गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३४५ अक्ष्णोर्निक्षिपदञ्जनं श्रवणयोस्तापिच्छ गुच्छावलीं। मूर्द्धिन् श्यामसरोजदामकुचयोः कस्तूरिका-पत्रकम् ॥ धूर्त्तानामभिसार-सत्वर-हृदां विष्वङ्निकुञ्जे सखि। ध्वान्तं नील-निचोल-चारु सुदृशां प्रत्यङ्गमालिङ्गति ॥२ ॥ अन्वय—[अथान्धकारे अभिसारोचितवेषोपकरणमपि एतदेवेत्याह]—अयि सखि निकुञ्जे विष्वक् (सर्वतोव्यापि) नीलनिचोलचारु (नीलनिचोलादपि चारु मनोज्ञं; सर्वाङ्गावरकत्वेन आलिङ्गनमुत्प्रेक्षितम्) ध्वान्तं (तमः) धूर्त्तानाम् (परवञ्चकानाम्) अभिसार-सत्वर-हृदां (अभिसारे सत्वरं त्वरान्वितं हृत् हृदयं यासां तथाभूतानां); [परवञ्चकतया कदाचित् सत्वरम् अभिसरेत् इत्यतो विलम्बो न कार्य इति भावः] सुदृशां (सुलोचनानां रमणीनां) अक्ष्णोः (नेत्रयोः) अञ्जनं (कज्जलं) श्रवणयोः (कर्णयोः) तापितच्छ-गुच्छावलीं (तापिच्छानां तमालानां गुच्छावलीं कुसुमस्तवकश्रेणीं कर्णभूषण भूतामित्यर्थः) मूर्द्धनि (शिरसि) श्याम-सरोज-दाम (नीलोत्पलरचितां मालां) [तथा] कुचयोः (स्तनयोः) कस्तूरिकापत्रकं (मृगनाभि रचित पत्र-भङ्ग-लेखां) निक्षिपत् (दूरं प्रेरयत्; स्वयं तत्तद्रूपेण परिणमदिति भावः) प्रत्यङ्गं (अङ्गे अङ्गे) आलिङ्गति (प्रियाभिसारानुकूल्येन सुखं ददातीत्यर्थः) ॥२॥ अनुवाद—हे सखि! देखो, निकुंजमें चारों ओर घिरा हुआ अंधकार अभिसारमें चंचलमना सुनयना कामिनियोंका अञ्जन है, कानोंमें तमालकी गुच्छावली है, मस्तक पर विराजित श्याम-कमलकी माला है, कुच-कुम्भमें विरचित कस्तूरिका चित्र बना है। रमणीयतर रूपसे आवृत्त यह अंधकार नीले वसनसे भी मनोहरतर आवरण रूपमें धूर्तोंके साथ अभिसारके उत्साहसे युक्त रमणियोंके प्रत्येक अङ्ग-प्रत्यङ्गको कैसे आलिङ्गित कर रहा है ॥२ ॥ बालबोधिनी—सखी कह रही है—राधे! श्याम सघन केलि-कुंजमें बैठे हैं, जहाँ सारे संसारका अंधकार मानो वहीं
३४६ श्रीगीतगोविन्दम् सिमट गया हो। कितनी उत्कण्ठा है उन्हें, कितनी आकुलता है और कितनी बेबसी, अब विलम्ब मत करो। रात्रिकालमें अभिसारिकाओंके लिए अंधकार उत्तम नीले वस्त्रोंके प्रिय मिलन हेतु हलन-चलन-गमनको कोई भी तो नहीं जान पाता। नील वर्णवत् यह अंधकार भी नील वर्ण होनेके कारण अभिसारिकाओंको अति प्रिय होता है। यह अंधकार ही धूर्त नायकोंके साथ अभिसारकी तथा रमणकी इच्छा रखनेवाली नायिकाओंका चारों ओरसे आलिङ्गन करता है, निकुंजोंमें धूर्तोंके साथ रमणकी महा उत्कण्ठा उद्भूत कर देता है। यही अंधकार उन अभिसारिकाओंका अञ्जन है। कानोंमें कृष्णवर्णका मयूर-पिच्छ-पुच्छ कर्णाभिराम है और तमालपत्रका काम भी यही करता है। उन नायिकाओंके हृदयोंमें नील कमलोंका हार है और कुचोंपर कस्तूरीके रसकी चित्र-रचना है। इस प्रकार यह नील वर्णका अंधकार आपके प्रत्येक अंगका आलिङ्गन करते हुए आपको अलंकरण प्रदान कर अलंकृत कर रहा है। अतः संकेत स्थलके उपयुक्त आभूषणोंको धारण कर गाढ़ अंधकारमें ही आप चलें, विलम्ब न करें। हर एक मुरमुटमें अत्यन्त चतुर रसिकोंके अभिसारके लिए पूरा वातावरण अनुकूल है। यह रात ही नील वसन है अपने निस्सीम विस्तारमें अंग-अंगको लपेटी सी है। चलो-शीघ्र चलो। कहीं विपक्ष आदिकी अन्य अभिसारका वहाँ अभिसार न करले उससे पूर्व ही तुम्हें वहाँ उपस्थित हो जाना चाहिए। इस समय नेत्रोंमें काजल; कानोंमें कर्णभूषण, गलेमें हार, कुचोंपर कस्तूरीपत्र-भङ्ग रचना आदिकी आवश्यकता नहीं। शीघ्र चलो॥२॥ काश्मीर-गौर-वपुषामभिसारिकाणा- माबद्ध-रेखमभितो रुचिमञ्जरीभिः। एतत्तमालदल-नील-तमं तमिस्रं तत्प्रेम-हेम-निकषोपलतां तनोति॥३॥
एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३४७ अन्वय—[किञ्च प्रेमपरीक्षण-कारणमप्येतदेवेत्याह]—एतत् तमाल-दल-नीलतमं (तमालदलवत् नीलतमम् अतिनीलम्; एतेन अन्धकारस्य निविड़ता प्रतिपादिता तमालवन-विहारश्च) तमिस्रं (तिमिरं) काश्मीर-गौर-वपुषाम् (काश्मीरं कुङ्कुमं; काश्मीरगौरवत् गौरं वपुः शरीरं यासां तासाम्) अभिसारिकाणां (कान्तसङ्केतं गच्छन्तीनां नारीणां) रुचिमञ्जरीभिः (लावण्यकिरणैः) अभितः (सर्वतः) आवद्धरेखं (संलग्नरेखं सत्) तत्प्रेम-हेम- निकषोपलतां (तासां प्रेम एव हेम काञ्चनं तस्य निकषोपलतां परीक्षापाषाणतां कष्टि पाथर इति भाषा) तनोति (विस्तारयति; तद्वत् शोभते) [यथा निकष-पाषाणे सुवर्णशुद्धि-जिज्ञासा, तथा तासां घनान्धकारे निःसाध्वसतया गमनेऽपि जिज्ञासा इति भावः] ॥३॥ अनुवाद—निकुञ्जमें सर्वत्र प्रसरित तमाल वृक्षके पत्र सदृश नीलतम, यह निविड़ अन्धकार कुङ्कुमकी भाँति सुवर्ण-वर्णा गौर देहमयी अभिसारिका नायिकाओंके रमणीय आलोकरूपी मञ्जरीके रूपमें इस प्रकार प्रतीयमान हो रहा है, मानो श्रीकृष्णके प्रेम रूप स्वर्णकी निकष (पाषाण) हो। बालबोधिनी—सखी कह रही हैं—हे प्रिये ! केसरकी कांतिके समान शरीरवाली अभिसारिकाओंके लिए मणिमञ्जरियोंसे चारों ओर रेखांकित हो तमालपत्रोंके समान अत्यन्त नीला यह अन्धकार प्रेमरूपी स्वर्णकी कसौटी है। यह अन्धकार कसौटीका प्रस्तर बन स्वयंको प्रस्तुत कर रहा है। इसी अन्धकार निकषपर सुन्दरियोंका इन केसरदल सरीखी रमणी-बालाओंके प्रेमका सोना परखा जायेगा। सोनेका रंग ही कसौटी पर परखा जाता है। कसौटीका रंग सोनेपर नहीं चढ़ता। श्रीराधा तुम और यह अन्धकार मानो सुवर्णपट्टिकाके ऊपर नीली-नीली कसौटी है न कि प्रेम स्वर्णके ऊपर कसौटी—अब शीघ्र अति शीघ्र अभिसरण स्थलपर चलो। प्रस्तुत पदमें उपमा अलंकार तथा वसन्ततिलका छंद है।
३४८ श्रीगीतगोविन्दम् हारावली-तरल-काञ्चन-काञ्चि-दाम मञ्जीर-कङ्कण-मणि-द्युति-दीपितस्य। द्वारे निकुञ्ज-निलयस्य हरिं विलोक्य व्रीडावतीमथ सखीमियमित्यवाच ॥४॥ अन्वय—अथ इयं (सखी) हारावली-तरल-काञ्चन- काञ्चिदाम-मञ्जीर-कङ्कण-मणिद्युति-दीपितस्य (हारावल्याः तरलानां मध्यगानां मणीनां) (धुकधुकी इति भाषा) तथा काञ्चन-काञ्चिदाम्नोः मञ्जीरयोः कञ्चणयोश्च मणीनां राधा- परिहितानामिति शेषः द्युतिभिः किरणैः दीपितस्य (प्रोज्ज्वलीकृतस्य) निकुञ्ज-निलयस्य (लतागृहस्य) द्वारे [अत्युत्सुकं] हरिं विलोक्य व्रीड़ावर्ती (रन्तु मुद्यतामपि लज्जया तत्पार्श्वमभजमानां) सखीम् (राधाम्) इति (वक्ष्यमाणं वचनं) निजगाद ॥४॥ अनुवाद—हारोंके मध्यमें विराजित धुकधुकी (मणि) से सुवर्णमयी काञ्ची (करधनी) से कुण्डलों तथा कंकणोंमें संलग्ना मणियोंकी कान्तिसे निकुञ्जवन समुद्भासित हो गया, वहाँ केलिगृह द्वार पर विद्यमान श्रीहरिको देखकर श्रीराधा लज्जावती हो गई, तभी सखी श्रीराधासे कहने लगी— बालबोधिनी—लजायी-सी श्रीराधा सखीके प्रोत्साहित करने पर जब निकुंज गृहमैं पहुँचती है तो श्रीहरिको वहाँ विद्यमान देखकर और भी लज्जित हो जाती है। निकुञ्ज द्वार उनके आभूषणकी कान्तिसे उनके मुक्ताहारकी उज्ज्वलतासे, उनकी सोनेकी करधनीकी दीप्तिसे, उनके पुखराज और कानकी मणियोंकी द्युतिसे दीपित हो उठता है। उसी आलोकमें उसे प्रतीक्षारत श्रीकृष्ण दीख जाते हैं—देखते ही लाजसे भर जाती है। उचित ही तो है कामवती युवतियोंके प्रथम सङ्गममें लज्जा किसी कामातिशयताका ही विधान करती है। अब सखि उन्हें आगे पैर रखनेके लिए अनुरोध करती है। प्रस्तुत पदमें वसन्ततिलका छंद है।
एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३४९ गीतम् ॥२१॥ वराडीरागरूपकतालाभ्यां गीयते। मञ्जुतर-कुञ्जतल-केलिसदने। विलस रतिरभसहसितवदने! ॥१॥ प्रविश राधे! माधवसमीपमिह।ध्रुवपदम्। अन्वय—रति-रभस-हसित-वदने (रतिरभसेन सुरतोत्साहेन हसितं सहास्यं वदनं यस्याः, अयि तादृशि; तव उच्छलितं मनः अत्युत्सुकतया हास्यमिषेण प्रियमिलनाय बहिर्निर्गतमितिभावः) अयि राधे, इह मञ्जुतर-कुञ्जतल-केलिसदने (मञ्जुतरम् अतिमनोहरं कुञ्जतलं कुञ्जाभ्यन्तरमेव केलिसदनं तत्र) माधव-समीपं प्रविश [ततः] विलस (विहर) ॥१॥ अनुवाद—हे राधे! तुम्हारा वदन रतिजन्य उत्साहसे अतिशय रसके साथ उत्फुल्लित हो रहा है, तुम इस मनोहर निकुञ्जके केलिगृहमें प्रवेश करो और माधवके समीप जाकर उनके साथ विलास करो। पद्यानुवाद— चल राधा! प्रिय ढिग उपवनमें— मंजु कुंजतल अति मनभावन। विहँस विलस रति केलि-सदनमें चल राधा! पिय-ढिग उपवनमें॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधासे कहती है—रतिक्रीड़ाके उत्साहसे प्रसन्नमुखवाली हे राधिके! अब तो प्रेमके आवेगमें तुम मुस्कराकर हर्षित हो रही हो, इस मनोहर झुरमुटके बीचमें ही केलिगृह बना हुआ है, उसी क्रीड़ागृहमें जाइए और माधवके समीप जाकर उनके साथ रमण कीजिए। नव-भवदशोक-दल-शयन-सारे विलस कुचकलशतरल हारे! प्रविश.... ॥२॥
