोः (नेत्रयोः) अञ्जनं (कज्जलं) श्रवणयोः (कर्णयोः) तापितच्छ-गुच्छावलीं (तापिच्छानां तमालानां गुच्छावलीं कुसुमस्तवकश्रेणीं कर्णभूषण भूतामित्यर्थः) मूर्द्धनि (शिरसि) श्याम-सरोज-दाम (नीलोत्पलरचितां मालां) [तथा] कुचयोः (स्तनयोः) कस्तूरिकापत्रकं (मृगनाभि रचित पत्र-भङ्ग-लेखां) निक्षिपत् (दूरं प्रेरयत्; स्वयं तत्तद्रूपेण परिणमदिति भावः) प्रत्यङ्गं (अङ्गे अङ्गे) आलिङ्गति (प्रियाभिसारानुकूल्येन सुखं ददातीत्यर्थः) ॥२॥ अनुवाद—हे सखि! देखो, निकुंजमें चारों ओर घिरा हुआ अंधकार अभिसारमें चंचलमना सुनयना कामिनियोंका अञ्जन है, कानोंमें तमालकी गुच्छावली है, मस्तक पर विराजित श्याम-कमलकी माला है, कुच-कुम्भमें विरचित कस्तूरिका चित्र बना है। रमणीयतर रूपसे आवृत्त यह अंधकार नीले वसनसे भी मनोहरतर आवरण रूपमें धूर्तोंके साथ अभिसारके उत्साहसे युक्त रमणियोंके प्रत्येक अङ्ग-प्रत्यङ्गको कैसे आलिङ्गित कर रहा है ॥२ ॥ बालबोधिनी—सखी कह रही है—राधे! श्याम सघन केलि-कुंजमें बैठे हैं, जहाँ सारे संसारका अंधकार मानो वहीं