गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 384, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ें३५२ श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— मलय वायु यह 'मह मह' बहती, हुलस मदन-शर भीते! कहती, बालबोधिनी—सखी कहती है—राधे! तुम मदनके बाणसमूहसे भयभीत हो गई हो। अतः तुम इस शृङ्गारगृहमें प्रवेश करो। इसमें मलय पर्वतकी दखिनइया बयार झिर-झिर बह रही है। पुष्पोंके मध्यभागसे आनेके कारण मृदुल स्पर्शवाली यह वायु लताकुञ्जको और भी सुरभित एवं शीतल बना रही है। जाओ इस प्रेम मन्दिरमें जाकर श्रीकृष्णके साथ विहार करो, यह तो तुम्हारे भीतरके रसको प्राणोंके द्वारा गीतोंमें मुखरित करनेका क्षण आया है, गाओ, प्रेमके उन्मादित गीत गाओ। वितत-बहु-वल्लि-नव-पल्लव-घने विलस चिरमलस-पीनजघने ! प्रविश.... ॥५॥ अन्वय—अयि अलस-पीन-जघने (अलसञ्च पीनञ्च जघनं यस्याः तादृशि) राधे वितत-बहु-वल्लि-नव-पल्लव-घने (विततानां विस्तृतानां बहुवल्लीनां नवैः पल्लवैः घने निविड़े) इह (केलिसदने) माधवसमीपं प्रविश [ततश्च] चिरं विलस [ईदृग्जघनं सफलं कुरु इत्यर्थः] ॥५॥ अनुवाद—पीन जघन गुरु भारसे सुमन्द अलस गतिका सम्पादन करनेवाली श्रीराधे! सुविस्तृत लताओंके नवीन पल्लवोंके द्वारा निविड़तर रूपसे आच्छादित इस लता-केलि निभृत निकुंजमें प्रवेश करो और माधवके समीप जाकर उनके साथ विलास करो। पद्यानुवाद— बहुवल्ली पल्लव नव छादित, विलस अरी चिर कुंज रमणमें। चल राधा! पिय-ठिग उपवनमें॥