३५० श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—[नहि मे मनः उच्छलितम् अस्य तव नागरस्य वैकल्यमाकलय्य मद्भवदनं हसतीति चेत् तत्राह]—कुच-कलस- तरल-हारे (कुचकलसयोः स्तनकुम्भयोः तरलः कम्पवशात् चञ्चलः हारः यस्याः, अयि तादृशि) [राधे] [कुचकलसकम्पेन अन्तर्वृत्तिर्व्यक्ता अतो वाम्यं न युक्तमितिभावः] नव-भवदशोक- दल-शयनसारे [नवभवद्भिः तरुणैः अशोकदलै रचितं शयनसारं शयनश्रेष्ठं यत्र तादृशे) इह [केलिसदने] माधव-समीपं प्रविश [ततश्च] विलस (विहर) ॥२॥ पद्यानुवाद— नवल अशोक-दलोंकी मृदुतर, शैया झलक रही है मनहर। अनुवाद—प्रिय समागम सूचक कम्पनमय कुचकलशोंमें विराजित चञ्चल हारवाली राधे! नूतनोद्भव अशोक-पत्रोंमें विरचित शय्यापर तुम प्रवेश करो और माधवके समीप जाकर उनके साथ विलास करो। बालबोधिनी—सखी कहती है—कलश सरीखे स्तनोंपर चञ्चल मुक्ताहार धारण करनेवाली राधे! तुम्हारा यह चञ्चल हार संकेत कर रहा है कि तुम भी रतिचपल हो। तुम्हारे लिए यह किसलय शय्या नवीन अशोक पत्तोंसे रचाई गई है। जाओ, इस सुसज्जित शय्या पर विलसो। कुसुमचय-रचित-शुचि-वासगेहे। विलस कुसुम-सुकुमार-देहे॥ प्रविश....॥३॥ अन्वय—अयि कुसुम-सुकुमार-देहे (कुसुमेभ्योऽपि सुकुमारः कोमलः देहः यस्याः तादृशि) राधे कुसुमचय-रचित-शुचिवास-गेहे (कुसुमचयेन पुष्पसमूहेन रचितं शुचेः शृङ्गारस्य वासगेहं यत्र तस्मिन्; निकुञ्जस्याभ्यन्तरे पुष्पगृहरचनाविशेष इति न पौनरुक्त्यम्) इह (केलिसदने) माधवसमीपं प्रविश [ततश्च] विलस (विहर)। [निकुञ्जगृहद्वारगतः प्रियस्त्वां प्रतीक्षते; अतो वाम्यं न युक्तमितिभावः] ॥३॥
एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३५१ अनुवाद—कुसुमसे भी मनोहर सुकुमार देह श्रीराधे ! कुसुम-समूहसे सुसज्जित पवित्र केलि-वास-भवनमें तुम प्रवेश करो और माधवके समीप जाकर उनके साथ विलास करो। पद्यानुवाद— तरल हार धर विलस उरज पर— विविध सुमनसे सजे भवनमें चल राधा! पिय-ढिग उपवनमें। बालबोधिनी—सखी कहती है—तुम्हारा शरीर फूलोंसे भी अति सुकुमार है और यह पूराका पूरा केलिमण्डप चयन किये गये फूलोंसे रचा गया है और उन फूलोंकी चमकसे उद्दीप्त हो रहा है, अतएव इस पवित्र शयनगृहमें जाओ और श्रीकृष्णके साथ आमोद करो। चलो, निर्भय प्रवेश करो, यह तुम्हारा ही घर है। मृदुचल-मलय-पवन-सुरभि-शीते। विलस मदन-शर-निकर-भीते ॥ प्रविश.... ॥४॥ विलस रसलविलसितगीते—यह पाठ भी मिलता है। अन्वय—[अथ उद्दीपनाय अतिशयेन केलिसदनमेव वर्णयति]—रति-वलित-ललित-गीते (रतौ वलितं रतियोग्यं ललितं मनोहरं गीतं यस्याम् अयि तादृशि) राधे चल-मलयवन-पवन-सुरभि-शीते (चलेन मलयवन-पवनेन सुरभि च तत् शीतं शीतलञ्च यत् तस्मिन्) इह (केलिसदने) माधवसमीपं प्रविश [ततश्च] विलस (विहर) ॥४॥ अनुवाद—मदनके बाण-समूहसे भयभीत राधे ! तुम रतिरस सम्बन्धीय सुललित गीत गा रही हो, तुम कोमल तथा चञ्चल मलय-पवनसे प्रवाहित सुरभित तथा सुशीतल लता-केलि-गृहमें प्रवेश करो और माधवके समीप जाकर उनके साथ विलास करो।
३५२ श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— मलय वायु यह 'मह मह' बहती, हुलस मदन-शर भीते! कहती, बालबोधिनी—सखी कहती है—राधे! तुम मदनके बाणसमूहसे भयभीत हो गई हो। अतः तुम इस शृङ्गारगृहमें प्रवेश करो। इसमें मलय पर्वतकी दखिनइया बयार झिर-झिर बह रही है। पुष्पोंके मध्यभागसे आनेके कारण मृदुल स्पर्शवाली यह वायु लताकुञ्जको और भी सुरभित एवं शीतल बना रही है। जाओ इस प्रेम मन्दिरमें जाकर श्रीकृष्णके साथ विहार करो, यह तो तुम्हारे भीतरके रसको प्राणोंके द्वारा गीतोंमें मुखरित करनेका क्षण आया है, गाओ, प्रेमके उन्मादित गीत गाओ। वितत-बहु-वल्लि-नव-पल्लव-घने विलस चिरमलस-पीनजघने ! प्रविश.... ॥५॥ अन्वय—अयि अलस-पीन-जघने (अलसञ्च पीनञ्च जघनं यस्याः तादृशि) राधे वितत-बहु-वल्लि-नव-पल्लव-घने (विततानां विस्तृतानां बहुवल्लीनां नवैः पल्लवैः घने निविड़े) इह (केलिसदने) माधवसमीपं प्रविश [ततश्च] चिरं विलस [ईदृग्जघनं सफलं कुरु इत्यर्थः] ॥५॥ अनुवाद—पीन जघन गुरु भारसे सुमन्द अलस गतिका सम्पादन करनेवाली श्रीराधे! सुविस्तृत लताओंके नवीन पल्लवोंके द्वारा निविड़तर रूपसे आच्छादित इस लता-केलि निभृत निकुंजमें प्रवेश करो और माधवके समीप जाकर उनके साथ विलास करो। पद्यानुवाद— बहुवल्ली पल्लव नव छादित, विलस अरी चिर कुंज रमणमें। चल राधा! पिय-ठिग उपवनमें॥
एकादशः सर्गः - सामोद-दामोदरः ३५३ बालबोधिनी - सखी कहती है - राधे! तुम्हारी जाँघें आलस्ययुक्त एवं स्थूल हैं और यह निकुंज भी अति विस्तृत विविध लताओंसे एवं पल्लवोंसे रचित है, इन लताओंसे और भी नये-नये पल्लव प्रस्फुटित हुए हैं जिनसे यह लतानिकुञ्ज और भी अधिक घना हो गया है। अतः इस कोमल-पत्र-कुंजमें अपने प्रियतम श्रीकृष्णके साथ चिरकाल पर्यन्त विलास करती रहो। मधु-मुदित-मधुपकुल-कलित-रावे। विलस मदन-रस-सरस-भावे ॥ प्रविश....॥६॥ अन्वय - अयि मदन-रस-सरस-भावे (मदनरसेन शृङ्गाररसेन सरसभावः सारस्यं यस्याः अयि तादृशि) [ईदृग्विधायास्ते तन्निकटप्रवेश एव योग्यः] राधे मधुमुदित-मधुप-कुल-कलित-रावे (मधुना मकरन्देन मुदितं मत्तं मधुपकुलं भ्रमरवृन्दं तेन कलितः विहितः रावः गुञ्जनं यत्र तस्मिन्) इह (केलिसदने) माधवसमीपं प्रविश [ततश्च] विलस ॥६॥ अनुवाद - मदन-रससे सरस अनुरागमयी राधे! मधुपानमें प्रमत्त भ्रमरोंके कलनादसे निनादित निकुञ्ज-गृहमें प्रवेश करो और माधवके समीप जाकर उनके साथ विलास करो। पद्यानुवाद- गीत भ्रमर मद-माते गाते, 'सरस भाव' जन-हृदय जगाते- बालबोधिनी - सखी कहती है- हे राधे! कामदेवके उद्वेगसे उत्पन्न शृङ्गार-रसमें तुम भावमयी हो गयी हो। वसन्तमें परम आनन्द पानेवाले, पुष्परसके आस्वादनसे आनन्दपूर्वक गुंजार करनेवाले मधुमत्त भौंरोके झुण्डवाले लताभवनमें प्रवेश कर प्रेमरसका आस्वादन करो। यह एक बहुत बड़े आनन्दकी भूमिका है, प्रणय-मिलनका मंगल मुखरण है- चलो, इसमें प्रवेश करो।
३५४ श्रीगीतगोविन्दम् मधुरतर-पिक-निकर-निनद-मुखरे । विलस दशन-रुचि-रुचिर-शिखरे ॥ प्रविश.... ॥७॥ अन्वय—अयि दशन-रुचि रुचिर-शिखरे (दशना दन्ता एव रुच्या कान्त्या रुचिराणि मनोज्ञानि शिखराणि माणिक्यविशेषाः यस्याः अयि तादृशि; पक्वदाड़िमबीजाभं माणिक्यं शिखरं विदुः इति हारावली; ईदृग्दशनायास्तत्क्रियाविशेषकृत्यमेव योग्यमिति भावः) राधे मधुरतर-पिक-निकर-निनद-मुखरे (मधुरतरैः निरतिशय-श्रुति-सुखकरैः पिकनिकराणां कोकिलवृन्दानां निनदैः कूजनैः मुखरे शब्दिते) इह (केलिसदने) माधवसमीपं प्रविश [ततश्च] विलस (विहर) ॥७॥ अनुवाद—सुपक्व दाड़िम (अनार) के बीज एवं शिखर नामक मुक्ताओंके समान दशन पंक्तिमयी राधे ! कोकिलनिकरके मधुरतर कूजन-कलापसे मुखरित लता-वास-गृहमें तुम प्रवेश करो और माधवके समीप जाकर उनके साथ विलास करो। पद्यानुवाद— 'विलसो' भर आनन्द स्वरोंमें— कूक रही कोकिल मधुवनमें। चल राधा ! पिय ढिग उपवनमें ॥ बालबोधिनी—सखी कहती है—हे दशनकी दीप्तिसे शोभायमान शिखर-मणिमयी राधे ! कोकिलाओंकी अत्यन्त मधुर काकलीसे गुञ्जायमान इस लता-निकुंजमें प्रवेशकर श्रीकृष्णके साथ विहार करो। लताओंसे सघन इस केलिगृहमें श्रीहरिके साथ मनभर विलसो, देर-देर तक विलसो। विहित-पद्मावती-सुख-समाजे। कुरु मुरारे! मङ्गलशतानि। भणति जयदेव-कविराज-राजे॥ प्रविश.... ॥८॥
एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३५५ अन्वय—हे मुरारे विहित-पद्मावती-सुख-समाजे (त्वल्लीला- वर्णनेन विहितः कृतः पद्मावत्या श्रीराधायाः स्वपत्न्या वा सुखसमाजः सुखसन्ततिः येन तस्मिन् पद्मावती-सुखसम्पादके इत्यर्थः) भणति (तद्रसं कीर्त्तयति) जयदेव-कविराजराजे (निजेष्टदेवोपासनाया नित्यत्व-सर्वोत्तमत्वनिश्चयावेशेन आत्मानं बहुमन्यमानस्य कविराज-राज इति प्रौढोक्तिरियं) मङ्गलशतानि (प्रभूतानि मङ्गलानि) कुरु (विधेहि)॥८॥ अनुवाद—कविकुलाधिराज कवि जयदेवके द्वारा श्रीराधाके विविध आनन्द-प्रसादनके लिए इस स्तुतिपरक गीतिकी रचना की गयी है। हे कृष्ण! आप इसका श्रवण कर प्रसन्न होवें और इस जगतका अनन्तान्त मङ्गल-विधान करें। बालबोधिनी—कवि जयदेव इस अष्टपदीको श्रीहरि चरणोंमें समर्पित करते हुए कहते हैं—हे मुरारे! जयदेव कविराजके इस गीतको श्रवणकर आप सबका हजारों प्रकारसे मङ्गल विधान करें। लक्ष्मीजीका एक नाम पद्मावती है, जयदेवकी पत्नीका नाम भी पद्मावती है। पद्मावतीके आराधक हैं जयदेव जो कविराजोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं। अतः कविराजवर श्रीहरिसे प्रार्थना करते हैं—हे मुरारे! मैंने प्रासादके अन्तरमें पद्मावतीकी प्रतिष्ठा की है, आपकी प्रसन्नताके लिए यह कविता की है, आप प्रसन्न होवें और हमारा शतशः मङ्गल करें। अथवा श्रीजयदेव स्वयं श्रीराधासे अनुरोध कर रहे हैं—जो लक्ष्मीकी सारी सम्पदा, सारा सुख लेकर आज उपस्थित हैं, आप उन मुरारिके लिए सौ-सौ प्रकारके मङ्गल विधान करें। उनका मङ्गल तुम्हारे साथ रमण ही है। त्वां चित्तेन चिरं वहन्नयमतिश्रान्तो भृशं तापितः कन्दर्पेण च पातुमिच्छति सुधा-सम्बाध-विम्बाधरम्। अस्याङ्कं तदलङ्कुरु क्षणमिह भ्रूक्षेप-लक्ष्मीलव- क्रीते दास इवोपसेवित-पदाम्भोजे कुतः सम्भ्रमः॥१॥
३५६ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—[अथ सखी तस्याः प्रसाद्मालक्ष्य कौतुकेन सनन्मर्माह]—[सखि] चित्तेन (मनसा) त्वां चिरं वहन् (धारयन्) [तव पीनस्तन-श्रोणी-गुरुभारेण] अतिश्रान्तः, कन्दर्पेण भृशं (अत्यर्थं) तापितश्च; [अतएव श्रमेण तापने च पिपासितः] अयं (श्रीकृष्णः) [तव] सुधासम्बाधम् (सुधया अमृतेन सम्बाधं सङ्कटं व्याप्तमिति यावत्) विम्बाधरं पातुम् इच्छति; तत् (तस्मात्) अस्य अङ्गं (क्रोड्) क्षणम् अलङ्कुरु (शोभय) अन्तस्थितायाः बहिःस्थितस्य पानानुपपत्तेरिति भावः]। [ननु अविदित चित्तस्य अङ्गप्रवेशे मन्मनः सङ्कुचित इतिचेत् तत्राह]— भ्रूक्षेप-लक्ष्मी-लव-क्रीते (भ्रुवोः क्षेपः चालनं स एव लक्ष्मीः ऋद्धिः तस्या लवेन लेशेन क्रीते) [अतएव] उपसेवित-पदाम्भोजे (उपसेवितं पदाम्भोजं पादपद्मं येन तादृशे) दासे इव [अस्मिन् श्रीकृष्णो] सम्भ्रमः (सङ्कोचः) कुतः [अल्पमूल्यक्रीते दासे इव क्रयक्रीते शङ्का न युक्ता, क्रीतस्यैव सेवोपयोगादितिभावः]॥१॥ अनुवाद—हे सुन्दरि ! तुम्हारे सामने अवस्थित अनङ्गतापसे सन्तप्त श्रीकृष्ण दीर्घकालसे तुमको मन-ही-मन धारण किये हुए अतिशय क्लान्त हो गये हैं, वे तुम्हारे बिम्बसम अधरकी मधुर सुधाका पान करनेके लिए लोलुप हो रहे हैं, तुम अभिलाषी प्रियके अङ्कको अलंकृत करो। वे तुम्हारे कटाक्षरूप विपुल वैभवके कणमात्रके क्षण-भर पान करनेके लिए चिरकृतज्ञ हो रहे हैं, उस कटाक्ष-विक्षेपरूपी मूल्यके द्वारा क्रीतदासकी भाँति तुम्हारे पदारविन्दके सेवक हो गये हैं, फिर सम्भ्रम क्यों? कैसी घबराहट ? बालबोधिनी—सखी श्रीराधासे कहती है—हे राधे ! आपको चिरकाल तक हृदयमें धारण करनेके कारण श्रीहरि श्रान्त-क्लान्त हो गये हैं, अन्दर-ही-अन्दर अभितप्त हो गये हैं, कामदेवने इन्हें अत्यन्त सन्तप्त कर दिया है, आपके सुधारससे परिपूर्ण कुन्दरु फलके सदृश अरुण अधरोंकी मधुराईका पान करना चाहते हैं। इसलिए हे प्रिये! अपने इन अभिलाषी प्रियके
एकादशः सर्गः-सामोद-दामोदरः ३५७ अंगोंकी शोभा बनिये ! एक क्षणके लिए ही कटाक्ष विक्षेप कर तुमने इन्हें अपना क्रीतदास बना लिया है। तुम्हारे चरणोंकी सेवा करनेवाले श्रीकृष्णके अंकको समलंकृत करो, बिना संकोचके उनके वक्षःस्थलको अलंकृत करो। इसमें कैसी लज्जा, कैसा भाव और कैसी हिचक ? प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूलविक्रीडित छन्द तथा रूपक एवं उत्प्रेक्षा अलंकार है। सा ससाध्वस-सानन्दं गोविन्दे लोललोचना। सिञ्जान-मञ्जु-मञ्जीरं प्रविवेश निवेशनम् ॥२॥ इति एकविंशः सन्दर्भः। अन्वय-गोविन्दे (श्रीहरौ) लोल-लोचना (लोले सतृष्णे लोचने यस्याः सा) सा (राधा) शिञ्जानमञ्जुमञ्जीरं (शिञ्जानः शब्दायमानः मञ्जुमञ्जीरः मनोज्ञनूपुरः यत्र तद्यथा तथा) ससाध्वस-सानन्दं (ससाध्वसं ससम्भ्रमं सानन्दञ्च यथा तथा; प्रथम-समागमवत् ससाध्वसं विनत्यनन्तर-प्राप्त्या सानन्दमिति ज्ञेयम्) निवेशनं (कुञ्जगृहं) प्रविवेश॥२॥ अनुवाद- श्रीराधा स्पृहायुक्त हृदयसे अपने चञ्चल नेत्रोंसे श्रीगोविन्दका अवलोकन करती हुई लज्जा और हर्षसे मणिमय नूपुरोंसे मनोहर शब्द करती हुई निकुंज गृहमें प्रवेश करने लगीं। पद्यानुवाद- हुलस उठी राधा मधुवनमें अपना ही प्रतिबिम्ब देखकर अपने जीवन-धनमें। चिर अभिलाष विलास भरे हरि, डूबे हर्ष मदनमें, सिहर उठी राधा अति मनमें, हुलस उठी राधा मधुवनमें। बालबोधिनी-सखीके द्वारा समझा-बुझाने पर श्रीराधाने रतिक्रीड़ाके लिए उपयोगी लता-निकुंजमें भीतर-भीतर कुछ
काँपती हुई, कुछ उमगती हुई, इधर-उधर देखकर साभिलाष श्रीगोविन्दको निहारती हुई, चरण-नूपुरोंको झंकारती हुई प्रवेश किया। प्रविष्ट होते हुए जब उन्होंने श्रीकृष्णको देखा तो उन्हें ऐसा लगा कि वे मानो अंग-अंगमें श्रीराधाको ही धारण कर रहे हैं। गीतम् ॥२२॥ वराड़ीरागयतितालाभ्यां गीयते। बालबोधिनी—एक सुकेशी हाथोंमें कंकण धारण कर, कानोंमें ढेरसे पुष्प धारणकर लजाई हुई-सी हाथमें चामर लेकर वीजन करती हुई जब दयितके साथ विनोदन करती है, ऐसे समयमें उस वराङ्गनाके गीतको वराड़ी राग कहा गया है। राधा-वदन-विलोकन-विकसित-विविध-विकार-विभङ्गम्। जलनिधिमिव विधु-मण्डल-दर्शन-तरलित-तुङ्ग-तरङ्गम् ॥१॥ हरिमेकरसं चिरमभिलषित-विलासम्। सा ददर्श गुरुहर्ष-वशंवद वदनमनङ्ग-निवासम् ॥ध्रुवपदम् ॥ अन्वय—[एवं कुञ्ज प्रवेशमुक्त्वा श्रीकृष्णस्य तद्दर्शनानन्द- विकारान् वर्णयन् तस्या स्तद्दर्शनमाह]—सा (श्रीराधा) एकरसं (एकस्मिन्नेव आलम्बने श्रीराधारूपे रसो यस्य तं; तस्याः सर्वोत्तमत्व-निश्चयेन तदेकपरमित्यर्थः) [ननु अन्याङ्गनाभिः रममाणस्य कुतस्तत्परत्वमित्यत आह]—चिरं (बहुकालं) अभिलषित-विलासं (पूर्वोक्तरूपेण अभिलषितः आकाङ्क्षितः तया सह विलासो येन तम्) [अतस्तत्प्रसादावलोकनात्] गुरुहर्षवशंवद-वदनं (गुरुहर्षस्य वशंवदम् आयत्तं वदनं मुखं यत्र तादृशं हर्षेण स्मेराननमित्यर्थः) [अतएव] अनङ्गविकाशं (अनङ्गस्य कामस्य विकाशः यत्र तादृशं) [तदेकनिष्ठत्वं
एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३५९ दृष्टास्तेन स्पष्टयति]—राधावदनवलोकन-विकसित-विविध- विकार-विभङ्गं (राधावदनवलोकनेनैव विकसिताः प्रकटिताः विविधविकाराः कामजाः हर्षस्तम्भादयः ते एव विभङ्गाः ऊर्म्मयः यत्र तादृशं) विधुमण्डलस्य चन्द्रमण्डलस्य दर्शनेन तरलिताः चञ्चलीकृताः तुङ्गाः महान्तः तरङ्गाः यत्र तादृशं) जलनिधिं (समुद्रम्) इव हरिं ददर्श; [अत्र श्रीकृष्णसमुद्रयोः विकारोर्म्योश्च साम्यम्] ॥१॥ अनुवाद—एकरस अर्थात् राधाविषयक अनुरागसे युक्त तथा चिरकालसे श्रीराधाके साथ विलासकी अभिलाषा रखने वाले श्रीराधा-वदन अवलोकन जन्य हर्षसे प्रफुल्लित, श्रीकृष्ण रोमाञ्च आदि विविध सात्त्विक मदन-विकाररूप भावोंसे युक्त हो रहे हैं। जिस प्रकार शशधर-मण्डलके दर्शनसे समुद्रमें उत्ताल-तरङ्ग समुदाय तरंगायित हो उठता है, उसी प्रकार काम-रसके समुद्र-स्वरूप, भावभङ्गिमा द्वारा मदन-आसक्ति प्रकाशित करनेवाले श्रीकृष्णको श्रीराधाने निकुञ्ज गृहमें देखा। पद्यानुवाद— राधा-वदन विलोकनसे हैं विकसित विविध विकार जैसे विधुको जोह जलधि लहरों भर लाता ज्वार। बालबोधिनी—निकुञ्ज गृहमें श्रीराधाने श्रीकृष्णको अत्यधिक स्नेहके साथ देखा, देखा श्रीकृष्णकी अनेक विशेषताओंको, सारी विशेषताएँ श्रीराधासे ही सम्बन्धित। श्रीहरि समभावपूर्ण हैं, एकरस हैं, एक ही शृङ्गार रस अपनी प्रधानता बनाये हुए है, वे अनेक प्रकारके शृङ्गार रसके भावोंसे परिपूर्ण हैं। राधाविषयक अनुराग ही उनमें उछल रहा है, चिरकालसे श्रीराधाके साथ विलास करनेकी इच्छा संजोये हुए हैं, केलिकुंजमें श्रीराधाका आना ही उनके जीवनका सर्वस्व है, उनके दर्शनसे उनमें आनन्दका उद्रेक हो गया, अनेक प्रकारके कम्प-पुलकादि सात्त्विक विकार उदित हो उठे।
३६० श्रीगीतगोविन्दम् ऐसा लग रहा था जैसे श्रीराधाका मुखमण्डल कामदेवका निवास स्थान है, जिसे देखकर श्रीकृष्णका मुखमण्डल हर्षसे दीप्त हो उठा है और अपनी मिलन-इच्छाको पूर्ण करना चाहता है, मानो श्रीराधाका मुख चन्द्रमण्डल हो, जिसे देखकर कृष्णरूपी समुद्र चञ्चल हो उठा हो और उसमें ऊँची-ऊँची तरंगें उच्छलित हो रही हों। श्रीराधाने देखा श्रीकृष्ण उन्हें देखते ही विविध काम-भावनाएँ प्रकाशित करने लगे हैं॥१॥ हारममलतर-तारमुरसि दधतं परिलम्ब्य विदूरम्। स्फुटतर फेन-कदम्ब-करम्बितमिव यमुनाजल-पूरम्॥ हरि....॥२॥ अन्वय—[अतःपरं सप्तमं यावत् श्रीहरिमेव विशिनष्टि]— उरसि (वक्षसि) विदूरं परिलम्ब्य (सुदीर्घमित्यर्थः) अमलतरतारं (अमलतरः अत्युज्ज्वलः) तारः मुक्ताफलं यस्य तादृशम्; मुक्ताशुद्धौच तारः स्यात् इति विश्वः) हारं दधतं (धारयन्तं) [अतएव] स्फुटतरफेन-कदम्ब-करम्बित-यमुना-जलपूरम् (स्फुटतरेण फेन-कदम्बेन-फेन-चयेन करम्बितं खचितं यमुना- जलस्य पूरं प्रवाहमिव स्थितं) [हरिं सा ददर्श इति शेषः]। [अत्र यमुना-जल-पूरेण श्रीहरेः फेनसमूहेन च हारस्य साम्यम्] ॥२॥ अनुवाद—श्रीहरिने निज विमल उर-स्थल पर निर्मल मुक्ताओंसे रचित मनोहर हारका परिधान कर रखा है, जो उनके हृदयका बार-बार आलिङ्गन कर रहा है। ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो यमुना नदीका जल स्फुट रूपमें विराजमान फेन-समूहको धारण कर रहा है। पद्यानुवाद— उर पर लहराता है हरिके अमल तारका हार, मानो फेन-कदम्ब-करम्बित जमुना-जलकी धार। हुलस उठी राधा मधुवनमें। विलस उठी राधा अति मनमें॥
एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३६१ बालबोधिनी—प्रस्तुत पदमें श्रीकृष्णकी उपमा यमुनाके आपूरित जल प्रवाहसे की गयी है, उनके नीलवर्ण वक्षस्थलको बार-बार आलिङ्गन करनेवाला शुभ्र जानुपर्यन्त लटकता हुआ शुभ्र मुक्ताहार ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो यमुनाका नीला जल सफेद फेनसे मिश्रित होकर प्रकाशित हो रहा हो अथवा यमुनाके जलमें फेन मिल गया हो। प्रस्तुत पद श्रीराधा-दर्शनसे श्रीकृष्णमें उद्भूत स्वेद नामक सात्त्विक भावके प्रकाशनको भी सूचित कर रहा है। श्यामल-मृदुल-कलेवर-मण्डलमधिगत-गौरदुकूलम् । नील-नलिनमिव पीत-पराग-पटल-भर-वलयित-मूलम् ॥ हरि.... ॥३॥ अन्वय—अधिगत-गौरदुकूलं (अधिगतं प्राप्तं परिहितमिति यावत् गौरं पीतं दुकूलं पट्टाम्बरं येन तं) [तथा] श्यामल मृदुल-कलेवर-मण्डलं (श्यामलं मृदुलञ्च कोमलञ्च कलेवर- मण्डलं यस्य तं; यथोचितावयव-सन्निवेश-प्रतिपादनार्थं मण्डलत्वेनोक्तिः) [अतः] पीतपरागपटलभरवलयितमूलं (पीतेन परागाणां मध्यस्थरजसां पटल-भरेण समूहातिशयेन वलयितं वेष्टितं मूलं यस्य तं) नीलनलिनम् (नीलोत्पलम्) इव [हरिं ददर्श]। [नीलकमलेन श्रीहरेः परागेण च पीतवसनस्य साम्यम्] ॥३॥ अनुवाद—श्रीहरिने अपने श्यामल मृदुल कलेवर पर पीत वसन धारण किया है, ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो नीलपद्म सुवर्ण-पर्णके पराग-निलयसे साङ्गोपाङ्ग सराबोर हो गया हो। पद्यानुवाद— श्यामल कोमल वपु पर सज्जित सुन्दर गौर दुकूल, पीत पराग पटल है राजित ज्यों नलिनीके फूल। बालबोधिनी—श्रीहरिका श्रीविग्रह श्यामवर्ण है, जिस पर उन्होंने पीत वर्णका पीताम्बर धारण कर रखा है, वह इस
३६२ श्रीगीतगोविन्दम् प्रकार सुशोभित हो रहा है, जैसे नीलकमल अपने पीले परागसे परिपूर्ण रूपसे परिवेष्टित-मंडित हो रहा हो। इस बातकी भी सूचना दी जा रही है कि श्याम-वर्णके वक्षःस्थल पर तुम गौराङ्गीकी शोभा भी अत्यधिक होगी। इस प्रकार विपरीत-रति भी प्रदर्शित हुई है। तरल-दृगञ्चल-चलन-मनोहर-वदन-जनित-रतिरागम् । स्फुट-कमलोदर-खेलित-खञ्जन-युगमिव शरदि तडागम् ॥ हरि.... ॥४ ॥ अन्वय-तरल-दृगञ्चल-चलन-मनोहर-वदन-जनित-रतिरागम् (तरलस्य चञ्चलस्य दृगञ्चलस्य चलनेन कटाक्षक्षेपेण मनोहरं यत् वदनं तेन जनितः उत्पादितः रतिरागः सुरतौत्सुक्यं येन तं) [अतएव] शरदि (शरतत्काले) स्फुटकम्लोदर-खेलित- खञ्जनयुगम् (स्फुटं विकसितं यत् कमलं पद्मं तस्य उदरे अभ्यन्तरे खेलितं क्रीडापरं खञ्जनयुगं यत्र तादृशं) तड़ागम् इव [हरिं सा ददर्श इति शेषः]। [अत्र श्रीहरेः तड़ागेन वदनस्य कमलेन, नयनयोश्च खञ्जनयुगलेन साम्यम्] ॥४॥ अनुवाद-जिन श्रीकृष्णका मनोहर वदन शरद् कालके निर्मल सरोवरमें विकसित नील-कमलकी शोभाके समान है, उस मुख पर चंचल नयनोंकी अपाङ्ग-भङ्गिमा श्रीराधाके प्रति इस प्रकार मदन-अनुराग उद्दीप्त करा रही है, मानो कमल पर खञ्जन पक्षी क्रीड़ापरायण हो रहे हों। पद्यानुवाद- तरल दृगंचल चलन मनोहर वदन उदित रति-राग, खेल रहे खंजन कंजोदर मानो शरद तड़ाग। हुलस उठी राधा मधुवनमें। विलस उठी राधा अति मनमें ॥ बालबोधिनी-जब श्रीराधाने निकुंज-सदनमें प्रवेश किया, तब श्रीकृष्णके नेत्र अति चंचल हो उठे, उनके मन्द-मन्द
एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३६३ मुस्कानसे युक्त अति मनोहर मुखड़ेको देखकर श्रीराधाके मनमें रतिविलास करनेकी इच्छा उत्पन्न हो उठी। श्रीकृष्णका सस्मित मुख उस शरद्कालीन प्रफुल्लित कमलके समान लग रहा था, जिस पर दो खञ्जन पक्षी क्रीड़ा कर रहे हों। वस्तुतः उनके नेत्रोंकी चंचलता क्रीड़ापरायण खंजरीट खगोंके (खञ्जन पक्षीके) समान लग रही थी। श्रीराधाको देखकर श्रीकृष्ण अविकारी ही रहे। अतएव यहाँ उनकी उपमा शरद्कालीन तड़ागसे दी गयी है। प्रस्तुत श्लोकमें नेत्रोंकी चंचलता रतिरागको व्यक्त कर रही है, उनके भ्रू-क्षेप (कटाक्ष) श्रीराधाके मन्मथको अभिवृद्धित करनेवाले हैं। शरद्कालमें खंजन खगका वर्णन उचित ही है। 'कमलोदर' पदसे 'पद्मासन' नामक रतिविशेष भी सूचित हुआ है। उनका मनोहर मुख युवतियोंमें रतिकी अभिलाषा उत्पन्न करनेवाला है। वदन-कमल-परिशीलन-मिलित-मिहिर-सम-कुण्डल-शोभम्। स्मित-रुचि-कुसुम-समुल्लसिताधर-पल्लव-कृत-रति-लोभम्॥ हरि....॥५॥ अन्वय—वदन-कमल-परिशीलन-मिलित-मिहिर-सम-कुण्डल- शोभम् (वदनमेव कमलं तस्य परिशीलनाय विकाशाय मिलिताभ्यां समागताभ्यां मिहिरसमाभ्यां सूर्यसदृशाभ्यां कुण्डलाभ्यां शोभा यत्र तादृशं; सूर्यमण्डलद्वयमिव कुण्डलयुगलं धारयन्त- मित्यर्थः) [तथाच] स्मित-रुचि-कुसुम-समुल्लसिताधर-पल्लव- कृत-रति-लोभम् (स्मितरुचिः मृदुहास्यप्रभा स एव कुसुमं तेन समुल्लसितः यः अधर-पल्लवः तेन कृतः उत्पादितः [तस्याः] रतिलोभो येन तादृशम्) [हरिं सा ददर्श] ॥५॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके वदन-कमलकी शोभाका परिशीलन करनेके लिए अरुण वर्णके सदृश लोहित वर्णीय मणिमय कुण्डलद्वय अति सुन्दर रूपसे शोभा पा रहे हैं एवं रुचिर
३६४ श्रीगीतगोविन्दम् मन्द-मन्द हास्यप्रभाकी कान्तिसे युक्त होकर उल्लसित, स्फूर्त्तियुक्त अधर-पल्लव श्रीराधाकी रति-लालसाको समुद्भूत करा रहे हैं। पद्यानुवाद— वदन कमल पर रविसे राजित युग कुण्डल अति सुन्दर। हिल पल्लवसे होंठ जताते चुम्बन हित ज्यों आतुर॥ बालबोधिनी—उस समय निकुंजमें श्रीकृष्णके कानोंमें विभूषित दोनों कुण्डल ऐसे लग रहे थे मानो दो सूर्य उनके प्रफुल्लित मुखकमलका स्पर्श प्राप्त करनेके लिए कपोलों पर मिलित हो रहे हों। इस प्रसंगसे अर्थात् मिहिर-प्रकाशसे रतिकालका अन्त भी सूचित हो रहा है। उस पर भी श्रीकृष्ण मन्द-मन्द मुस्करा रहे हैं। स्मित कान्तिसे उनका वदनकमल और भी रुचिर एवं समुज्ज्वलित लग रहा है। उनके अधरपल्लव रति-लोभकी तृष्णा अभिव्यक्त कर रहे हैं और श्रीराधाके अधर पानके लिए उत्कण्ठित हो रहे हैं। श्रीकृष्णके ऐसे मुखकमलको देखकर श्रीराधाके मनमें भी रति-इच्छा समद्भूत हो गयी। श्रीराधा ऐसे सौन्दर्य-सार भूषण श्रीकृष्णको देखती रहीं। शशि-किरण-च्छुरितोदर-जलधर-सुन्दर-सकुसुम-केशम्। तिमिरोदित-विधुमण्डल-निर्मलमलयज-तिलकनिवेशम् ॥ हरि.... ॥६ ॥ अन्वय—शशि-किरण-च्छुरितोदर-जलधरसुन्दर-सकुसुमकेशं (शशिनः चन्द्रस्य किरणैः छुरितं व्याप्तम् उदरं यस्य तादृशः यः जलधरः तद्वत्-सुन्दराः सकुसुमाः कुसुमखचिताः केशाः यस्य तम्) [अत्र केशानां जलधरेण पुष्पाणाञ्च इन्दूकिरणेन साम्यम्] [तथा च] तिमिरोदित-विधुमण्डल-निर्म्मल-मलयज- तिलकनिवेशं (तिमिरे अन्धकारे उदितं विधुमण्डलमिव निर्मलः मलयजतिलक-निवेशः चन्दन-तिलक-विन्यासः यस्य तम्)